मीनाक्षी भालेराव की महिला दिवस विशेष कविता

महिला दिवस

हिंद की नारी

ये जो ममता से भरी हिंद की नारी है ,

इस को मत ललकारो तुम !

ये कब बन जाये दुर्गा-काली है ,

ठहराव अगर समुद्र सा है तो,

नदियों सी रफ्तार भी है !

शीतल अगर रात सी है तो ,

सूरज सी गर्मी भी इस में !

मिठास अगर मधु जैसी है ,

विष की कडवाहट भी है !

धाराओं सी गर चंचल है तो,

पर्वतों सी अटल भी है!

फूलों सी अगर नाजुक है तो ,

चट्टानों सी मजबूत भी है ये !

मत परखो इस की शक्ति को,

ये शक्ति ही नहीं महाशक्ति भी है !

मिलन

थाम लो ना मुझे, इस कदर तुम बहो

दूरियां-दूरियां ना रहे अहसास पराये ना रहे

जिस कदर के जिस्म-जिस्म में घुलने लगे

सांसों से सांसों का मिलन हो कर रहे

थाम-------------------------------------------------

जिस कदर आसमा की बाँहों में बूँदे रहे  

बरखा धरती से आकर लिपटने लगे

जिस कदर सागर मे मचलती लहरें रहे  

सागर की बाँहों में सिमटती रहे

थाम--------------------------------------------------

जिस कदर रात के आगोश में सपने रहे

सपनों और रात का मिलन हो कर रहे

जिस कदर जिस्म में धडकने धडकती रहे

सरगोशी से अपने होने का अहसास करती रहे

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