शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

संजय जनागल की लघुकथाएँ

image

सीख

‘‘घेर लो, पकड़ लो, मारो। आज बचकर नहीं जाना चाहिए।’ खरगोश को देखकर सभी बंदर एक साथ उस पर झपट पड़े।

बंदरों के सरदार ने कहा, ‘ठहरो, अगर हम संख्या में ज्यादा हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि जंगल में केवल हम ही रहेंगे? इन्हें भी जीने का हक है? जाति में क्या रखा है? हम सब भाई-भाई हैं? हमें एकजुट होकर रहना चाहिए।’’

‘लेकिन सरदार, ये खरगोश तो संख्या में कम हैं और हम ज़्यादा हैं। हमारी जाति भी ऊंची हैं। पिछली जनगणना में शेर महाराज ने कहा था कि जो जाति संख्या में ज़्यादा होगी, उसे जंगल में सबसे ज़्यादा अधिकार मिलेंगे, फिर आज आप इस खरगोश को क्यों बचा रहे हैं?’ एक बंदर ने कहा।

‘जातीय जनगणना का कोई आधार नहीं होता। इससे तो हम सब टुकड़ों में बंट जायेंगे और फिर जब जंगल मंे इतनी जगह है कि हम सब मिलजुल कर रह सकें तो फिर हम आपस में जातिवाद को लेकर क्यों लड़ें?’’ सरदार ने कहा।

‘तो फिर इसका मतलब शेर महाराज की आज्ञा का उल्लंघन करेंगे?’ तपाक से एक बंदर बोल पड़ा।

सरदार ने धीरज से समझाया, ‘देखो भाइयों! हम मिलकर रहेंगे तो शेर भी हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। अगर हम जात-पात में ही उलझे रहेंगे तो दूसरे जंगल के जानवर भी आयेंगे और हमें अपना भोजन बनायेंगे।’

इस बार सरदार की बात सभी को समझ में आ गई और फिर सब मिलकर रहने लगे।

--

धिक्कार !

‘सा‘ब, आप आज इस सम्मेलन में कैसे?’ गोकुल ने अपने मालिक से पूछा।

‘अरे गोकुलिया! क्या बताऊँ अब तो ऐसा लग रहा है कि अगर अपनी साख बनानी है तो ऐसे सम्मेलनों में जाना ही पड़ेगा है। यह बात मुझे थोड़ी देर से समझ आयी।’ सज्जन ने कहा।

गोकुल तुरंत बोला, ‘लेकिन शायद आपको पता नहीं कि आप जिस सम्मेलन में आये हैं वो तो बाबा साहब का है जिनके विरोध में तो ढेरों अखबार भरे पड़े हैं आपके आर्टिकल से। आप तो शुरू से ही बाबा साहब को दोष देते आये हैं कि इन्होंने भारत को दलित और सवर्ण में बांट दिया।’

‘चुप कर बदमाश। यह बातें सरेआम नहीं की जाती। वो सब आर्टिकल भी एक खेल ही तो है। आज समय कुछ और है। आज मुझे अपनी सीट की परवाह है, बस एक बार सीट मिल जाए फिर देखना।’ सज्जन गुस्से से बोला।

गोकुल डर के कारण चुप हो गया। लेकिन अब वो समझ चुका था कि जो नेता अपनी कुर्सी के लिए कुछ भी कर सकता है वो कभी मेरी क्या मदद करेगा और गोकुल ने उस दिन से ही सज्जन के यहाँ पर चपरासी की नौकरी छोड़ दी और लाख बुलाने पर भी सज्जन के पास नहीं गया। उसे पुरानी कहावत याद हो आई ‘‘हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और होते हैं।’’

--

संजय जनागल

बड़ी जसोलाई, रामदेवजी मंदिर के पास

बीकानेर

--

(चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com  फतुहा पटना की कलाकृति)

2 blogger-facebook:

  1. दोनों लघुकथाएं सार्थक सन्देश दे रही हैं .. बंदरों ने तो अपने सरदार की बात मां ली पर हम भारतीय उनसे भी गए गुज़रे हैं

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. बेनामी6:45 pm

      Nice Massage for all the people
      specially for Indian Political Leader.

      Mohmmed Salim

      हटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------