सोमवार, 26 मार्च 2012

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य - इमर्जेंसी सूत्र

(यह व्यंग्य सत्तर के दशक में लिखा गया था जब देश में इमर्जेंसी लगाया गया था. यूँ तो कहने को स्वतंत्रता हासिल है, मगर अपरोक्ष इमर्जेंसी तो हर ओर विद्यमान है इस लिहाज से यह व्यंग्य अभी भी सामयिक है.)

इमरजेंसी-सूत्र

 यशवन्‍त कोठारी

ओम श्री डिक्‍टेटराय नमः।

अथ श्री इमरजेन्‍सी सूत्र॥ 1

टीका-हे डिक्‍टेटर महाराज आपको नमन करता हूं।

अब मैं इमरजेंसी सूत्र का शुभारम्‍भ करता हूं।

शंका-डिक्‍टेटर शब्‍द का भावार्थ समझाइये।

निवारण-बालक ! जब कुर्सी जाने लगती है तब तानाशाही का उपयोग गोंद की तरह कुर्सी से चिपकाने के लिए किया जाता है।

प्रतिशंका-ऐसी स्‍थिति में कुर्सी का मोह छूटता क्‍यों नहीं है ?

प्रतिनिवारण-वत्‍स ! तुम बालक हो, कुर्सी तुमने देखी नहीं है, अतः तुम इसकी माया, मोह व ममता को नहीं समझ सकोंगे।

त्‍वमेव माता च पिता त्‍वमेव त्‍वमेव बंधुश्‍च सखा त्‍ममेव ॥ 2

टीका-इमरजेन्‍सी में कुर्सी पर आसीन ही माता होता है, पिता होता है, बन्‍धु और मित्र होता है।

शंका-ऐसा क्‍यों होता है ?

निवारण-क्‍योंकि स्‍वाभिमानी व्‍यक्‍ति के अलावा सभी कई-कई मां-बाप रखते हैं। अतः उनके लिये कुर्सी ही मां-बाप है।

आपातकाले सर्वत्र भयः व्‍यापते ॥ 3

टीका-आपातकाल में सर्वत्र भय और आतंक का साम्राज्‍य छा जाता है।

शंका-भय कैसे आता है।

निवारण-बन्‍दूक की नली से भय का जन्‍म होता है। फौजी बूटों की आवाजें व्‍यक्‍तियों को केंचुओं की तरह मसल देती हैं ताकि बचे हुए केचुए पलटे और बूटों को चूमें।

संजय शरणम्‌ गच्‍छामि,

शरणम गच्‍छामि,

विद्याचरण शरणम्‌ गच्‍छामि॥ 4

टीका-संजय, बंसीलाल और विद्याचरण की शरण में जाना ही आपातकाल है।

शंका-ये प्रभुता सम्‍पन्‍न व्‍यक्‍ति कौन है ?

निवारण-तुम्‍हारी यह शंका बेकार है। ये सर्वज्ञात विद्यमान प्रतीकात्‍मक नाम है।

प्रतिशंका-अविद्या के चरण ने शुक्‍ल पक्ष को अमावस की रात क्‍यों कर दिया ?

प्रतिनिवारण-ताकि सनद रहे और वक्‍त जरूरत काम आवे।

पंच सूत्री च बीस सूत्री च इमरजेन्‍सी ॥ 5

टीका-पांच सूत्रीय व बीस सूत्रीय कार्यक्रम ही इमरजेन्‍सी है।

शंका-है गुरूवर। इन सूत्री कार्यक्रमों को विस्‍तार से समझाइये।

निवारण-हे वत्‍स इन पच्‍चीस सूत्रों को समझने-समझाने के लिये पच्‍चीस पुस्‍तकों की रचना करनी होगी जो असम्‍भव है।

आपातकाल सर्व अधिकार हनने ॥ 6

टीका-आपातकाल में सभी अधिकारों का हनन कर दिया जाता है।

शंका-अधिकारों का हनन कैसे हुआ ?

निवारण-रोटी के बदले हमारी स्‍वतन्‍त्रता का मुंह बन्‍द कर दिया गया। रेलों को समय पर चलाने हेतु हमने अस्‍मत बेच दी अतः अधिकार समाप्‍त हो गये।

दूर दृष्‍टि कड़ी मेहनत अनुशासन आपातकाले शस्‍त्रम्‌ 11 7

टीका-अनुशासन, दूर दृष्‍टि व कडी मेहनत आपातकाल के शस्‍त्र थे।

शंका-ये वस्‍तुएं शस्‍त्र कैसे बनी ?

निवारण-वत्‍स ! प्रधानमंत्री घर का ही हो। यह दूरदृष्‍टि थी। अनुशासन मानों वरना जेलों में मर जाओ। यह अनुशासन था और विरोधी समाप्‍त हो जाये यह कड़ी मेहनता का काम था। अतः शस्‍त्रों के रूप में ये शब्‍द प्रयुक्त हुए।

प्रेस सेन्‍सरम्‌ च नसबन्‍दी आपातकाले उपलब्‍धियम्‌ ॥ 8

टीका-सिये हुए होठों की प्रेस और नसबन्‍दी आपातकाल की उपलब्‍धियां है।

शंका-नसबन्‍दी का कार्य जबरन क्‍यों हुआ ?

निवारण-ताकि कोटा पूरा हो और देश प्रगति करे।

प्रतिशंका-प्रेस सेन्‍सर से क्‍या लाभ हुआ ?

प्रति निवारण-सर्वत्र चारणीय चाटुकारों और जय-जयकारों का साम्राज्‍य छा गया।

विनाशकाले विपरीत बुद्धि आपातकाले कुबुद्धि ॥ 9

टीका-विनाशकाल में विपरीत बुद्धि आती है और आपातकाल में कुबुद्धि आती है।

शंका-आपातकाल में कुबुद्धि ने क्‍या किया ?

निवारण-वत्‍स ये पूछो कि क्‍या नहीं किया। कश्‍मीर से कन्‍या कुमारी तक देश को एक गैस चैम्‍बर बना दिया गया। अटक से कटक तक देश के चारों और भय आतंक और जबरदस्‍ती का अन्‍धकार फैला दिया गया।

तमसो मां ज्‍योतिगर्मय ॥ 10

टीका-अन्‍धकार से प्रकाश की और चलो।

शंका-अन्‍धकार से प्रकाश कब आयेगा ?

निवारण-हर रात्रि के बाद सुबह सुहानी आती है। यही सृष्‍टि का नियम है। जिस पर मानव का बस नहीं चलता है। अतः अन्‍धकार में ही प्रकाश आता है।

सुफलम्‌ प्राप्‍नुवन्‍ति, प्रातः भजन्‍तिए अभिलाषादात्रम्‌ डिक्‍टेटराय नमः॥ 11

टीका-सुबह उठकर इस सूत्र को नियमित पारायण करने से सुफल और अभिलाषा प्राप्‍त होती है तथा डिक्‍टेटर प्रसन्‍न होता है।

इति श्री इमजेन्‍सी सूत्रस्‍य प्रथमोध्‍याय ः ॥ 12

टीका-अब मैं इस इमरजेन्‍सी सूत्र के प्रथम अध्‍याय का समापन करता हूं।

पुनश्‍च-जो सम्‍पादक इस सूत्र को प्रकाशित करेंगे वे इसके प्रभाव से मुक्‍त रह विचरण कर सकेंगे।

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यशवन्‍त कोठारी

86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर,

जयपुर-302002 फोनः-2670596

e_mail: ykkothari3@yahoo़com

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