राजा अवस्थी के दो नवगीत - घर कभी निर्मम नहीं होता

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घर-1

घर कभी निर्मम नहीं होता
कहीं माँ से कम नहीं होता

आँधियाँ कठिनाइयों की
जब चलें तो;
स्वार्थ प्रेरित छद्म  भी
जब-जब छलें तो;
पथ सभी अवरुद्ध -से
लगने लगें तो
उन क्षणों में भी कभी
बेदम नहीं होता.

नेह, धीरज,शांति,
निष्ठा  पाठशाला ;
किलकते सम्बन्ध अविरल
घर उजाला;
समाया त्रासद जब हुआ
घर ने सम्भाला
घर कभी   घर से
कहीं भी कम नहीं होता.

घर बनाने में हवन
होती रही माँ;
घर कभी  बिखरा
तो  फिर रोती रही माँ;
पिता की आँखों का घर
जब पुत्र  ने देखा
फिर  कभी नीचा
कोई परचम नहीं होता.


घर-२

घर की आस लिए लौटा घर
कोई बरसों बाद.
उमग उठा उल्लास
मोहल्ले भर में बरसों  बाद.

वही द्वार- दीवारें,छप्पर,
आँगन  पथरीला ;
गोबर लिपा महकता चौका
कुछ सीला-सीला ;

कहाँ रहे,क्यों भूले ,
कैसे बीते इतने साल,
प्रश्न लिए नज़रें चहरे पर
झेलीं बरसों  बाद.

परछी एक और दो कमरे
कितनी जगह लिए;
अपनों और अपिरिचित को भी
मन भर जगह दिए;

कोई भूले तो भूले पर
घर को याद रहे
वही नेह मकरंद लिए
मिल जाता बरसों बाद.

भाई और भतीजों के मन
बंटवारे का खटका;
नए बने पक्के कमरों में
भौजी का मन अटका;

द्वार ताकती रहीं
प्रतीक्षा में जाने कब से,
जी भर कर अम्मा की आँखें 
बरसीं बरसों बाद.

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(चित्र - नवसिद्धार्थ आर्ट ग्रुप की कलाकृति)

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