गुरुवार, 15 मार्च 2012

रामवृक्ष सिंह का व्यंग्य : थोड़ा और...

थोड़ा और..

बचपन में अपने जेब-खर्च के पैसों से चिज्जी खरीदने के बाद हम अकसर दुकानदार की मनुहार करते- भइया थोड़ा-सा चुग्गा दे दो.. थोड़ा-सा..थोड़ा और..। धीरे-धीरे बड़े हुए तो संदर्भ बदल गए, किन्तु चुग्गा लेने की आदत नहीं गई। सब्जी लेने जाते हैं तो कोशिश रहती है कि ऊपर से हरी धनिया के कुछ पत्ते और दो-चार मिर्चें जरूर डलवा लें। कहीं-कहीं इसी को महिलाएं मसाला कहती हैं। दुकानदार को भी अपनी गाहकी कायम रखनी होती है और वह अकसर चुग्गा देने के लिए मान जाता है। जिन दुकानों में इस तरह की गुंजाइश नहीं होती, वहाँ लोग दुकान से कुछ न कुछ उठाकर मुँह में डालते रहते हैं। सब्जी वाले के यहाँ गए तो मटर ही छीलकर चबा ली, गाजर उठाकर कुतरने लगे। परचून वाले के यहाँ गए तो कच्चे चने और चावल ही पुटराने लगे। ऐसा नहीं कि भूख से विवश होकर लोग ऐसा करते हैं। बल्कि उन्हें तो अपने मुनासिब प्राप्तव्य से कुछ अधिक चाहिए, ताकि खरीद का काम खत्म होने पर वे विजेता की भावना लेकर वहाँ से जाएं। ताकि उन्हें लगे कि जितने सामान के दाम चुकाए, उससे कुछ ज्यादा ही लेकर जा रहे हैं। उधर मुट्ठी दो मुट्ठी चने कोई खा ले तो विक्रेता को कुछ भी असर नहीं पड़ता। अलबत्ता उसे हर हाल में फायदा ही होता है। आधुनिक प्रबंधन में इसी को विन-विन परिस्थिति कहते हैं।

सरकारी दफ्तरों में एक अलग ही तरह का पारितंत्र है। वहाँ कर्मचारी लोग तनख्वाह को अपना जन्म-सिद्ध अधिकार समझते हैं। उसके एवज में काम करना चाहिए, ऐसा आम जनता सोचती होगी, वे नहीं सोचते। बहस करने पर उनका बड़ा ही वाजिब तर्क है कि वे सरकार के नौकर हैं, आपके नहीं। लिहाजा आपको अपना काम कराना है, तो अपनी जेब से कुछ न कुछ भुगतान करना ही होगा। अपने तईं आप इसे चाहे जो कहें- घूस, रिश्वत, उत्कोच या बचपन का वही मासूम-सा चुग्गा। लेकिन घूसखोर कर्मचारियों को कुछ न कहें। वरना वे बुरा मान जाएँगे। फिर चाहे जो हो जाए आपका काम नहीं होनेवाला। लोगों को बोनस मिलता है, तरह-तरह के परिलाभ मिलते हैं, लेकिन तब भी कुछ और की चाहत निरंतर बनी रहती है। कुछ और नहीं, तो काम नहीं।

हमें तो लगता है कि अपने प्राप्य से कुछ और अधिक पा लेने की यह चाहत इन्सान के वजूद में आने के साथ ही वजूद में आई है और इस नाते वह इन्सान की समकालिक है, इन्सानी सभ्यता की संगामी। शहर से लेकर गाँव तक, जगह-जगह हमें इसी दुर्दान्त इन्सानी इच्छा के दर्शन होते हैं। किसान अपने खेत का क्षेत्रफल बढ़ाने के लिए मेंड़ छाँटता रहता है। छाँटते-छाँटते वह मेंड़ को इतना पतला कर देता है कि उस पर से चलना कठिन हो जाता है। जिस मेंड़ को सरल रेखा में होना चाहिए था, वह विसर्पाकार हो जाती है। मौका मिलते ही वह मेंड़ को खिसकाकर बगल वाले खेत में कर देता है। और भरसक कोशिश करता है कि बगल वाले खेत की भी कुछ जमीन दबा ले। ग्राम-समाज की जमीन पर गोबर फेंककर घूरा बनाने से शुरू करते हुए धीरे-धीरे अपना मकान बना लेना, पौधे रोपकर आस-पास की जमीन पर अपना हक जताना, मवेशियों के खूंटे और नाँद गाड़कर धीरे-धीरे वहाँ काबिज हो जाना गाँव के लोगों में बिलकुल आम बातें हैं। चूँकि इन मामलों में हर कोई खुद को दूसरों से ज्यादा समझदार समझता है, इसलिए बात मौखिक तकरार से शुरू होकर, लड़ाई-झगड़े, मार-पीट, खून-खराबे और मुकद्दमेबाजी तक पहुँच जाती है। अपनी अदालतों में मुकद्दमों की जो लंबी फेहरिस्त है, उनमें से बहुत-से इसी तरह के हैं।

