गुरुवार, 15 मार्च 2012

रामवृक्ष सिंह का व्यंग्य : गाँव में बाघ

व्यंग्य

गाँव में बाघ

डॉ. रामवृक्ष सिंह

लखनऊ शहर से लगभग पंद्रह-सोलह किलोमीटर दूर स्थित एक गाँव में पिछले दो महीने से एक बाघ घूम रहा है। उसे पकड़ने के लिए वन विभाग और स्थानीय प्रशासन ने कितनी जुगत भिड़ाई, किन्तु अभी तक कोई नतीजा नहीं निकला है। कई जगह मचान बनाए गए, कितने ही पाड़े-पड़वे और सूअर बाँधकर बाघ को चारे का लालच दिया गया। लेकिन बाघ इन्सानों से भी बहुत बड़ा शातिर है। वह आता है, चारा खाता है और जाकर किसी खोह में छिप जाता है। यदि एक बार में पूरा चारा नहीं खाया जाता, तो बाघ महाशय उसे उठाकर किसी निरापद जगह रख देते हैं और मौका मिलने पर बसियौरा भी उड़ाते हैं।

हमारे निशानची और विशेषज्ञ शिकारी लोग अपनी नशे की सूई लगी बंदूक लिए मचान पर बैठे-बैठ मक्खी मारते रह जाते हैं। बाघ कब आया, कब गया, उन्हें कुछ पता नहीं चलता। कुछ कैमरों में जरूर बाघ की आधी-अधूरी तस्वीरें कैद हुई हैं। लेकिन समूचा बाघ उनमें भी नहीं दिखता।

कई बार तो बाघ-पकड़ू दल मचान पर बैठने के बजाय खुद ही पिंजरे में बैठा कि हो सकता है उन्हीं की इत्र-वसित गंध पाकर बाघ महाशय पिंजरे के आस-पास आएँ और उनको नशे की सूई ठोककर बेहोश कर लिया जाए। लेकिन बाघ भी कुछ कम सयाना नहीं है। ऐसे में वह पिंजरों के आस-पास भी नहीं फटकता। अब कीजिए आप क्या करेंगे?

कुल मिलाकर बड़ा ही मजेदार माहौल बन गया है। अपने शासन की होशियारी की पोलें खुल रही हैं। हम खुद को बड़ा होशियार और जीनियस समझते हैं किन्तु एक बेअक्ल जानवर को नहीं छका पा रहे हैं। इस प्रकार एक-दो दिन नहीं, बल्कि पूरे दो महीने से यह जंगली बाघ बेखौफ घूम रहा है। घूम ही नहीं रहा, बल्कि कभी बकरी, तो कभी भैंस के पाड़े और कभी सूअर की दावत भी उड़ा रहा है। और हमारे सरकारी महकमे के लोग उसे पकड़ना तो दूर, ठीक से देख भी नहीं पा रहे।

नतीजा यह है कि आस-पास के कई गाँवों में दहशत का माहौल है। लोग अपने घरों से बाहर नहीं निकल रहे। पूरे इलाके में आमों के बाग़ हैं, जो इस समय बौर से लदे हुए हैं। पिछले साल आम की फसल बिलकुल न के बराबर हुई थी। हर दूसरे साल आम की पैदावार अच्छी होती है। इस बार बारिश अच्छी हुई। सरदी भी खूब पड़ी। लिहाजा इस बार आम की बंपर पैदावार की आशा की जा रही है। लेकिन बौराए आमों पर अगर समय से दवा का छिड़काव नहीं किया गया तो बात किसानों के हाथ से निकल जाएगी। उधर गेहूँ की फसल भी खूब तैयार हो गई है। रुक-रुक कर हुई वर्षा और लंबे समय तक खिंची सर्दी के कारण इस साल गेहूँ की फसल भी बंपर रहने की आशा है। लेकिन उसकी देख-रेख के लिए लोग अपने घरों से निकल नहीं पा रहे। कहीं खरगोश-खरहे और नीलगाय-हिरण पर घात लगाए बैठे बाघ ने उन्हें ही अपना शिकार समझ कर हमला बोल दिया तो?

सुनते हैं कि चुनाव वाले दिन भी इन इलाकों के लोग वोट डालने के लिए कम ही निकले। पाँच साल में एक बार दिखने वाले नेताजी के लिए अपने घर के दरवाजे पर आकर बैठी इस मुसीबत के मुँह में सिर कौन डाले! लोग कहते हैं कि नेताजी को अगर इतनी ही जरूरत थी हमारे वोटों की, तो इस बाघ नामक बला को समय रहते पकड़वा क्यों नहीं दिया?

