मंगलवार, 20 मार्च 2012

गरिमा जोशी पंत का व्यंग्य - : काम चालू है

व्यंग्य

काम चालू है

वो मिल गए कल बाजार में । मिल क्‍या गए, यूं कहें कि टकरा गए। मिलने और मिलनसारिता के जमाने तो लद गए अब। अरे़ यह मैंने क्‍या कह डाला। गुजरे ज़माने की बातों से बूढ़े होने की बू आती है और स्वयं को बूढ़ा कहलाना मुझे पसंद नहीं। वैसे भी अभी तो मैं जवान हूं। खैर जो टकरा गए थे कल बाज़ार में संकरी गली में ऐसे सीधे टकराए थे कि नजरें चुराकर पतली गली से निकल जाने की गुंजाइश न उन्हें थी न हमें। भई गली पतली थी तभी तो हम टकरा गए। हां तो जो टकराए थे उन्होंने तपाक से पूछा क्‍या हाल हैं और हमने भी उतनी ही तत्‍परता से जवाब उछालते हुए कहा़ बदहाल हैं ़। इससे पहले कि वे द्रवीभूत हो हम पर दया दिखाते हमने तुरंत अपना वाक्‍य पूरा किया बदहाल हैं सड़कों के हाल। और यह कहते ही़ हमारे स्मृति पटल पर हलचल हुई और हमें याद आया कि ये महोदय तो सड़क बनाने वाले महकमे से ही नाता रखते हैं सो जैसी हमें आशा थी उसके अनुरूप ही उन्होंने

तुनकते हुए कहा क्‍यों देख नहीं रहे क्‍या मुख्‍य सड़क चौड़ी हो रही है। काम युद्धस्तर पर चल रहा है हां नहीं तो। यह हां नहीं तो उन्होंने कुछ इस अंदाज़ में कहा कि हमें लगा कि हम पर व्यंग्यबाण चला रहे हों ……”आंख के अंधे नाम नयनसुख।”

हम क्‍यों पीछे रहते भला हमने भी तुरंत व्यंग्यबाण छोड़ा ़पिछले कई सालों से सालों दर सालों से देख रहें हैं ये तख्‍ती ‘काम चालू है’। और फिर व्यंग्य के रस में सिक्‍त कुछ तिर्यक मुस्कान से हम फिर बोले …………… पता नहीं क्‍या मतलब है इसका ‘ काम चालू है’ माने ‘काम चल रहा है’ या ‘चालू किस्म का है’ और फिर अपने इस चुटकुले पर हम स्वयं ठठाकर हंस पडे़ । उन्होंने हमें घूरा और फिर दूसरा बाण छोड़ा…… ‘आप तो उच्च्च्ऽऽऽऽऽ दर्जे के साहित्‍यकार हैं …… कार्य प्रगति पर है जैसी क्‍लिष्ठ हिन्दी समझइए और समझाइए। हम क्‍यों पीछे रहते़ हमने भी कहा……। ‘हिन्दी’ …… भई वह भी क्‍लिष्ठ वाली। ये क्‍या होता है। भाईसाहब हमारे देश से हिन्दी और देश की लड़कियों के माथों से बिन्दी गायब हो गई है। हां पिछले दिनों एक गोरी विदेशी अभिनेत्री की माथे पर बिंदी धारण किए तस्वीर छपी थी हमारे समाचार पत्रों में जो बहुत मशहूर हुई थी और साथ ही यह अवधारणा भी कि इस छोटी सी बिंदिया की जड़ें ‘योगा’ तक हैं। इसे भ्रूमध्य पर लगाकर सिरदर्द़ अवसाद आदि दूर हो जाते हैं। पर छोड़िए जी यह तो दस्तूर है हमारे देश का जहां ‘योग’ विदेश से “योगा” बनकर ‘दलिया’ ‘पाॅरिज’ बनकर हमारे देश में लौट आता है।

हां तो हम कह रहे थे कि हिन्दी नहीं आती हमें। भई हिन्दी और बिन्दी तो बहन जी़ भाया जी टाइप वालों के लिए है। और ऐसा कहकर निर्माणाधीन मुख्‍य सड़क पर एक गड्ढे की ओर इंगित करते हुए हमने कहा़ वह देखिये ़‘काम चालू है’।

और हंसकर ‘सी यू देन’ कहकर पतली गली की पतली गली से निकल लिए।

गरिमा जोशी पंत

मार्च 2012

6 blogger-facebook:

  1. Pradeep1:04 pm

    This is good Bhabhi...keep it up. - Pradeep Nema

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  2. एक सुशील व्यंग, स्वागत है.

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  3. एक सुशील व्यंग, स्वागत है

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  4. garima pant2:05 pm

    aap sabhi ko dhanyavaad

    उत्तर देंहटाएं
  5. अच्छा व्यंग्य है

    उत्तर देंहटाएं

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