मैं जब-जब गाँव गया हूँ, यह देखकर हैरान हुआ हूँ कि वहाँ खेती लायक जमीन घट रही है। कहीं खेतों के बीचो-बीच स्कूल या मदरसा खड़ा हो गया है, तो कहीँ ईंट और कंक्रीट की पक्की कोठी खड़ी हो गई है। सरकारी स्कूलों में उनके बच्चे पढ़ते हैं, जिनके घर में खाने को नहीं है। अगर किसी को दो जून खाने की जुगाड़ है तो वह अपने बच्चे को प्राइवेट स्कूल भेजता है। सरकारी शिक्षकों को तनख्वाह ज्यादा मिलती है, लेकिन पढ़ने-पढ़ाने में उनका मन नहीं लगता। यदि छात्रों के सौभाग्य से लगने भी लगता है तो हर दूसरे दिन कोई न कोई शिक्षणेतर काम उनके मत्थे मढ़ दिया जाता है। किसी-किसी की तो की सारी ऊर्जा मिड डे मील तैयार करने में ही खर्च हो जाती है। लिहाजा कोई खाता-पीता परिवार अपने बच्चों को सरकारी स्कूल नहीं भेजता। ऐसे में यदि पैसे कमाने के लिए लोगों ने अपने खेतों में प्राइवेट स्कूल और कॉलेज की इमारत बना डाली तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

लेकिन नए-नए पक्के मकान बनाते जाने का क्या औचित्य है? गाँव और शहर, हर जगह यह बीमारी है। अपने लखनऊ के महानगर, निरालानगर, गोमतीनगर, इन्दिरानगर और जानकीपुरम जैसी समृद्ध कॉलोनियों में लोगों ने खूब बड़े-बड़े मकान बनवाए हैं। कोई-कोई कोठियाँ तो चार-चार पाँच-पाँच हजार वर्गफीट में बनी हैं। लेकिन उनमें रहते हैं दो बुड्ढा-बूढ़ी। किसी-किसी में केवल एक और किसी में कोई नहीं। बच्चे या तो महानगरों में जाकर पढ़ रहे हैं या विदेश जाकर नौकरी कर रहे हैं। वे भारत ही नहीं लौटेंगे तो इन अपेक्षाकृत छोटे शहरों को कौन पूछता है! यही हाल गाँवों का है। बड़े-बड़े दुमंजिले मकान बनवा लिए गए हैं, ताकि आस-पास के लोग देखें तो अवाक रह जाएँ। ताकि उनको पता तो चले कि इस घर के लड़के बंबई, दिल्ली, कलकत्ता, दुबई और सउदिया जाकर कितनी मोटी कमाई कर रहे हैं। उन मकानों में रहनेवाला कोई नहीं है। पहले गाय-बैल, भैंस आदि जानवर उनमें बाँध लिए जाते थे, भूसा भर लिया जाता था। अब तो हार्वेस्टर की मेहरबानी से भूसा खेत से घर आ ही नहीं पाता और ट्रैक्टर की मेहरबानी से बैल रखने का टंटा ही नहीं बचा। जानवर कम रह गए। भूसा भरा नहीं जाता। तो ये बड़े-बड़े मकान किसलिए?

