रविवार, 4 मार्च 2012

प्रमोद कुमार चमोली का व्‍यंग्‍य : अनोखे लाल का पत्र-वाचन

image

बहुत दिनों से हम अपने मित्र से नहीं मिल पाए थे। आश्चर्य की बात यह कि हमारे इस अजीज मित्र ने भी इस बार बिना मिले इतने दिन निकाल दिए। आप ये न समझे कि हमारे मित्र कोई चिपकू किस्‍म के आदमी हैं। दरअसल वे अत्‍यन्‍त सामाजिक किस्‍म के भावुक आदमी हैं। आज के जमाने में मनुष्‍यों की ये किस्‍म लगभग लुप्‍त होने की कगार पर है। मेरे ख्‍याल में इस संसार में वे इस किस्‍म के बचे खुचे प्राणियों की अंतिम खेप के प्रतिनिधि हैं। खैर बात उनसे मिलने की थी सो हमने चल दूरभाष यंत्र उठाया और घनघना दिया। पर घनघोर आश्‍चर्य कि उन्‍होंने अपने चल दूरभाष को अचल ही रहने दिया हमने दो-तीन दफा क्रिया को दोहराया पर उन्‍होंने कोई हरकत नहीं की। हमें लगा जो आदमी पहली घंटी में ही फोन उठाता हो, जिस आदमी के फोन उठाने की सटीक टाइमिगं से मिस कॉल करने वाले खौफजदा रहते हों। उसने फोन नही ंउठाया। हमने एक बार तो चिन्‍ता में घुल कर सोचा की उनके घर जाकर पता लगाना चाहिए। जिंदगी के झंझटों दूसरों की सिर्फ चिन्‍ता ही होती है। हालांकि आज हम वास्‍तव में चिन्‍तित हो गए थे हम उनके घर जाने को तैयार हो रहे थे कि हमारा ईगो जाग गया उसने हमसे कहा जो आदमी फोन नहीं उठाता उसके घर जाना कहाँ की समझदारी है हमने भी ईगो की मान ली और उनके घर नहीं जाने की ठान ली। फिर हम भूल गये अनोखे भाई को और झूल गए अपनी उलझनों में पर दो घंटे भी न बीते होंगे अनोखे भाई का फोन आ गया। पहले तो हमने टिट फॉर टैट करने की सोची पर अनोखे भाई का निर्दोष चेहरा सामने आ गया। हमने फोन उठाया तो श्रीमान ने बताया की 'वे आजकल बिजी है क्‍योंकि उन्‍हें रविवार को एक पुस्‍तक विमोचन के अवसर पर पत्रवाचन करना है बस उसकी तैयारी कर रहे हैं।' पत्र और वाचन दोनों बातें हमारी अल्‍प बुद्धि की समझ से परे की चीज हैं। सो हमने ज्‍यादा टेंशन लेना उचित नहीं समझा और बस औपचारिक हालचाल पूछकर उनकी बात को यूंही टाल दिया ।

