प्रभुदयाल श्रीवास्तव की होली विशेष कुंडलियाँ

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  कुंडलियां
                    [1]
  होरी फिर से आ गई तन पर दे रंग डार‌
  नयनों की तलवार से कर दे दिल पर वार
  कर दे दिल पर वार अरे मन घायल कर दे
  बातों ही बातों में उसको पागल कर दे
  तन और मन पर हाथ साफ पहले कर लेना
  फिर धीरे से उसका सारा धन हर लेना।
                  [2]
  बहती गंगा में सभी आज धो रहे हाथ‌
  किसी तिजोरी को प्रिय तू भी करदे साफ‌
  तू भी करदे साफ करोड़ों तू भी खाले
  खा खाकर सारी दुनियां में नाम कमा ले
  न जानें फिर ऐसे स्वर्ण दिवस कब आयें
  क्यों चूकें शुभ घड़ी और रोयें पछतायें।
                 [3]
खाने पीने में प्रिये नहीं झिझकना आज‌
जिसने गप गप खा लिया वही बना सरताज‌
वही बना सरताज उसे सबने पहचाना
दुनियां वालों ने भी उसका नाम बखाना
जो जितना ज्यादा खाता वह् पूजा जाता
उसके आगे अखिल विश्व अब शीश झुकाता।
               [4]
एक जमाना था सखे बड़ी बुरी थी जेल
निकला करता था वहां बेईमानों का तेल‌
बेईमानों का तेल जेल से सब थर्राते
सुना जेल का नाम नाम से ही डर जाते
किंतु आजकल जेल स्वर्ग का सुख देती है
गुंडों तक को को हाय मंत्री पद देती है।
               [5]
लगती अब तो होड़ है भर देंगे जी जेल‌
जेल हो रही आजकल है कुर्सी का खेल‌
है कुर्सी का खेल जेल जो हो आता है
परम पिता परमेश्वर का पद पा जाता है
तुम भी जाकर यार जेल में रहकर आ ओ
एम एल ए या सांसद की कुर्सी पा जाओ।
               [6]
यूं तो होली पर सभी लगा रहे थे रंग‌
भैयाजी के थे मगर अलग तरह के ढंग‌
अलग तरह के ढंग थोबड़ा हिला रहे थे
मजे मजे से सबको चूना लगा रहे थे
तू भी जा उनके चरणों में शीश झुकाले
चूना लगवाकर तू अपना भाग्य जगाले।

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