असग़र वजाहत का नाटक - इन्ना की आवाज़

SHARE:

इन्ना की आवाज़ पात्र सुल्तान मल्का वजी़रे आज़म दरोग़ा फसी इन्ना सिपाही तथा अन्य दृश्य : एक (सुल्तान ने बीस साल पहले जिस महल के ब...

इन्ना की आवाज़

पात्र

सुल्तान

मल्का

वजी़रे आज़म

दरोग़ा

फसी

इन्ना

सिपाही

तथा अन्य

दृश्य : एक

(सुल्तान ने बीस साल पहले जिस महल के बनाने का हुक्म दिया था, वह बनकर तैयार हो गया है। अब यही काम बाक़ी रह गया है कि महल के बाहरी दरवाज़े पर सुल्तान का नाम लिख दिया जाये। अगले दिन सुल्तान महल देखने वाले हैं।

मंच पर कुछ मज़दूर काम कर रहे हैं। दरोग़ा अपना कोड़ा लिए इधर-उधर टहल रहा है और मज़दूरों को हिदायतें दे रहा है।)

दरोग़ा : (काम करते कीरीगरों से) बस, अब एक आख़िरी काम यह बचा है कि इस महल के दरवाज़े पर सुल्तान का नाम लिख जाना है। (ठहरकर) चलो शुरू करो। नाम इतने बड़े और साफ़ हुरूफ़ में होना चाहिए कि दूर से ही नज़र आये। (ठहरकर) शाम होते-होते यह काम भी ख़त्म हो जाना चाहिए क्योंकि सुबह सुल्तान महल देखने आयेंगे। इनाम-इकराम से तुम लोगों को लाद दिया जायेगा।

(फसी आता है।)

दरोग़ा : (फसी से) जिन पत्थरों को तुम और इन्ना घिस रहे थे वे चमक गये?

फसी : जी सरकार।

दरोग़ा : मैं तुम लोगेां के काम से ख़ुश हूं। इसीलिए तुम लोग ज़िंदा भी हो। तुम लोगेां ने देखा ही है कि जिन गु़लामों ने कोताही की उनका क्या हश्र हुआ। (हंसकर) ज़िंदगी से छुट्टी पा गये। (ठहरकर) मैं तो बस काम पूरा हुआ देखना चाहता हूं।

फसी : आप हुक्म दें और हम लोग उसे पूरा न करें, ये कैसे हो सकता है सरकार। (ठहरकर) हुज़ूर, आपके बहुत एहसानात हैं हमारे ऊपर। अगर समरक़दं के बाज़ार से आपने मुझे और इन्ना को न ख़रीदा होता तो पता नहीं आज हम कहां होते।

दरोग़ा : ज़रूर तुम लोगों को वे समुन्दरी डाकू ख़रीद लेते जो तुम दोनों का दाम सिर्फ़ दस दीनार लगा रहे थे। (ठहरकर) सालों हो गये लेकिन मुझे अच्छी तरह याद है। कैसी झूलसवा देने वाली गर्मी थी और महीनों पैदल चलते हुए हम लोग यहां पहुंचे थे। (दरवाज़े के ऊपर बादशाह का नाम लिखने वाले कारीगरों से) जल्दी करो जल्दी, सूरज डूबने वाला है। सबसे पहले सुल्तान की नज़र दरवाज़े पर ही पड़ेगी। (फसी से) फसी, मैंने अपनी ज़िंदगी में सुल्तान के लिए हज़ारों गु़लाम ख़रीदे हैं। लेकिन आज तक मुझे इन्ना जैसा गु़लाम नहीं मिला। हर काम को इतने सलीक़े से करता है कि उसकी पीठ पर पड़ने के लिए मेरा कोड़ा तरस गया।

फसी : हां हुजू़र, मैं उसके साथ इतने साल से रह रहा हूं। (ठहरकर) मैंने उसे हमेशा हर आदमी के लिए सब कुछ कर देने को तैयार पाया है। उसने बीसियों बार मुझे अपना खाना खिलाया है। अगर उसका साथ न होता तो मैं मर ही गया होता। (ठहरकर) रात गये तक उन घोड़ों को पानी पिलाता रहता है जो समरक़न्द और बुख़ारा से पत्थरों की गाड़ियां खींचकर लाते हैं। मैंने उससे कई बार कहा कि घोड़ों को पानी पिलाने के लिए दूसरे ग़ुलाम हैं। लेकिन वह मेरी बात ही नहीं सुनता। हर काम ख़ुद...