रविवार का दिन था। हम छुट्‌टी के फुल मूड में थे। सुबह सुबह चाय की चुस्‍कियों के साथ हम इत्‍मीनान अखबार पढ़ रहे थे कि हमारी नजर पुस्‍तक के विमोचन के समाचार पर अटक गई जिस में लिखा था कि अलां साहब की फलां पुस्‍तक का विमोचन आज अमुख जगह होगा इसमें अध्‍यक्ष और मुख्‍य अतिथि श्री... व श्री.. होगें। इस अवसर पर पत्रवाचन श्री अनोखे लाल जी करेंगे। हमने तुरन्‍त अनोखे भाई को फोन घनघना दिया। फोन भाभी जी ने उठाया । हमने अनोखे भाई के बारे में पूछा तो हमसे शिकायत करने लगी ‘भैया आजकल इन्‍होंने पता नहीं क्‍या नया शौक पकड़ा है कहते हैं पत्रवाचन करना है। इनका ये पत्रवाचन तो हमारी सौत बन गया है न कुछ खाते हैं न कुछ पीते हैं ऑफिस से आकर कमरे में बैठे कागज लिखतेे हैं, फिर फाड़ते हैं ,फिर लिखतेे हैं, फिर फाड़ते हैं सारा कमरा कुड़ा घर बना दिया है। घर का कुछ भी काम नहीं करते और भैया आज तो हद हो गयी सुबह से ड्रेसिंग टेबल के शीशे के सामने खड़े जोर-जोर से पढ़ रहे हैं।' हम ठहरे भाभी जी के मुँह लगे देवर सो उनका शिकायत करने का अधिकार तो हम छीन नहीं सकते पर यहाँ हमें लगा की अनोखे भाई का बचाव भी आवश्‍यक था। तो हमने भाभी जी से कहा कि ‘आपने आज का अखबार देखा ? शायद नहीं देखा अगर देख लेती तो शिकायत नहीं करती।' हमने पूरे हर्ष के साथ उन्‍हें बधाई देते हुए उनको अनोखे का नाम अखबार में आने की बात बताई। वो खुश तो हुई पर शिकायत के साथ बोली ‘भैया ये तो हमसे ऐसी खुशी की बात भी नहीं बताते। खैर हमने उन्‍हें बताया कि ‘इसी तरह की धुन के पक्‍के लोगों को एक दिन दुनिया मानने लगती है। आप उनकी हौसला अफजाई करें। हर सफल आदमी के पीछे औरत का हाथ होता है । भाभी जी ने तुरन्‍त अनोखे भाई से बात करवाने की पेशकश कर दी। हमारी समझ में आ गया की भाभी जी कन्‍वींस हो गयी है सो हमने उन्‍हें कहा कि ‘हम बाद में बात कर लेगें अभी उन्‍हे पत्रवाचन का अभ्‍यास करने दो।' दूसरे दिन फिर अखबार में खबर थी जिसमें लिखा था कि ‘पत्रवाचन अनोखे लाल ने किया।' अब वो फ्री थे शाम को घूमते हुए वे हमारे पास आ धमके। हमने उनको बधाई दी। अनोखे भाई बड़े उत्‍साहित थे उन्‍होंने अपने पत्रवाचन की गाथा को विजयगाथा की तरह हमें बताया। अनोखे ने हमें पत्रवाचन के बाद वरिष्‍ठ साहित्‍यकारों के कमेन्‍ट भी हमें बताए उन्‍होंने हमें ये भी बताया एक बड़े नामचीन साहित्‍यकार ने उन्‍हें कहा कि आप तो छुपे रूस्‍तम निकले। यानि उनका उत्‍साह देखने लायक था। हमें लगा जैसे पत्रवाचन करके अनोखे लाल को छत्‍तीस करोड की चौथाई हाथ लग गई है। जैसा उन्‍होंने हमें बताया उससे हमें लगा पत्रवाचन है तो बड़ा कठिन कार्य पहले अक्षर दर अक्षर किताब पढ़ो फिर उस पर सावधानी से टिप्‍पणी करो। खैर हम अपने मित्र की इस रोमांचक सफलता से रोमांचित थे। हमारे इसी रोमांच को अनोखे भाई ने पहचान लिया और आगे इसी तरह के कार्यक्रम में हमारी उपस्‍थिति के लिए हामी भरवा ली। हमने भी भावुकता में आकर पक्‍का वादा कर लिया।

