शनिवार, 17 मार्च 2012

शिल्‍पी चौहान का आलेख - क्यों होता है महिला-उत्पीड़न?

 

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शिल्‍पी चौहान (अनुसन्‍धान कर्त्री)

वनस्‍थली विद्यापीठ (राजस्‍थान)

shilpichauhan.chauhan@gmail.com

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जितना अधिक भारत का पुराना इतिहास है, उतना ही पुराना है महिला उत्‍पीड़न का इतिहास। आज आंकडे बताते हैं कि दुनिया भर में औरतों के खिलाफ उत्‍पीड़न बढ रहा है लेकिन यह कोई बात नहीं है। वास्‍तव में औरतें सदियों से लगातार उत्‍पीड़न और अत्‍याचार का शिकार होती रही हैं। चाहे दुनिया का कोई सा भी महाद्वीप या राष्‍ट्र हो, हर जगह महिलाओं को पुरूष मानसिकता द्वारा उत्‍पीड़न झेलना पड़ता है।

महिलाएं स्‍वभाव से अपेक्षाकृत कोमल होती हैं और वे ज्‍यादा प्रतिरोध नहीं करती हैं और शायद उन्‍हें विभिन्‍न प्रकार के उत्‍पीड़न और अत्‍याचार को सहन करना पड़ता है। यह उत्‍पीड़न कई प्रकार का होता है।

महिलाओं को यौन उत्‍पीड़न का शिकार होना पड़ता है तो कई बार बलात्‍कार के रूप में वे मानसिक उत्‍पीड़न का शिकार हो जाती हैं। यौन उत्‍पीड़न अब शहरों में ही नहीं गावों और छोटे कस्‍बों में भी देखने को मिल रहा है। यही हाल बलात्‍कार का है बलात्‍कार कितना घृणित अपराध है इसका अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि बलात्‍कार के एक मामले की सुनवाई करते हुए माननीय उच्‍चतम न्‍यायलय ने एक बार कहा था कि हत्‍यारा तो केवल किसी को जान से मारता है जबकि बलात्‍कारी तो पीड़िता की आत्‍मा को मार देता है। उत्‍पीड़न का शिकार महिलाओं को घर से बाहर तो होना ही पड़ता है साथ ही घर के भीतर भी अपनों के हाथों भी उन्‍हें उत्‍पीडित होना पड़ता है। वैवाहिक हिंसा के रूप में महिलाएं अपने घरों में पिटती हैं, यह एक शर्मनाक तथ्‍य है।

समाज को एक नई दिशा देने का दावा करने वाला मीडिया भी महिला उत्‍पीड़न के किसी मौके को छोड़ता नहीं है। चाहे टी0 वी0 हो या सीनेमा, पत्र पत्रिकाएं हों या अन्‍य समाचार माध्‍यम, हर जगह दर्शकों को नग्‍न महिला शरीर की अश्लीलता परोसी जाती है। इस अश्लीलता के कारण किसी भी महिला का सिर शर्म से झुक जाता है और वो उत्‍पीड़ित अनुभव करती है। विवाह को एक पवित्र बंधन माना जाता है लेकिन आजकल दहेज के नाम पर नवविवाहितों को विभिन्‍न प्रकार के उत्‍पीड़न और अत्‍याचार झेलने पड़ते हैं।

अगर हम अपने देश की बात करें तो लगभग हर राज्‍य में महिला उत्‍पीड़न की घटनाएं बहुत तेजी से बढ़ रहीं हैं। कोई भी क्षेत्र, राज्‍य, वर्ग, समुदाय, धर्म हो, हर जगह महिलाओं को भीषण उत्‍पीड़न का षिकार होना पड़ता है। दुर्भाग्‍य की बात तो यह है की महिलाओं के विरूद्ध उत्‍पीड़न, माँ की कोख से शुरू हो जाता है। जन्‍म लेने से पहले ही बालिकाएं, भ्रूण-हत्‍या के दंश से मिट्टी में मिल जाती हैं। जन्‍म लेने के बाद उन्‍हें लिंगीय भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। जब वे स्‍कुल जाती हैं तो उन्‍हें सहपाठियों और शिक्षकों द्वारा यौन उत्‍पीड़न का शिकार होना पड़ता है। कई बार स्‍कूल परिसर में ही बलात्‍कार का भी शिकार हो जाती हैं। किशोर होने पर भी उनकी मुसीबतें कम नहीं होती हैं।

युवतियों को अगर स्‍कूल-कॉलेजों में यौन उत्‍पीड़न का शिकार होना पड़ता है तो कार्यस्‍थल पर भी ऐसा होता है। महिला यौन उत्‍पीड़न के संदर्भ में माननीय सर्वोच्च न्‍यायालय सख्‍त निर्देश दे चुका है लेकिन कार्यस्‍थल पर उत्‍पीड़न रूकने का नाम नहीं ले रहा है।

महिलाओं के खिलाफ होले वाले उत्‍पीड़न से संबंधित आंकड़े, भारत सरकार के राष्‍ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्‍यूरो द्वारा ‘क्राइम इन इड़िया‘ में संकलित किए जाते हैं। आंकडे बताते हैं हि महिलाओं के उत्‍पीड़न से संबंधित यौन उत्‍पीड़न, छेडछाड़, बलात्‍कार, दहेज प्रताड़ना, वैवाहिक तथा पारिवारिक हिंसा, वेष्‍यावृत्‍ति आदि के मामले बढ़ते जा रहे हैं।

राष्‍ट्रीय सामाजिक प्रतिरक्षा संस्‍थान, राष्‍ट्रीय महिला आयोग, केन्‍द्रीय अन्‍वेषण ब्‍यूरो आदि के आंकडे महिलाओं के उत्‍पीड़न की कहानी ही कहते आ रहे हैं। भारत के हर राज्‍य में महिला उत्‍पीड़न के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। चाहे देश के सबसे निर्धन राज्‍य उड़ीसा और बिहार हों या फिर आबादी के मामले देश का सबसे बड़े राज्‍य उत्‍तर प्रदेश हो या देश की राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्‍ली की, हर ओर महिला उत्‍पीड़न अपने चरम पर है।

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