गुरुवार, 8 मार्च 2012

कृष्‍ण कुमार चन्‍द्रा का होली गीत (छत्‍तीसगढ़ी)

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होली गीत (छत्‍तीसगढ़ी)

लड़का- मन मार देहे ओ मन मार देहे

एदे कइसे बजावंव नगारा रे, टुरी मन मार देहे

 

लड़की- मया डार देहे गा मया डार देहे

मोर होवथे बूता बिगाड़ा रे, टुरा मया डार देहे

 

लड़का- मोर टिकरा ह परे हे परिया

परसा के लाली होवथे करिया

कहां तैं भुलाये हस कहां तैं गंवागे ओ

सुरता म चुपे हे नगाड़ा ओ, गोरी मन मार देहे

 

लड़की- रंग पिचकारी हुड़दंग होली

फागुन के सररर मीठी बोली

नानपन ले गा अपन रंग मा रंगाये हस

बड़ दुरिहा मा हावे तोर पारा रे, टुरा मया डार देहे

 

लड़की- घर के दुवारी ठाढ़े हे बइरी

फिरि फिरि आवै मोर गोड़ पंइरी

कइसे मैं आवौं बता ना मयारू

लमे हावे सुरता के धारा रे, टुरा मया डार देहे

 

लड़का- बिना राधे के होरी ना होवे मैं आवथौं

तोर गली तोर खोर

मोर नगारा के बोली रे होली के टोली

तोर मया के बंधना ला छोर,

मन मोही डारे ओ मन मोहि डारे

एदे बाजे नगारा ढमाढम रे, गोरी मन मोहि डारे ।

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कृष्‍ण कुमार चन्‍द्रा

kckrishnchandra270@gmail.com

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(चित्र - मुखौटा कलाकृति - साभार नव सिद्धार्थ आर्ट ग्रुप)

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