(पीछे संगीत की आवाज़ आती है। फसी रुक जाता है। कुछ क्षण रुकता है फिर दरोग़ा से...)

देखिए सरकार, इन्ना चरवाहों का गीत गा रहा है।

गीत की धीमी अवाज़ आती है।

दरोग़ा : खुदा ने इन्ना की आवाज़ में बेपनाह ताक़त और कशिश दी है। वाह क्या गाता है। अजीब-सा रूहानी सुकून मिलता है। (ठहर-कर) मैं यहां ठहरूंगा, फसी। तुम जाओ।

(फसी निकल जाता है।)

कारीगर : हुज़ूर, सुल्तान का नाम लिख दिया गया।

दरोग़ा : देखूं तो ज़रा... (ऊपर देखता है। फिर कारीगरों पर बरस पड़ता है) मैं तुम लोगों को वह सज़ा दूंगा कि शैतान भी कांप जाये। (और गुस्से में) तुमने सुल्तान के नाम के बजाय... इन्ना का नाम लिखा है। (ठहरकर) ग़ुलाम इन्ना का नाम महल के दरवाज़े पर। हरामियों, क्या यह महल इन्ना ने बनवाया है जिसे मैंने समरक़न्द के बाज़ार से कौड़ियों के मोल ख़रीदा था?

कारीगर : (ऊपर देखते हुए) हुज़ूर, हमने तो सुल्तान का नाम...

दरोग़ा : लेकिन वहां इन्ना का नाम क्यों लिखा हुआ है?

कारीगर : लेकिन सरकार, हमने तो सुल्तान का नाम ही लिखा था।

दरो़गा : (कोड़ा फटकारता हुआ) मुझसे मज़ाक़ करते हो। अगर तुमने सुल्तान का नाम लिखा था तो क्या वह अपने आप मिट गया। (ठहरकर) जाओ, दफ़ा हो जाओ। सुल्तान का नाम लिखो।

(कारीगर चले जाते हैं।)

-अभी सूरज डूब जायेगा और सुह सुल्तान को दरवाज़े पर अपना नाम न दिखाई दिया तो तुम सब कुत्तों की तरह मार दिये जाओगे। (ऊपर देखकर) ये क्या हो रहा है। तुम लोग फिर इन्ना का नाम लिख रहे हो। (गुस्से में ज़मीन पर कोड़ मारता है) इन हरामज़ादों... (ऊपर से कारीगर की आवाज़ आती है) हमने सुल्तान आलम का नाम लिखा है सरकार।

दरोग़ा : (ऊपर देखते हुए घबरा जाता है) ये क्या हो रहा है?

(कारीगरों से) उतरो, नीचे उतरो। (ठहरकर) ओफ़्फ़ोह, मेरे खुदा ये क्या हो रहा है।

(कारीगर नीचे उतर आते हैं।)

दरोग़ा : (कारीगर से) ऊपर देखो।

(कारीगर हैरत से ऊपर देखते हैं)

दरोग़ा : देखो सुल्तान का नाम धीरे-धीरे मिट रहा है और उसकी जगह पर...

कारीगर : अभी हमने सुल्तान का नाम ही लिखा था। देखिए नाम के आख़िरी हुरूफ़ अभी तक दिखाई दे रहे हैं।

दरोग़ा‘ (बेतहाशा चीख़कर) तुम लोग क्या जादूगर हो हरामज़ादो? ये सुल्तान का नाम अपने आप क्यों मिट रहा है?

कारीगर : हुज़ूर, हमने अभी आपके सामने...

