शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

अरविंद कुमार का आलेख - क्‍यों लोग बदल रहे हैं ?

क्‍यों लोग बदल रहे हैं ?

डा0 अरविंद कुमार

जब भी मैं गांव जाता हूँ जब भी क्‍या महीने में करीब दो बार जाना होता है। एक दिन मैंने सोचा चलो लोगों की सोचने-समझने की क्षमता को परखा जाए। और मैं घर से निकल कर गांव की सड़क पर बनी पुलिया पर आकर लोगों के पास खड़ा हो गया जो जैसा रिश्‍ते में लगता था उससे उसी प्रकार अभिवादन हुआ फिर कुछ ही क्षणों में आज प्रदेश में होने वाले महासमर (चुनाव) के राजनीतिक प्रकरण पर बहस शुरू हो गई। सभी अपना-अपना तर्क प्रस्‍तुत कर रहे थे कोई कह रहा था 'सत्तारूढ़दल‘ की पुनः वापसी होगी, कोई कह रहा था कि अब किन समाजवादी पार्टी की सरकार बनेगी। कोई कह रहा था कांग्रेस फिर यू0पी0 में आएगी। भाजपा व अन्‍य 'पार्टियों‘ की क्‍या स्‍थिति रहेगी स्‍पष्‍ट अभिमत नहीं था। परंतु 'पूर्ण बहुमत‘ किसी भी पार्टी को नहीं मिलेगा मिलकर ही दो में से 'बसपा या 'सपा‘ ही सरकार बनाएगी। बहस-बहस होते 'गांव‘ की मूलभूत समस्‍याओं पर आकर रुक गयी। किसने 'क्‍या‘ किया अब प्रश्‍न यह उपस्‍थित हो गया था 'जन या लोगों‘ की मूलभूत समस्‍याओं पर किसी ने 'गौर‘ किया। किया भी तो कितना सफल रहा। खाद, बिजली, पानी, शिक्षा, मिडडे मील, भ्रष्‍टाचार , बेरोजगारी, नियुक्‍तियां, पारदर्शिता, जाति, परिवारवाद, क्षे़त्रवाद, भाषावाद, प्रांतवाद, आतंकवाद, भूमिअधिग्रहण, नेताओं के प्रति बढ़ते अविश्‍वास इत्‍यादि पर सबने अपनी-अपनी सहमति दी।

इतना सब सुनने के बाद मुझे लगा 'लोग‘ सोचने लगे है। मुझे लगा शिक्षा का प्रचार-प्रसार जितनी गति से बढ़ता जाएगा उतनी 'तीव्रगति‘ से उनके समझने की क्षमता बढ़ती जाएगी। यह विश्‍व अब अपने पाव तेजी से फैला रहा है। 'सूचना प्रौद्योगिकी‘ ने सम्‍पूर्ण को 'एक गांव‘ के रूप में विकसित करने में लगा है। हम विश्‍व की 'शिक्षा व्‍यवस्‍था‘ पर से ही नहीं रू-ब-रू हों रहे हैं वरन वहाँ होने वाली समस्‍त गतिविधियों को 'विजुवल मीडिया‘ के माध्‍यम द्वारा उसका 'लाइव‘ (सीधा-प्रसारण) अपने 'टीवी‘ सेट पर देख रहे होते हैं। शिक्षा प्रबंधन ने समाज में एक 'नया व्‍यवसाय‘ भी बन गया है। उत्तम से उत्तम शिक्षा व्‍यवस्‍था द्वारा लोगों को जागरूक बनाया जा रहा है। वह अपने समय समाज, इतिहास, संस्‍कृति, धर्म, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, सांस्‍कृतिक आवागमन, समस्‍त प्रकार के नैतिक सामाजिक सरोकारों से परिचित होते रहे हैं।

हमारे देश के निवासियों पर जितना प्रभाव योरोप एवं अमेरिका का पड़ रहा है। शायद एशिया प्रांत के देशों का नही पड़ रहा है। हमारे देश के उच्‍च क्‍या मध्‍यवर्ग, निम्‍नवर्ग के घरानों से पढ़ लिखकर बाहर जाने का जुनून इस कदर सवार है। सबसे पहले उसके दिमाग में अमेरिका, आस्‍ट्रेलिया, इंग्‍लैण्‍ड, कनाडा, थाइलैण्‍ड, इत्‍यादि देशों में रोजगार प्राप्‍त कर वहाँ बसना अपना सौभाग्‍य समझता है और अपनी भाषा-संस्‍कृति, धार्मिक, रीति रिवाजों, परम्‍पराओं का 'गौण‘ मान लेता है, 'नया इतिहास‘ रचने का संकल्‍प सा लेता दिखाई पड़ता है।

एक मामले में भारत के निवासी अब समझदारी से काम लेना प्रारम्‍भ कर दिया है। वह मामला है 'धर्म‘ का। जिसका उदाहरण आप पिछले दो साल में 'बावरी मस्‍जिद विध्‍वस‘ घटना के क्रम में हाईकोर्ट के निर्णय का सभी ने स्‍वागत किया। यह भारत के लिए ही नहीं सम्‍पूर्ण विश्‍व के लिए 'सुखद घटना‘ ही कही जा सकती है। इससे निष्‍कर्ष निकलता है सभी सुख से जीना व रहना चाहते कोई भी 'धार्मिक कट्‌टरता‘ में नहीं जीना चाहता। बदलाव की यह बयार निरंतर जारी है।

