शुक्रवार, 23 मार्च 2012

प्रमोद भार्गव का आलेख - कथा-कविता समय के बहाने आकाशवाणी का ठसे और ठूंसों हुओं का साहित्‍य-सम्‍मेलन

 

शिवपुरी/आकाशवाणी शिवपुरी द्वारा आयोजित दो दिवसीय साहित्‍यिक आयोजन ने ठूंसे व ठसे गए साहित्‍यकारों के कारण गरिमा खो दी। ऐसा इसलिए हुआ क्‍योंकि देश के जिन जाने माने कथाकारों और कवियों को आयोजन में हिस्‍सा लेना था, ऐन वक्‍त पर एक-एक करके ज्‍यादातर ने शिवपुरी आने से इनकार कर दिया। इस कारण कार्यक्रम किसी तरह तरह से संपन्‍न हो जाए के नजरिए से आकाशवाणी ग्‍वालियर के आयोजनकर्ताओं को आयोजन की कमान सौंप दी गई। जिसका नतीजा यह निकला कि कुछ तो साहित्‍यकार ठूंस दिए गए, तो कुछ अपनी पहुंच और खुशामदी आचरण के चलते ठस भी गए। करीब दो दर्जन कवि, कथाकारों को अवसर दिया गया, लेकिन इस आयोजन का दुखद पहलू यह रहा कि पिछड़े और दलित वर्ग से एक भी साहित्‍यकार को आमंत्रित नहीं किया गया। नौकरशाही की मनमानी के चलते जिले के वरिष्‍ठ साहित्‍यकारों को भी नकारा गया।

दो दिनी इस आयोजन का एक सत्र कविता समय के नाम से समकालीन कविता के चुनिंदा कवियों के लिए समर्पित था तो कहानी सत्र समकालीन कहानी के लिए। आकाशवाणी शिवपुरी द्वारा श्रोताओं को जो आमंत्रण दिया गया था, उसमें आमंत्रित कवियों में डॉ. परशुराम शुक्‍ल विरही शिवपुरी, कुमार अम्‍बुज भोपाल, निरंजन श्रोत्रिय गुना, हरिओम राजौरिया अशोकनगर, पवन करण ग्‍वालियर, नासिर अहमद सिंकदर दुर्ग, पंकज राग भोपाल, और बृज श्रीवास्‍तव विदिशा शामिल थे। कविता पाठ का समय निकट आया तो इनमें से कुमार अम्‍बुज, पवन करण और पंकज राग ने न आने की लाचारी जता दी।

चूंकि आकाशवाणी के पास धनराशि बडी मात्रा उपलब्‍ध थी और इसे हर हाल में 31 मार्च तक ठिकाने लगाना था। इसलिए राशि समर्पित (लेप्‍स) न करनी पड़े इसके लिए जरूरी था कि किसी भी तरह खानापूर्ति कर आवंटन खत्‍म किया जाए। इस लिहाज से किसी भी तरह कवियों को बुलाने की जबावदारी ग्‍वालियर के एक ऐसे कार्यक्रम अधिकारी को सौंपी गई, जो शेर-शायरी रचने के शौकीन हैं और मंचीय आयोजनों के जोड़तोड़ में माहिर माने जाते हैं। लिहाजा मत चूको चौहान की तर्ज पर उन कवियों और गजलकारों को आमंत्रित किया गया जो परस्‍पर एक दूसरे पर मेहरबानी बरतते हैं। मुंह देखी के लिए शिवपुरी के वरिष्‍ठ और प्रतिष्‍ठित साहित्‍यकार डॉ. परशुराम शुक्‍ल विरही से भी सलाह मशिबरा किया गया, लेकिन उनकी राय को तवज्‍जो नहीं दी गई। नगर के ही नवगीत विधा क्षेत्र में ख्‍यातिनाम विद्यानंदन राजीव को जानबूझकर नकारा गया। बाद में इस मनमानी की शिकायत हुई तो आकाशवाणी-दूरदर्शन के केंन्‍द्रीय निदेशक लीलाधर मण्‍डलोई ने खुद राजीव से बात करके कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया। बाद में राजीव जी से ग्‍वालियर और शिवपुरी के अधिकारियों ने क्षमा याचना भी की।