कुछ दिनों बाद ही अनोखे लाल को फिर से पत्रवाचन का काम मिल गया। उन्‍होंने तुरंत हमें फोन किया और हमें हमारा वादा याद दिलाया। हमें वादा याद था पर हम भी नेताओं की तरह इस वादे को चुनावी वादा बनाना चाहते थे पर अफसोस अनोखे लाल जनता की तरह नहीं थे। वे हमें नियमित फोन कर और एक-आध बार मिलकर वादा याद करवाते रहे। खैर हमने भी बहाने बाजी में पोस्‍ट ग्रेजुएशन कर रखी थी हमने सोचा आखिरी समय में ऐसा तीर छोडे़गें की अनोखेलाल याद रखेगें। खैर वो शुभ दिन आ गया। हम रविवार की ठंडी सुबह का गर्म रजाई में पड़े लुत्‍फ ले रहे थे कि अनोखे भाई के फोन ने डिस्‍टर्ब कर दिया। हमने एक सधे हुए नेता की तरह उनसे कार्यक्रम का समय पूछा और जरूर-जरूर आने का वादा एक बार फिर कर दिया। खैर हम फोन पर वादा करके निश्‍चिंत बैठे अखबार में खबर ढूंढ रहे थे कि अनोखे लाल प्रकट हो गए। हमारी हालत देख कर अनोखे लाल केा समझने में देर न लगी। उन्‍होंने कह ही दिया ‘यार हमको ही गोली देने का प्रोग्राम बना रखा था।' हमने ना नुकर करके अपने बचाव में तर्क दिए। उन्‍हें कहा कि ‘मित्र आप पहुंचो बस हम नहा धो कर पहुंचते हैं।' पर अनोखे ने रिस्‍क लेना उचित नहीं समझा और हमारी एक न सुनी और हमें जल्‍दी से तैयार होने को कहा। हम भी जल्‍दी से तैयार हो गए और भाई अनोखे का पत्रवाचन सुनने के लिए उनके स्‍कूटर पर ही बैठ कर रवाना हो गए।

गंतव्‍य पर पहुंच कर देखा तो पाया कि हम सबसे पहले पहुंचने वालो में थे। अभी वहां पुस्‍तक लेखक और उनके दो चार निजि मित्र ही पहुंचे थे। थोड़ी देर में ही बीस-पच्‍चीस आदमियों की भारी भीड़ वहां एकत्र हो गइ। कार्यक्रम शुरू हो गया हम सबसे पीछे की सीट पर बैठे थे। अध्‍यक्ष, मुख्‍य अतिथि, विशिष्‍ठ अतिथि और लेखक का नाम पुकार कर उन्‍हें मंचासीन किया गया। हमने सोचा अब पत्रवाचक को भी बुलाया जाएगा पर ऐसा नहीं हुआ। तत्‍पश्‍चात एक ट्रे में सुनहरी पेपर में लिपटी पांच-छः किताबे लाइ गई सभी मंचसीनों को एक एक किताब हाथ में दी गई। ट्रे में शेष रही किताबों को पकड़ाने के लिए दर्शकों के बीच से आदमी खोजे जा रहे थे। हमने सोचा अब अनोखे भाई का नंबर आ जाएगा पर दो आदमी दर्शको के बीच से बुला लिए गए उनमें अनोखे भाई नहीं थे। उन सभी ने सुनहरी कागज से किताबों को निकाला दर्शकों की तरफ किया फिर झपाझप कैमरों ने इस दृश्‍य को कैद किया बस पुस्‍तक का लोकार्पण हो गया। कार्यक्रम आगे बढा लेखक महोदय ने अपने रचनाकर्म को बताते हुए एक कहानी का वाचन किया। फिर संयोजक ने अनोखे लाल का नाम पुकारा और उन्‍हें पत्रवाचन के लिए आमंत्रित किया। अनोखे भाई ने गम्‍भीरता से पत्रवाचन किया उनका एक-एक शब्‍द सधा हुआ था। वे एक एक कहानी का सूक्ष्‍म विश्‍लेषण कर रहे थे। उन्‍होंने कहीं कहीं पर लेखक की खबर भी ली। पत्रवाचन समाप्‍त हुआ। सभी ने तालियां बजाई संयोजक महोदय ने बड़ी सावधानी से पत्रवाचक के सम्‍मान में एक दो शब्‍द कहे। कुल मिलाकर हमें ऐसा लगा की अनोखे भाई ने इसके लिए बहुत मेहनत की है। हमें लगा कि अनोखे लाल वाकई अनोखे हैं। कार्यक्रम आगे बढा मंचस्‍थ और गैर मंचस्‍थ कई वक्‍ताओं ने अपने विचार प्रकट किए। हमें लगा सभी ने जैसे अनोखे भाई के शब्‍द ही इधर-उधर कर अपना काम चलाया है। हमें पूरा विश्‍वास हो गया कि यहां दो व्‍यक्‍ति ही इस किताब को पढ़ कर आए हैं एक तो लेखक स्‍वयं और दूसरे पत्रवाचक अनोखे लाल जी।