'जाति‘ के विरुद्ध बदलाव नहीं आने पा रहा है।इसके प्रति अभी लोगों का 'ब्रेनवाश‘ नहीं हो पाया है। मुख्‍य कारण लगता है जो हमारी वरिष्‍ठ पीढ़ी है वह अपनी युवा पीढ़ी को पूर्ण रूपेण समझ नहीं पा रही है जिसका कारण हो सकता है उसके अपने ‘संस्‍कार‘। 'नयी‘ पीढ़ी का 'जाति

व्‍यवस्‍था‘से 'मोह भंग‘ पैदा हो रहा है। क्‍योंकि 'शिक्षा‘ ने 'उच्‍चता-निम्‍नता‘ की खाई को पाट रही है किंतु 'राजनीति‘ भारत की वास्‍तविक सच्‍चाई है। यहाँ की राजनीति पहले धर्म आधारित कह सकते हो बाद में 'जाति‘ आधारित हो गई। यही कारण 'ब्रेनवाश‘ पूर्ण रूप से नहीं हो पा रहा है।

भारत की 'संस्‍कृति‘ अपनी अलग पहचान है। लेकिन इसकी संस्‍कृति ने 'विश्‍व‘की सभी संस्‍कृतियोें को आत्‍मसात किया है। हम संस्‍कृतियों को ग्रहण करने में, सभ्‍यता को भी ग्रहण करने में सबसे आगे बढ़ते जा रहे है। क्‍योंकि 'अनुकरण‘ हमारे रग-रग में बसा है। प्राचीन काल में ही जाइए हूण संस्‍कृति, तुर्क संस्‍कृति, मुगल या मुस्‍लिम संस्‍कृति, मध्‍यकाल में योरोपीय संस्‍कृति, वर्तमान समय में अमेरिकी संस्‍कृति को तेजी से ग्रहण कर रहे हैं। जैसे हमारी अपनी कोई पहचान ही नहीं है। हम दूसरे के वशीभूत होते चले जा रहे हैं। मशीनीकरण, बाजारीकरण ने हमारी संस्‍कृति में भी सेंध लगा दी है।

यही नहीं उसने भाषा पर तेजी से प्रहार करना प्रारम्‍भ कर दिया। क्षेत्रीय भाषाएं तो अपनी अस्‍मिता की लड़ाई लड़ रही है क्‍योंकि कुछ समय बाद क्षेत्रीय भाषाओं का रूप जो है वह नहीं रहेगा। माना इसमें सुरक्षित साहित्‍य ही में इसका रूप देखने में मिलेगा और हम अपनी जबान भूल चुके होंगे। आधुनिक युवा अपनी 'जबान‘ बोलने में अपनी 'तौहीनी‘ समझ रहे हैं वह न खड़ी बोली (हिंदी) बोल पा रहे है न ही शुद्ध अंग्रेजी बोल पा रहे हैं अंग्रेजी बोलना अपने आप को 'वेल कल्‍चर्ड‘ समझते है।

वैश्‍विक होती दुनिया ने समाज के नैतिक मूल्‍यों में परिवर्तन कर दिया है। अब इसके रिश्‍तों में बदलाव आ रहा है कारण 'रिश्‍ते‘ औपचारिक बनते जा रहे है। 'इंटरनेट‘ की दुनिया ने 'रिश्‍तों‘ का 'नया जाल‘ बुन रहा है। जहाँ हम एक दूसरे को देख नहीं सकते पर वह 'आपका‘ मित्र बनना पसंद करता है। किंतु इन रिश्‍तों के साथ हम अपने पारिवारिक रिश्‍तों को लेकर चल पा रहे हैं कि नहीं। शायद एक समय में लोग 'नातेदारी‘ भूल जाएगें। 'नातेदारी‘ क्‍या होती है ? नहीं मालूम होगा। लेकिन युवाओं को इस तरफ भी अपने विचार रखने होंग वे इस विषय क्‍या सोचते है उनकी अपनी राय होगी। क्‍या 'विवाह‘ संस्‍था नातेदारी को आगे भी बचा पाएगी कि नहीं। क्‍या 'लिव-इन-रिलेशनशिप‘ की दुनिया में भी 'नातेदारी-रिश्‍तेदारी‘ बनेगी की नहीं फिलहाल अभी उत्तर हाँ में नहीं लगता। भविष्‍य का उत्तर 'गर्भ में छिपा है। 'लिव-इन-रिलेशनशिप‘ को गाँव, कस्‍बों, छोटे शहरों को छोड़कर, कुछ ही महानगरों में कुछ उदाहरण मिल पाएंगे। लेकिन लोग आज भी परंपरागत रिश्‍ते को अधिक महत्त्व दे रहे है। 'राक स्‍टार‘ फिल्‍म प्रतिरोध की संस्‍कृति को रेखांकित करती है। 'राक स्‍टार‘ फिल्‍म में रिश्‍तों को अलग-अलग ढंग से निर्माता ने परिभाषित करने की कोशिश की है। हालांकि नए-नए प्रयोग चलते रहते है लेकिन इस प्रयोग ने कोई खास असर नहीं डाल पाया। फिल्‍में, मूवी भी लोगों को बदलने में अहम भूमिका निभा रही हैं।(क्रमशः)

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drdivyanshu.kumar6@gmail.com

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