शनिवार, 10 मार्च 2012

सतीश चन्द्र श्रीवास्तव की कविताएँ

1.

कोई बचायेगा रहीम, तो कोई राम

कोई बचायेगा जाति, तो कोई नाम

ऐसे में कैसे बचा पाऊंगा, मैं तुम्हारा प्यार !

कोई बचायेगा देश, तो कोई लोकतंत्र

कोई बचायेगा विज्ञान, तो कोई मन्त्र

ऐसे में कैसे बचा पाऊंगा, मैं तुम्हारा प्यार !

कोई बचायेगा सौन्दर्य, तो कोई सोना

कोई बचायेगा लहरें, तो कोई सफ़ीना

ऐसे में कैसे बचा पाऊंगा, मैं तुम्हारा प्यार !

2.

सच छल है, सच प्रपंच है।

सच झूठ का खुला मंच है॥

सच धोखा है,सच आवारा है ।

सच मीठा नहीं, बस खारा है॥

सच के हाथ नहीं, न ही सच के पैर हैं।

सच अपना नहीं, सच केवल ग़ैर है।

सच को ढ़ूंढ रहे कुछ सच्चे लोग।

सच की छाया से खेल रहे लोग ।

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  सम्प्रति :- मण्डल रेल प्रबन्धक कार्यालय, इलाहाबाद

सतीश चन्द्र श्रीवास्तव
५/२ए रामानन्द नगर
अल्लापुर, इलाहाबाद

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