बड़े मकान एक ओर तो ग्राम्य भूस्वामी के मन को ठंडक पहुँचाने वाली शै हैं वहीं दूसरी ओर उनके प्रतिद्वंद्वियों की ईर्ष्याग्नि को दहकाने वाली। सबसे ज्यादा डाह होता है बिलकुल निकटतम पड़ोसी को, जो अकसर आपका सगा या चचेरा भाई होता है। आपने मकान बनाया, तो उसके चारों ओर आपको सहन चाहिए। ज़ाहिर है कि सहन लायक जमीन आप अपने हिस्से में से तो छोड़ने वाले नहीं है। उसके लिए आपकी निगाह पड़ोसी की जमीन पर है। इस खींच-तान में अकसर होता यह है कि पड़ोसी को चाहे जरूरत हो या न हो, वह भी आपके मकान के समानांतर ही अपना मकान बना लेता है, पक्का नहीं तो कच्चा ही सही। वह भला अपनी जमीन में से आपके लिए सहन की जुगाड़ क्यों होने दे?

इसी तरह की खींच-तान शहरी कॉलोनियों में देखने को मिलती है। जिसने अपना मकान पहले बनाया, उसकी भरसक कोशिश रहती है कि बगल वाले की कुछ न कुछ जमीन दबा ले। न हो तो पलस्तर भर ही सही। बाद वाले की कोशिश रहती है कि उसका मकान पहले बने मकानों से ऊँचा जाए, उसका एलिवेशन सबसे शानदार हो। प्रायः सभी लोग अपने-अपने मकान के सामने सरकारी जमीन पर बाड़ बनवा लेते हैं, ताकि उसमें कुछ पेड़-पौधे लगा सकें। पेड़-पौधे लगाना और बागवानी तो आनुषंगिक है, मुख्य बात है कब्जा। बाड़ लगाकर वे यह जाहिर करना चाहते हैं कि मेरे मकान के सामने की यह जमीन मैंने लिखाई चाहे न हो, पर इसपर हक तो मेरा ही है। गाँवों में भी लोग ऐसा करते हैं। उनके मकान के सामने पड़ने वाली ग्राम-समाज की सारी जमीन, पेड़-पौधे, बाँस-बँसवार, गड़ही-तालाब, ऊसर-बंजर सब उनका है। दूसरा कोई वहाँ न भैंस बाँध सकता है, न कंडे पाथ सकता है।

हाय रे मेरे भारतीय मन! आज अचानक तुझसे कहा जा रहा है कि यह सब छोड़ और भला आदमी बन जा। सीधे रास्ते चल। भ्रष्टाचार में लिप्त मत हो। सोच कर देखिए कि कितना कठिन है इस अपेक्षा पर खरा उतरना! इक आग का दरिया है और डूब के जाना है। इस समूचे तंत्र में यदि आप भी दूसरों के जैसे नहीं हो गए तो आपकी खैर नहीं। विषस्य विषमौषधम्। विष का त्याग करके आपका निस्तार नहीं। नहीं काटना तो न काटिए। किन्तु यदि कोई विषधर आपको काट ले तो कम से कम विषोपचार के लिए तो अपने पास विष का यथेष्ट भंडार रखिए। बस इसी एक वजह से समाज में आज हर कोई बाँका है। चार-ओ-नाचार, इच्छा हो या न हो- बाँका होना आपकी नियति है। नहीं हैं तो गए काम से।

सच कहें तो थोड़े और की आकांक्षा ही संक्रामक है। मीडिया इसे हवा दे रहा है। ऊर्द्ध्व गति के लिए उत्सुक मन को भी बुराइयों का गुरुत्वाकर्षण खींचकर नीचे गिराता है। पतन तो प्रकृति का नियम है। उसे उचित ठहराने के लिए हमने समाज में नैतिकता के नए मानदंड गढ़ लिए। इसी को आज प्रैक्टिकल होना कहा जा रहा है। आदर्शवादी होना आज बेवकूफी है। प्रैक्टिकल बनो। थोड़ा और.. थोड़ा और..। मजे की बात यह कि इस थोड़े और की कोई सीमा नहीं है। हर थोड़े और के बाद कुछ थोड़ा और है। इस थोड़े और से किसी को निजात नहीं।

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डॉ. रामवृक्ष सिंह

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