मंगलवार, 20 मार्च 2012

ज्योत्स्ना शर्मा के 10 तांका

तांका

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` 1

चाहें न चाहें

हम कहें न कहें

नियति -नटी

बस यूँ ही नचाए

रंग सारे दिखाए

 

2

नैनों में नींद

मैं समझ जाती हूँ

सुख है यहाँ

धीरज और धर्म

फिर जायेगा कहाँ

 

        3

सुख तो आते

संग-संग गठरी

दुःखों की लाते

मै खुलने न दूँगी

बिखरने भी नहीं ।

 

4

कान्हा मैं खेलूँ

एक शर्त हमारी

जीतूँ तो "मेरे"

और जो हार जाऊँ

तो मै सारी तुम्हारी ।

 

5

फूलों से सुना

कलियों को बताया

मैंने भी यहां

जीवन -गीत गाया

प्रत्यहं दोहराया ।

 

6

निशा ने कहा

भोर द्वारे सजाये

निराशा नहीं

तारक आशा के हैं

चांद आये न आये ।

 

7

सूरज कहे

ऐसा कर दिखाओ

व्याकुल -मना

वीथियाँ हों व्यथित

कभी तुम ना आओ ।

 

8

कविता मेरी

बस तेरा वन्दन

तप्त पंथ हों

तप्त पथिक मन

सुखदायी चन्दन ।

 

9

मैं मृ्ण्मयी हूं

नेह से गूंथ कर

तुमने रचा

अपना या पराया

अब क्या मेरा बचा ।

 

10

तुम भी जानो

ईर्ष्या विष की ज्वाला

फिर क्यूं भला

नफरत को पाला

प्यार को न संभाला .

jyotsna.asharma@yahoo.co.in

7 blogger-facebook:

  1. ज्योत्स्ना जी के तांका माधुर्य से ओतप्रोत हैं । ये दोनों तांका तो एकदम लाजवाब हैं -
    8
    कविता मेरी
    बस तेरा वन्दन
    तप्त पंथ हों
    तप्त पथिक मन
    सुखदायी चन्दन ।

    9
    मैं मृ्ण्मयी हूं
    नेह से गूंथ कर
    तुमने रचा
    अपना या पराया
    अब क्या मेरा बचा ।
    -0-

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेहतरीन तांका...
    मात्राओं के बंधन के बाद भी अच्छी भावाव्यक्ति...

    उत्तर देंहटाएं
  3. उत्तर
    1. Jyotsna Sharma4:26 pm

      garima pant ji ,expression evam sahaj sahity ke prati ...hriday se aabhaaree hun .....sundar ,prerak pratikriyaa ke liye...!

      हटाएं
  4. आपकी यह सुन्दर रचना दिनांक 18.10.2013 को http://blogprasaran.blogspot.in/ पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

    उत्तर देंहटाएं

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