शुक्रवार, 9 मार्च 2012

वीरेन्‍द्र कुमार कुढ़रा की लघुकथा - निदान

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वह अपनी अनुभवी निगाहों से बाबुओं की कारगुजारी का बारीकी से मुआयना करत़ा। आये दिन किसी न किसी बाबू से उलझ पड़ता। भरे दफ्तर में, रिश्वत लेकर काम करने वालों और भुगतान पर कमीशन लेने वालों को वह नंगा कर देता। जलील करता। वरिष्ठ अधिकारियों से शिकायत करने की धमकी देता। इसके आक्रामक व्‍यव्हार से बाबू सिटपिटा कर रह जाते।

आमदनी पर होते प्रहार से तिलमिलाते बाबुओं को हैडक्‍लर्क भी राहत का कोई निदान न बता सका। बाबुओं के लिए सर-दर्द बना वह बाबू हाल ही में ट्रांसफर पर आया था। इस दफ्तर के लिए वह नया जरूर था, लेकिन विभाग में काफी पुराना था। सहमते डरते मुँह लगे कुछ बाबू अफसर के बंगले पहुँचें

- ” साहब! यह नया बाबू तो आपके प्रषासन पर लांछन लगाता है। सरे आम दफ्तर की बदनामी करता है। इसके खिलाफ ड़ी. ओ. लिख दीजिये। कहीं दूर ट्रांसफर करा दीजिये। ऐसे लोग क्‍या दफ्तर चलायेंगें? बदनामी करेंगें सो अलग़़.“

- ”ट्रांसफर क्‍या आसान बात है!“ अफसर ने शंका जाहिर की। ट्रांसफर पर बैन लग चुका था। कुछ क्षण सोचकर प्रश्न किया।

- ”अभी किस सैक्‍सन में लगाया है उसे?“

- ”सामान्‍य कक्ष में.........“

- ”हुँह..........” अर्थपूर्ण मुद्रा में मुस्‍कुराते हुए अफसर ने सभी को घूरते हुए

प्रशासनिक सुझाव दिया।

- ”उसका सैक्‍सन बदल दो अकाउन्‍ट सैक्‍सन में लगा दो। कान्‍टेन्‍जेन्‍सी फण्‍ड़

या किसी दूसरे फण्‍ड का चार्ज दिलवा दो। थोड़ा बहुत कमीशन पाएगा। चुप रहेगा। भूखा आदमी तो बड़बडाता ही है। “

अगले दिन ही नए बाबू को आदेश दिया गया। इसके साथ सच-मुच ही सभी को समस्‍याओं का निदान हो गया। उस दिन के बाद से नया बाबू कभी किसी से उलझते नहीं देखा गया।

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- वीरेन्‍द्र कुमार कुढ़रा

3/14 रिछरा फाटक

दतिया (म0 प्र0) 475-661

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vkudhra3@gmail.com

यह रचना पूर्णतः मौलिक एवं स्‍वरचित है एवं आघात-4 (इन्‍दौर) में प्रकाशित हुई है।

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(चित्र - अमरेन्द्र aryanartist@gmail.com  फतुहा पटना की कलाकृति)

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