हमें उन निरीह ग्राम-वासियों पर दया आती है, जिनका हर पल आतंक और भय के साए में बीत रहा है। साथ ही, उस पूरे तंत्र पर तरस आता है, जो हर तरह से सुविधा-संपन्न होने के बावजूद केवल अपने काहिल और गैर-अनुशासित रवैए के कारण एक मामूली से बाघ को नहीं पकड़ पा रहा। कितने अफसोस की बात है कि आप चारा लगाते हैं और शिकार आपका चारा खाकर पूँछ हिलाता हुआ निकल जाता है। सवाल यह है कि आपने चारा लगाया तो क्या सोच कर लगाया? जब शिकार आपका चारा खा रहा था तो आप खुद कहाँ निकल लिए थे? कहीं ऐसा तो नहीं कि आप खुद भी खा-पीकर टुल्ल हो गए थे और आपको यह अहसास ही नहीं रह गया था कि आपको अपने चारे पर हर समय निगाह रखनी है, ताकि जब शिकार उसे खाने पहुँचे तो आप उसे बेहोश करके पकड़ सकें।

यह पूरा प्रकरण हमारे तंत्र की कार्य-पद्धति पर एक बड़ी सार्थक टिप्पणी करता है। अकसर हम इसी शैली में काम करते हैं। शहर के चौराहों पर लाल बत्ती दिखने पर वाहन रुक जाएं, ऐसी व्यवस्था हम नहीं करते। अलबत्ता लाल बत्ती के पार जरूर अपनी मोटरसाइकिल या जीप लिए खड़े रहते हैं, ताकि कोई गाड़ी लाल बत्ती पार करके निकले और हम उसका चालान बनाएं या उसके एवज में जो भी हमें मिल जाए वह ग्रहण करें। क्या हमें लाल बत्ती से पहले नहीं खड़ा होना चाहिए था? आरटीओ के दफ्तर में गाड़ियों की फिटनेस के प्रमाणपत्र दिए जाते हैं। यानी हम सुनिश्चित करते हैं कि कोई अनफिट गाड़ी सड़क पर न चले। क्या कभी उनको चलानेवाले ड्राइवरों की फिटनेस के लिए प्रमाणपत्र जारी करने पर भी हमने विचार किया है? सरकारी बसों में यात्रा करनेवाले जो यात्री शराब नाम की वाहियात शै की गंध पहचानते हैं, वे बता सकते हैं कि रात को अकसर इन बसों के ड्राइवर पिए रहते हैं। अपने परिवार से महीनों दूर रहने वाले ट्रक ड्राइवरों की तो पूरी जिन्दगी ही सड़क किनारे बने ढाबों पर खाते हुए और हर सौ कदम की दूरी पर बने ठेकों पर पीते हुए कट जाती है। स्त्री देह का सुख पाने के लिए ये ड्राइवर अकसर ऐसी महिलाओं के संपर्क में आते हैं जो कुछ रुपये लेकर इन्हें थोड़ी-सी तृप्ति और ढेर सारी बीमारियाँ दे देती हैं। नींद तो उनकी शायद ही कभी पूरी होती हो। ऐसे ड्राइवरों की फिटनेस जाँचने के बारे में कभी तंत्र ने सोचा है?

जब देखो तब खबरें आती हैं कि अमुक-अमुक बस्ती में इतने लोग जहरीली शराब पीकर मर गए, इतने अंधे हो गए। इतने लोग जहरीला रंग लगाने से मर गए। इतने बच्चे जहरीला पुष्टाहार खाने से अस्पताल पहुंच गए। और नहीं तो हमारे रेलवे स्टेशनों पर गाड़ियों के आने-जाने की सूचना देने और बीच-बीच में मनोरंजक कार्यक्रम दिखानेवाले टेलीविजन पर अश्लील फिल्में तक चल जाया करती हैं। क्या कभी किसी ने सोचा है, कि बार-बार ऐसा क्यों होता है?

सच्चाई तो यह है कि हम एक बेहद गैर-अनुशासित तंत्र का हिस्सा हैं। यहाँ सब कुछ राम भरोसे चलता है। लोगों को अपनी जिम्मेदारी का अहसास नहीं रहता। हम चारा बाँधते हैं और खुद गाफिल हो जाते हैं। हमारा तंत्र उन लोगों से बना है जो महज तनख्वाह के लिए काम करते हैं और चौबीसों घंटे, हर दिन, हर महीने तनख्वाह का ही चिन्तन करते रहते हैं। उसके एवज में हमें काम भी करना चाहिए, ऐसा सोचने वाले लोग बहुत विरल हैं। बल्कि ज्यादातर लोगों की कोशिश तो यही रहती है कि पूरी की पूरी तनख्वाह बैंक में सूखी बच जाए, और उनके खर्चे ओवरटाइम, टूर और उल्टे-सीधे बिलों के बूते ही पूरे हो जाएं। बल्कि यदि हो सके तो ये इन्कम भी बच जाए और कोई पार्टी, कोई जरूरतमंद आसामी उन्हें ऊपर से या मेज के नीचे से कुछ पैसे दे दे, उनके घर का जरूरी सामान और सुख-सुविधा की वस्तुएं गिफ्ट की शक्ल में पहुँचा जाया करे। इस ऊपरी आय के लिए किए गए उद्यम को ही लोग मेहनत का नाम देते हैं। बहुत से लोग इसी काम को निपटाने के लिए देर रात तक दफ्तरों में आंखें फोड़ते रहते हैं।

