रविवार, 4 मार्च 2012

मोतीलाल की कविता - उनका आकाश

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तुम ढंकना चाहते हो
आकाश को
फटी चादर से
जहाँ चमकता है सूरज
मुस्कुराता है चाँद
झाँकते हुए
उसी फटी चादर से

कहीँ तुम
आकाश की जगह
अपने को तो
नहीँ छुपाना चाहते
उस फटी चादर से
और बचा लेना चाहते हो तुम
मुट्ठी भर आकाश
रसोई मेँ पड़ी
दो दिन की एक बासी रोटी की तरह

कहीँ तुम 
मुट्ठी भर आकाश मेँ
बोना तो नहीँ चाहते हो
हमारे रिश्तोँ की फसलेँ
और कहीँ देखना तो नहीँ चाहते
चूल्हे की आँच
आखिर किस सीमा तक
जला पाती है
उन फसलोँ को

कहीँ तुम
मिसाईल तो नहीँ दागना चाहते
बड़ी मुश्किलोँ से बची
मुट्ठी भर आकाश मेँ
और कहीँ
बनाना तो नहीँ चाहते
तुम अपने लिए घर
लाशोँ का घर
कि इस मुश्किल समय मेँ
सेँका जा सके
कम से कम हाथ
उन लाशोँ को जलाकर

हाँ तुम
ढँक देना चाहते हो
फटी चादर से
पूरे आकाश को
और बचा लेना चाहते हो
उन फसलोँ को
उन लाशोँ को
कि कौवे की चोँच
तुमसे पहले
कहीँ चट न कर दे ।

* मोतीलाल/राउरकेला
* 9931346271

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