सोमवार, 5 मार्च 2012

सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री की कविता

दुःख का दरिया फूट पड़ा

पल्‍ला झाड़ रहे यह गम है

 

बिलख रहा सारा मंजर तो

तबाह हुऐ तो सिर्फ हम हैं

 

जूझ रहा प्‍यासा लहरों में

उनकी आँखें नहीं तो नम है

 

रो पड़ी लाखों नरगिसें तो

उनको लगता दर्द बहुत कम है

 

जीने की जब आस टूट रही

जीवन मिल गया क्‍या कम है

 

दुःख का दरिया ठाठें मारता

खुश किस्‍मत तो फिर भी हम हैं।

 

-सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री

राजसदन- 120/132 बेलदारीलेन

लालबाग, लखनऊ

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