लिहाजा हमें पक्का यकीन है कि बाघ पकड़ने में जुटा पूरा महकमा बहुत मेहनत कर रहा है। उसे मेहनत करते दो महीने हो चले हैं। वह चारा लगाता है और बाघ उसे मजे में खाता है। हमें न जाने क्यों लगता है कि चारा खाने का मजा बाघ को अकेले नहीं मिल रहा। इस पूरे प्रकरण से जुड़े जितने लोग हैं, सबको अपने-अपने हिस्से का चारा बदस्तूर मिल रहा होगा। इसीलिए वे चाहेंगे कि बाघ यूं ही छुट्टा घूमता रहे। इस लिहाज से बाघ का छुट्टा घूमना उस मुकद्दमे की तरह है जिसमें तारीखें पड़ती हैं, सुनवाई होती है, किन्तु कोई निर्णय नहीं आता। हर तारीख पर मुवक्किल अपने वकील को पुजापा चढ़ाता है और अगली तारीख लेकर घर लौट जाता है। कितने ही मुकद्दमे पुश्त दर पुश्त ऐसे ही चले चलते हैं।

पेशे से मैं एक हिन्दी अधिकारी हूँ। मेरे महकमे में अंग्रेजी नाम की बाघिन न जाने कब से घुसी बैठी है। मुझे उसे पकड़कर कैद करना है। लेकिन जिस दिन मैं उसे पकड़कर पिंजरे में डाल दूँगा, उसी दिन मेरी प्रासंगिकता खतरे में पड़ जाएगी। फिर न अनुवाद का कोई काम बचेगा, न राजभाषा नीति के कार्यान्वयन के लिए कोई टोना-टोटका करने की गुंजाइश बचेगी। तब मैं करूँगा क्या? जब तक अंग्रेजी रूपी बाघिन का आतंक है, तब तक मुझ जैसे हजारों भाई लोगों के पास काम है। जो लोग काम करने के बजाय कोरे भाषण और उपदेश देने को ही काम समझते हैं, उनके पास भी उनकी रुचि के अनुरूप वैसे-वैसे काम हैं। समितियाँ हैं, बैठकें हैं, दौरे हैं, निरीक्षण हैं, उपहार हैं, पर्यटन है, भांति-भांति की नौटंकी है और उस सब के ऊपर मोटे-मोटे टीए बिल हैं। यानी वह सब कुछ है, जिसके लिए सरकारी नौकरी की जाती है।

गाँव में बाघ का आना वैसा ही है, जैसे सरकारी तंत्र में कमाई के स्रोत का अचानक प्रकट होना, जैसे भूचाल और बाढ़ जैसी आपदाओं के आने पर राहत कार्यों का होना। भुक्त-भोगी चाहता है कि ऐसी मुसीबत उसे न झेलनी पड़े, लेकिन राहत-कार्य करनेवाले महकमों के लोग चाहते हैं कि ऐसा बार-बार हो, ताकि उनको अपनी डबल रोटी पर मक्खन की मोटी परत चढ़ाने का मौका मिलता रहे। किसी-किसी भाई को हमारी इस प्रपत्ति पर ऐतराज भी हो सकता है। होना भी चाहिए। स्वाभाविक है। यदि न हो तो हम मानेंगे कि हमारा समाज विचार-शून्य हो चला है। साथ ही, किसी के आपत्ति न करने पर हमें यह मानने पर विवश होना पड़ेगा कि हमारे ढपोरशंखी समाज में सच को सच मानने की तमीज पैदा हो गई है।

यदि अज्ञेय आज होते तो इस प्रकरण पर शायद ऐसा कुछ लिखते- बाघ रे बाघ/ तू तो निकला घाघ/ खाया-पिया खिसक लिया/ असली जीवन तूने ही जिया/ तूने जंगल के प्रहरी महान सपूतों को छकाया/ तेरी टोह में जो आए, उनसे भी कैसा अद्भुत प्रेम निभाया/ खुद तो खाया ही/ उन मरदुओं को भी खिलाया/ इस नाते तू सचमुच है जंगल का राजा/ हमने चारा बाँधा है फिर से/ और चल दिए हैं खा-पीकर सोने/ ओ रे बाघ, प्यारे, सलोने / आ जा और इस चारे को भी खा जा। अरे, लोग तो खाकर पचा गए भैंसों के हिस्से का भी चारा/ फिर तुझे कैसी शर्म/ तूने दूसरों का हक कहाँ मारा/ तू तो संरक्षित पशु है हमारा/ आ रे बाघ/ खा रे बाघ/ जंगल ही नहीं, देश के गाँव-शहर, चप्पा-चप्पा देश का/ तुझको ही तो पुकारे बाघ।

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