राजीव की ही तरह डॉ. हरिप्रकाश जैन,डॉ. महेन्‍द्र अग्रवाल और अरूण अपेक्षित को भी नकार दिया गया था। हालांकि बाद में महेन्‍द्र को बुला लिया गया। भरपाई की दृष्‍टि से बाद में अन्‍य कवियों को बुलाया गया उनमें रश्‍मि शर्मा, कादम्‍बरी आर्य, ब्रज श्रीवास्‍तव, निरंजन श्रोत्रिय, बैजू कानूनगो, जहीर कुर्रेशी और नासिर अहमद सिकंदर शामिल हैं। रश्‍मि और कादम्‍बरी मंचीय शोभा रहीं। उनकी रचनाओं ने महज हलकी रूमानियत का माहौल रचा।

बैजू कानूनगो की गजलें तो मर्म को छूने वाली थीं, लेकिन जिस सूक्‍ति वाक्‍य ‘‘कविता आनंद से शुरू होती है और बुद्धिमता पर समाप्‍त'' के आदर्श को आकाशवाणी के अधिकारियों के चरणों में समर्पित करके उन्‍होंने साहित्‍यिक स्‍वाभिमान को पलीता तो लगाया ही, अपनी लाचारी भी जता दी। चाटूकारिता के इस चरम ने श्रोताओं को हैरान किया।

कथा समय आयोजन के अंतर्गत प्रकाश दीक्षित ग्‍वालियर, महेश कटारे ग्‍वालियर, राजेन्‍द्र दानी जबलपुर, सुश्री उर्मिला शिरीष भोपाल और वन्‍दना राग भोपाल को बुलाया गया था। ऐन वक्‍त पर उर्मिला और वन्‍दना ने तबियत खराब हो जाने का बहाना करके आने से पिंड छुड़ा लिया। बुजुर्ग साहित्‍यकार प्रकाश दीक्षित को बमुश्‍किल महेश कटारे लाए। आकाशवाणी की गरिमा बनी रहे इसलिए महेश को यह जिम्‍मेदारी दी गई थी कि वे प्रकाश जी को लादकर भी लाना पड़े तो लाएं। पहले इस आयोजन में स्‍थानीय किसी भी कथाकार को नहीं लिया गया किंतु एकाएक पदमा शर्मा को बुला लिया गया। जबकि नगर के अन्‍य वरिष्‍ठ कथाकारों को छोड़ दिया गया।

कई साल बाद संपन्‍न इस साहित्‍यिक आयोजन के निजी स्‍वार्थों और मनमानियों के चलते शिवपुरी की आकाशवाणी की उस गरिमा को दरका दिया, जिसकी बुनियाद हरिनारायण नवरंग और सुरेश पांडे जैसे केन्‍द्र निदेशकों ने रखी थी। वैसे भी आकाशवाणी लेन देन, खुशामद और चिरौरी की परिपाटी मौजूदा समय में इतनी पुख्‍ता है कि जो नगर के गंभीर और राष्‍ट्रीय पहचान वाले साहित्‍यकार हैं, उन्‍हें तो सालों से बुलाया ही नहीं जा रहा है जबकि आकाशवाणी से बतौर पारिश्रमिक मिलने वाले पत्रम्‌ पुष्‍पम्‌ के एक भाग जो कथित और नवोदित लेखक आकाशवाणी की देहरी पर ही अर्पित कर देते हैं, उनका सिलसिला जारी रहता है। ठूंसे और ठसे लेखकों के चरित्र की यही तो बानगी है ?

प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी (म.प्र.) पिन 473-551

मो. 09425488224 फोन 07492-232007, 233882

3 blogger-facebook:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति| नवसंवत्सर २०६९ की हार्दिक शुभकामनाएँ|

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  2. बेनामी7:04 pm

    bahut hi stik batain khi hain Prmod ji ne.

    उत्तर देंहटाएं
  3. जहां सरकार होती हैं, वहां
    चाटुकारि‍ता दरकार होती है

    उत्तर देंहटाएं

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