शुक्रवार, 30 मार्च 2012

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य - सरकार के गरीब

इधर सरकारी सँस्‍था योजना आयोग ने फिर गरीब की रेखा का जिक्र कर के सरकार की किरकिरी कराई है।सरकारी आक़डों के अनुसार शहरी गरीब अलग होता है और गांवों का गरीब अलग होता है। जो गरीब शहर से गांव जाता है वो गांव जाकर अमीर की श्रेणी में आ जाता है मेरी मान्‍यता ये है कि योजना आयोग को गरीबी रेखा के बजाय अमीरी रेखा खींचनी चाहिये और अमीरो की आय तय कर देनी चाहिये।

शहर में छोटा मोटा भिखारी भी सो रुपया कमा लेता है और योजना आयोग के अनुसार ऐश कर रहा है, योजना आयोग उसकी जेब में पड़े अतिरिक्‍त पैसे को निकाल कर अपनी झोली भरना चाहता है। प्रति- भाशाली लोग योजना आयोग में घुसते है और ज्‍यादा प्रतिभाशाली लोग सरकार में विशेपज्ञ के रुप में घुसकर ये रिपोर्टे बनाते है। इन रिपोर्टों का एक ही उपयोग है कि इन्‍हे रद्‌दी की टोकरी में फेक दिया जाये।

सरकार के अमीर लोग गरीब की रेखा, समकोण, त्रिभुज, आयत, वृत्‍त बनाते रहते है और गरीब का मजाक उड़ाते रहते है। गरीब का सबसे बड़ा सपना तो शायद ये होता है कि किसी स्‍लम क्षेत्र में उसकी भी एक झोपड़ी हो या उसे फुटपाथ पर रात गुजारने के पुलिस को पैसे न देने पड़े। मगर योजना आयोग को यह सब नहीं दिखता। वो तो आंखें, कान, बन्‍द करके नई-नई महंगी रिपोर्टे बनाने में व्‍यस्‍त हो जाता है सरकार इन रिपोर्टो के आधार पर योजनाएँ बनाती है और ये योजनाएँ और इनका पैसा गरीब तक भी कभी भी नहीं पहुँचता क्‍योंकि आकंडो़ की कहानी गरीब की जुबानी नहीं सुनी जाती। वो तो अमीर की जुबानी सुनी और समझी जाती है। एक सर्वेकार का कहना है कि सरकार तेरह पैसे का विकास करने के लिए सत्‍तासी पैसे का प्रशासनिक व्‍यय कर देती है। इस तैरह पैसे के विकास में भी दुनिया भर के गपले, घोटाले, भ्रप्‍टाचार होते ही रहते है।

प्रतिभाशाली अमीर लोग जानते है उनका कुछ नहीं बनने-बिगड़ने वाला। सरकार भी गरीब गरीब चिल्‍ला कर गरीबों का मजाक उड़ाती रहती है। अक्‍सर हम लोग भी यही सुनते-कहते है,बेचारा गरीब है, या बेचारी गरीब है और गरीब की जोरु सबकी भाभी। हर कोई उसका मजाक उड़ाने के लिए अधिकृत। अस्‍पताल हो या शिक्षा के मन्‍दिर या बसस्‍टेण्‍ड या रेलवेस्‍टेशन योजना आयोग के अनुसार सब जगह अमीर ही अमीर है। सरकारी गरीबों को जीने की जरुरत ही क्‍या है, मगर जीना जरुरी है क्‍योकि ये गरीब ही तो वोट देकर अमीर सरकार बनाते हे। योजना आयोग के लोग तो वोट देने तक नहीं जा पाते।

प्रतिभाशाली अमीरों से बात चीत करना मुश्‍किल है, मगर योजना आयोग की गरीबी रेखा से उपर वाले अमीर हर जगह हर समय उपलब्‍ध है, ये खाई कभी भी नहीं भर सकती। योजना बनाने वालों सुनो। क्‍या इन गरीब अमीरो की आवाज तुम तक पहँचती है? आवाज को गौर से सुनो! बेचारा गरीब-नंगा क्‍या नहाये और क्‍या निचोड़े, मगर नंगी सरकार सुने तब ना।

सरकार के पास आंकड़ो की खेती करने वाले विशेपज्ञों की फौज होती है जो सरकारी झूठ को सच में बदलने की ताकत रखते है वे सरकार को बताते है कि हजूर सरकार-अब हमारे मुल्‍क में गरीबी खतम हो गई है। गरीब गरीबी रेखा से उपर उठ गया है हमने नई रेखा खीच दी है अब इस रेखा के नीचे कोई नहीं है। हजूर सरकार। आपके राज में सब अमन चैन है। सरकार मान लेती है। विशेपज्ञ को राज्‍यसभा में भेजने का आश्‍वासन दे देती है और सरकारी आंकड़ों में गरीबी मिटती रहती है। गरीब रोटी मांगता है और यही गलती करता है। बार-बार करता है।

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यशवन्‍त कोठारी, 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर - 2, फोन - 2670596

ykkothari3@gmail.com

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