रविवार, 4 मार्च 2012

मोहसिन ख़ान की लघु कथा : ‘यस सर’

मोहसिन खान

“सर, गलती हो गई।”

अपने बॉस के केबिन में प्रवेश करते हुए कर्मचारी घिघियाते हुए बोला। उसे पता था कि बॉस ने उसे केबिन में क्यूँ बुलाया है।

“केवल दस हज़ार रुपयों के लिए तुम इतना गिर सकते हो !”

बॉस ने क्रोधपूर्वक आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा।

“सर, मेरे बीवी बच्चे हैं, आप अन्नदाता हैं, मैं मर जाऊंगा।”

घबराया सा हाथ जोड़कर बॉस के चरणों में जा गिरा और पैर पकड़कर माफ़ी माँगने लगा।

उस समय बॉस उसका देवता बन गया, कर्मचारी अधम,पापी,पतित और याचक बन गया।

“तुम जैसे लोगों के कारण ही सरकारी विभाग बदनाम हैं। एक तो काम करना आता नहीं है, उस पर से तुम जैसे लोगों की वजह से बदनामी झेलनी पड़ती है।”

बॉस ने कुछ समझौते वाली भाषा और लहजे में कहा। कर्मचारी के हाथों की कुछ पकड़ ढीली पड़ गयी और कुछ क्षणों में झुकी कमर से उठकर मुँह लटकाकर चरण वंदन मूद्रा में निढाल बदन से ढीठ बनकर खड़ा रहा। उसे पता था बॉस तरस खा चुके हैं। ज़्यादा से ज़्यादा गाली देंगे या फिर .....।

बॉस ने कहा- “क्या करें तुम्हारा, चलो ठीक है अब गलती की है तो खामियाज़ा भुगतना पड़ेगा।”

कर्मचारी के शरीर में कुछ जान आ गयी।

बॉस ने कहा- “एक का दो भाव लगेगा याने दस के बीस।”

कर्मचारी ने प्रसन्नता पूर्वक कहा – “यस सर। ”

--

प्रेषक :-

डॉ. मोहसिन ख़ान

जे. एस. एम. कॉलेज,

अलीबाग – महाराष्ट्र - 402 201

+919860657970

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------