दरोग़ा : जाओ, फिर ऊपर चढ़ो। इन्ना का नाम मिटाकर सुल्तान का नाम लिखो। ये सब क्या मज़ाक है।

(कारीगर चले जाते हैं।)

सूरज डूबने में थोड़ी ही देर है। इन्ना का नाम मिटा दो।

कारीगर : (ऊपर से कहता है) सरकार, फिर सुल्तान का नाम अपने आप मिट रहा है। हम क्या करें हुजू़र?

दरोग़ा : (हैरत, डर और पस्तहिम्मती से) फिर इन्ना का नाम अपने आप लिखा जा रहा है। सूरज डूब चुका है। कल सुबह सुल्तान यहां आयेंगे।



दृश्य : दो

(मंच पर एक ओर इन्ना का झोपड़ा है। बहुत कम प्रकाश है। दूसरी ओर फसी घबराया हुआ अन्दर आता है। वह हांप रहा है। चेहरे पर पसीना है। फसी ज़ोर-ज़ोर से ‘इन्ना' को आवाज़ दे रहा है।)

फसी : इन्ना... इन्ना... इन्ना.. कहां हो... बाहर आओ... जल्दी आओ इन्ना...

(फसी झोपड़े में घुसने ही वाला है कि इन्ना बाहर निकल आता है। वह फसी की हालत देखकर घबरा जाता है।)

इन्ना : क्या बात है फसी, तुम इतना घबराये हुए क्यों हो?

फसी : बड़ा ग़ज़ब हो गया इन्ना... बड़ी मुसीबत...

(रुक जाता है।)

इन्ना : पहेलियां मत बुझाओ... बताओ तो आख़िर बात क्या है?

फसी : महल के दरवाज़े पर से सुल्तान का नाम अपने आप मिट जाता है।

इन्ना : (हैरत से) ये कैसे?

फसी : इससे ज़्यादा हैरतअंगेज़ बात ये है कि महल के दरवाज़े पर सुल्तान का नाम मिटने के बाद तुम्हारा नाम अपने आप लिख जाता है।

(इन्ना कुछ क्षण तक ख़ामोश रहता है।)

इन्ना : ये कैसे हो सकता है। ये नामुमकिन है।

फसी : ये सब मैं अपनी आंखों से देखकर आ रहा हूं।

(एक बूढ़ा, मज़दूर मंच पर आता है। वह बेताबी से ‘इन्ना' को आवाज़ें दे रहा है।)

बूढ़ा : इन्ना... मेरे बेटे इन्ना...

इन्ना : क्या है बाबा...

(बूढ़ा आगे बढ़कर इन्ना से लिपट जाता है और उसके चेहरे पर प्यार करने लगता है। बूढ़ा भावुक होकर रोते हुए कहता है।)

बूढ़ा : मेरे बेटे... मेरे लाल... तेरा नाम महल के दरवाज़े पर लिखा है... हां जिस महल के बनाते-बनाते मेरी आंखों की रोशनी मंद पड़ गई... मेरी मकर झुक गई... उस महल के दरवाज़े पर तेरा नाम है... तेरा...

(तीन जवान मज़दूर आते हैं। वे सब इन्ना की तरफ़ झपटते हैं। बूढ़ा अलग हट जाता है। एक जवान मज़दूर ख़ुशी से चिल्लाता है।)

जवान मज़दूर1: इन्ना... तुम्हारा नाम लिखा है वहां... उस दरवाज़े पर...

जवान मज़दूर2: हम पढ़ तो नहीं पाये पर सब कहते हैं वहां तुम्हारा नाम...

जवान मज़दूर3: इन्ना का नाम लिखा है...

(तीनों मिलकर इन्ना को अपने कंधों पर उठा लेते हैं और ‘इन्ना' कह कर ज़ोर से चिल्लाते हैं। उसी वक़्त दूसरे मज़दूर, औरतें और बच्चे भी आ जाते हैं। वो सब इन्ना को लोगों के कंधे पर देखकर चिल्लाते हैं।)

लोग : इन्ना... इन्ना...

अदमी1: इन्ना हमें चरवाहों का गीत सुनाओ...

सब : हां... हां चरवाहों की गीत...

(खूब शोर मचता है।)

आदमी2: इन्ना, हज़ार कोशिशें करने के बाद भी वो तुम्हारा नाम वहां से मिटा नहीं सके...

