शंकर लाल की रचना - वेलेंटाइन की बहार

वेलेंटाइन की बहार

आज हर तरफ छायी है वेलेंटाइन की बहार

बद हवास से मजनूं हो बाइक पर सवार

टेटुओ से भरे हुए लगते है कितने लाचार

एक अनार के पीछे पड़े हुए है सौ-सौ बीमार

जो कल तक एक चाय के लिए

महंगाई का रोना रो रहा था मेंरे यार

वो भी जाने क्या सोचकर

खरीद रहा है गुलाब के फूल सौ रूपये में चार

आज हर तरफ छायी है वेलेंटाइन की बहार |

क्या बूढ़े क्या जवान क्या कमाऊ और क्या बेकार

हर किसी को है यहाँ पर घोड़ी चड़ने का इंतजार

खुद के हालात तो संभलते नहीं है

लेकिन करना है देखो यहाँ हर किसी को प्यार

वाह मेरे मजनू वाह रे पश्चिम के वफादार

मानता हूँ प्यार महोब्त से ही चलता है

ये जीवन ये संसार

लेकिन दिखावा करने की क्या है दरकार

बहुत हो गयी ये वेलेंटाइन की बहार

तनिक अपनी संस्कृति में भी झांक ले मेरे यार

जिन्होंने तुम्हे पाला-पोषा, किया व्रत हर सोमवार

उन माता-पिता भाई-बन्धु से भी कर ले तनिक प्यार

फिर समझ में आएगा वेलेंटाइन का हसली मतलब

और छायेगी जीवन में बहार |

--------- शंकर लाल, इंदौर मध्यप्रदेश

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