देवेन्द्र कुमार पाठक की कविताई / गीत : हाथ हवा मेँ

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रात-रात भर मन-चमगादड़;

भटका पीर-पहार, त्रास-वन.

 

खीज तोड़ती खाट, अवशता

झूल रही अल्गनियोँ पर ;

 

मकड़जाल बुनती कुंठाएँ

दुधमुँह शाख-टहनियोँ पर ;

 

चेहरे की हर दरकन से है

झाँक रहा घर का नंगापन .

 

नि:श्वांसोँ मेँ खून खाँसती

दीर्घ दुराशाएँ खाँसी-सी ;

 

जिना मानो ज़ुर्म हो गाया ,

लगे ज़िन्दगी गलफाँसी-सी;

 

हाथ हवा मेँ लाठी भाँजेँ ,

पाँव- पिँडलियाँ भुगतेँ भटकन .

 

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गीत-

बिगड़रही तस्वीर दिन-ब-दिन

 

रोज़-रोज़ की रद्दो-बदल से ;

बदल सको तो बदलो तल से.

 

ताल-समंदर पानी बरसे ,

ख़ेत पियासे,धूल फाँकते ;

हटकट कर अपनी जड़ से

 

उन्नति के हर मूल्य आँकते .

हल हो रहे भूख के मसले ,

फ़ाइल मेँ हरियाई फ़सल से.

 

पत्थरदिल संसद दिल्ली मेँ

बहा रही आँसू घड़ियाली ;

जी हुजूरिए, भँड़ुए एकजुट

 

बेमौसम गाएँ खुशहाली ;

गाँव शहर हड़बोँग मची है

भीड़, सभाएँ, रैली जलसे .

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