सब : (शोर के साथ) हां नहीं मिटा सके...

आदमी3: वही गाना सुनाओ जो हमें दीवाना बना देता है।

(इन्ना को कंधों से नीचे उतारता है। सब बैठ जाते हैं। इन्ना गाना गाता है। सब तन्मयता से सुनते हैं।)



दृश्य : तीन

(सुल्तान और मल्का महल के दरवाज़े की तरफ़ पीठ किये खड़े हैं। दोनों ने अभी तक महल के दरवाज़े पर लिखे नाम को नहीं देखा है। सुल्तान के साथ उसके वज़ीर और दूसरे दरबारी हैं।)

सुल्तान : (दर्शकों से) हम इस मुल्क के बादशाह हैं और तुम लोग हमारी रिआया हो। हम हुकूमत करते हैं तुम्हारे लिए। हम जंगें करते हैं तुम्हारे लिए। हम सुलहें करते हैं तुम्हारे लिए। और इसलिए तुम हमारा हर हुक्म मानते हो। अगर हम न रहेंगे तो तुम भी न रहोगे क्योंकि फिर तुम्हारी हिफ़ाज़त कौन करेगा? इस बात को हम भी अच्छी तरह समझते हैं और तुम भी। इसलिए हमारा हाकिम होना ज़रूरी है तो तुम्हारा महकूम होना।

(सुल्तान घूमकर दरवाज़े की तरफ़ देखता है उसे वहां इन्ना का नाम लिखा दिखाई देता है।)

-इन्ना... (सुल्तान का लहजा एकदम बदल जाता है) मेरे ख़्याल से मेरा ये नाम नहीं हैै (ठहरकर) मुझे अपना हुक्म अच्छी तरह याद है और वह नहीं था कि महल के दरवाज़े पर इन्ना का नाम लिखा जाये।

(दरवाज़े पर लिखे नाम को फिर देखता है।)

-इन्ना (नफ़रत से कहता है) दरोग़ा को हाज़िर किया जाये।

(दारोग़ा सामने आता है।)

-क्या तुम ऐसी ग़लतियों पर (इन्ना के नाम की तरफ़ इशारा करके) ये उम्मीद करते हो कि तुम्हें माफ़ कर दिया जाये।

दरोग़ा : (कांपते हुए) इसमें मेरी ग़लती नहीं है सरकार!

सुल्तान : सज़ा सिर्फ़ उन्हीं लोगों को नहीं दी जाती है जो कुसूरवार होते हैं। अगर तुम बेगुनाह हो तब भी तुम्हें सज़ा देकर ये साबित किया जा सकता है कि सज़ा और इनाम का सिलसिला जारी है।

दरोग़ा : हुज़ूर,कारीगरों ने आप ही का नाम...

सुल्तान : सज़ा और सख़्त मिलेगी। झूठ और फ़रेब से मुझे सख़्त नफ़रत है।

वज़ीर आज़म : सुल्ताने आलम, हक़ीक़त ये है कि आपका नाम अपने आप यहां से मिट जाता है और इन्ना का नाम...

मल्का : (मज़ाक़ उड़ाते हुए) मुझे रूहानी ताक़तों पर कोई यक़ीन नहीं है। इस पर कौन यक़ीन कर सकता है कि एक नाम अपने आप मिट जाता है और दूसरा लिख जाता है।

सुल्तान : इस दरवाज़े पर मेरा नाम नहीं लिखा गया इसकी सिर्फ़ तीन वजहें हो सकती हैं। हो सकता है कि नाम लिखने वाले जाहिल रहे हों। उन्हें लिखने के लिए कुछ दिया गया हो, उन्होंने लिख कुछ और दिया हो। दूसरे, बहुत मुमकिन है कि तुमने (दरोग़ा की तरफ़ इशारा करके) बेपनाह दौलत को लालच में यहां इन्ना का नाम लिखवा दिया हो। या हो सकता है कि रात की तारीकी में कोई यहां आया हो और पहरेदारों की आंख बचाकर मेरा नाम मिटा कर इन्ना का नाम लिख गया हो।

मल्का : लेकिन सुल्ताने आलम, अगर कारीगर जाहिल थे तो दरोग़ा तो पढे़-लिखे हैं। रात की तारीकी में यहां आकर आपका नाम मिटा-कर दूसरे नाम लिखने के लिए इतनी तेज़ रोशनी की ज़़रूरत पड़ती कि चोर ज़रूर पकड़ लिये गये होते। हां, ये ज़रूर मुमकिन है कि बुहत बड़े पैमाने पर...