खैर कार्यक्रम अल्‍पाहार के साथ समाप्‍त हुआ। अल्‍पाहार करते हुए भी वहां उपस्‍थित विद्वजन बौद्धिक जुगाली अब भी कर रहे थे। अनोखे लाल जी कभी इधर कभी उधर के विद्वजनों के समूहों में जाकर खड़े हो रहे थे पर कोई भी उन को तवज्‍जो नहीं दे रहा था। हमें बेचारे अनोखे लाल की हालत पर तरस आया। एक बार तो सोचा कि अभी माईक पकड़ कर खरी-खरी सुना दी जाए। हमने अनोखे को जाकर कहा भी पर वो न माने। खैर हम को तो अनोखे की पीड़ा को कम करना था। सो हमने विद्वजनों के एक समूह में जाकर जबरदस्‍ती बिना किसी संदर्भ के बोल दिया की ‘आज के कार्यक्रम का मुख्‍य आकर्षण अनोखे लालजी का पत्रवाचन था।' इस पर समूह के कुछ लोगों ने धीरे से हामी भरी और हमारी बात रखने के लिए अनोखे लाल को बधाई भी दी। उन लोगों का बधाई देने का अंदाज कुछ ऐसा लगा मानो हम पर अहसान कर रहे हो। हमें लगा शोषण का चक्र दुनिया का शाश्‍वत सत्‍य है। शोषण पर बातों की जुगाली तो बौद्धिक जगत करता है पर अनोखे का साक्षात्‌ शोषण इन्‍हें दिखाई नहीं देता। हमें लगा चलो पैसा तो अनोखे को नहीं मिला कोइ बात नहीं कम से कम मंच पर तो बैठा सकते थे और यदि इस में भी इनका अह्‌म आड़े आ रहा हो तो विमोचन की रस्‍म में किताब हाथ में देकर फोटो में शामिल किया जा सकता था। अब सारी स्‍थिति हमारी सहन शक्‍ति से बाहर थी। हमने अनोखे लाल को पकड़ा और जबरदस्‍ती वहां से घसीट लाए। सारे रास्‍ते हमने अनोखे को लताड़ा और अपने हिसाब से उस समारोह का खाका खींचा। पर अफसोस अनोखे लाल को हमारे तर्क अच्‍छे नहीं लगे और उन्‍होंने अपने इस क्षेत्र में नए-नए होने का तर्क दिया। जब तक हमारा घर आ चुका था। हमने अनोखे भाई को विदा किया। दूसरे दिन अखबार में फिर खबर थी जिसकी हेडलाइन तो अनोखे के पत्र से ली गई थी पर नाम मुख्‍य अतिथि का था पूरा समाचार ही अनोखे भाई के पत्र से ली गई पंक्‍तियों से बना था। हां एक लाइन में ये जरूर लिखा था कि ‘पत्रवाचन अनोखे लाल ने किया था।

इस घटना के बाद हम के बाद भैया हम तो ऐसे किसी कार्यक्रम में जाने की हिम्‍मत नहीं जुटा पाए। पर अनोखे भाई का जुनून है जो आज तक पत्रवाचन ही कर रहे है।

--

संपर्क :

राधास्‍वामी सत्‍संग भवन के सामने

गली न.-2, अम्‍बेडकर कॉलोनी

पुरानी शिवबाड़ी रोड

बीकानेर(राज.) 334003

2 blogger-facebook:

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------