मोतीलाल की कविता

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घरों में रात चढ़ गयी है और
अस्मिता की मद्धिम कराह
तीसरे पहर में भी रेलवे स्टेशन की तरह जाग रही है

बेजान आँचल की हवा
नीले समुद्र से होकर नहीं बहती और अनवरत शोक गीत टीवी पर जारी है
नहीं यहाँ कोई आम नहीं बहुत ही खास
नहीं रहे है उनके बीच और
भाषा के अंतिम शब्द
प्याली में गिर चुके हैँ

इस विकट शहर को अभी तक
ऊब ने नहीं छुआ है
रेत का लहराता टापू
प्रभु के मौन की तरह चुप है
इसी शहर में
जैसे जंगल घुस आया है

चीटियों के घरों से होकर जो रास्ता
नींद के रास्ते से मिलता है
वह निवास आकृति कहीं नहीं मिलती है न कमीज के पाकेट में
न किताबों के अटारी में

प्रक्रिया बदलाव की
सिमट गयी है टीवी पर
और ज्यामिति के कोण हमारे पांव में बदल गये हैँ और
हो गये हैं हम जरा से टेढ़े
इस टेढ़े समय में

हमने पाल लिया है नीले पर्वतों की जगह देह मुक्त सुन्दरता को
और ड्राइंगरूम में बचा लिया गया है सीधे-साधे समय को
शैँपू किये गये बालों में

प्रतीक्षा है रात कब उतरेगी
जैसे बिल्ली उतरती है पेड़ से ।

* मोतीलाल/राउरकेला 

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1 टिप्पणी "मोतीलाल की कविता"

  1. बेजान आँचल की हवा
    नीले समुद्र से होकर नहीं बहती और अनवरत शोक गीत टीवी पर जारी है
    नहीं यहाँ कोई आम नहीं बहुत ही खास
    नहीं रहे है उनके बीच और
    भाषा के अंतिम शब्द
    प्याली में गिर चुके हैँ..
    कोमल भावो की और मर्मस्पर्शी.. अभिवयक्ति .......

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