सुल्तान : बग़ावत...

दोग़ा : हुज़ूर, मैं बेक़सूर...

सुल्तान : हां, तुम बेक़सूर हो... अगर ऐसी ग़लती की होती तो तुम यहां न दिखाई देते।

वज़ीरे आज़म : सरकार मेरी वफ़ादारी पर...

सुल्तान : तुम सबकी वफ़ादारी मेरे सामने है।



दृश्य : चार

(सुल्तान के सामने रक्कासाएं नाच रही हैं।)

सुल्तान : बंद करो ये कमर-कूल्हे मटकाना (रक़्क़ासाएं चली जाती हैं) एक नाम है जो ज़ेहन में चिपक कर रह गया है- इन्ना... (ताली बजाता है। सिपाही आता है।)

-वज़ीरे आज़म को हाज़िर किया जाये।

-(आप अपने से) कौन है इन्ना... क्या है मेरे सामने...

(वज़ीरे आलम आता है।)

-कौन है इन्ना?

वज़ीरे आज़म : आपका गु़लाम सुल्ताने आलम।

सुल्तान : (हैरत से) गु़लाम?

वज़ीरे आज़म : समरकं़द के बाज़ार से कोड़ियों के मोल ख़रीदा गया ग़ुलाम।

सुल्तान : बख़ुदा अगर मेरे बजाये वहां किसी दूसरे सुल्तान का नाम अपने आप लिख गया होता तो मुझे इतनी तकलीफ़ न होती। लेकिन एक ग़ुलाम... इन्ना को क़त्ल कर दिया जाये वज़ीर आलम... तब न इन्ना रहेगा और न उसका नाम।

वज़ीरे आज़म : सुल्ताने आम, बात उतनी आसान नहीं जितनी समझ रहे हैं।

सुलतान : (चौंकर)- क्या मतलब है तुम्हारा?

वज़ीरे आलम : ये बात अवाम को मालूम हो चुकी है कि इन्ना का नाम महल के दरवाज़े पर अपने आप लिख जाता है।

सुल्तान : ये उन्हें किसने बताया?

वज़ीरे आज़म : उन्हें ये किसी ने नहीं बताया सरकार...

सुल्तान : बिल्कुल ग़लत। अपने आप कुछ नहीं होता।

वजी़रे आज़म : सुल्ताने आलम, दूरदराज़ से लाखों लोग इन्ना को देखने आते हैं। उसके झोंपड़े के चारों तरफ़ भीड़ लगी रहती है। वे लोग इन्ना की सिर्फ़ एक झलक पाने के लिए बेताब रहते हैं। (ठहरकर) अगर उस वक़्त उनसे इन्ना उनका सिर भी मांगे तो वे दे सकते हैं। ग़नीमत यही है हुज़ूर कि इन्ना ने अभी तक उनसे कुछ मांगा नहीं है। इन्ना अब सिर्फ़ एक आदमी नहीं रह गया है ख़ुदाबंद।

सुल्तान : क्या इन्ना हमारी रिआया को हमारे ख़िलाफ़ भड़काता है?

वज़ीरे आज़म : नहीं सरकार, इन्ना उन्हें चरवाहों का नग़्मा सुनाता है और लोग झूम उठते हैं, पागल हो जाते हैं।

सुल्तान : इन्ना को जिलाबतन कर दिया जाये।

वज़ीरे आज़म : इससे अवाम में बग़ावत भड़क सकती है सरकार।

सुल्तान : क्या बकवास करते हो... बग़ावत को कुचलने के लिए हमारे पास फ़ौज है।

वज़ीरे आज़म : सुल्ताने आलम, अगर इन्ना मैदाने-जंग में चरवाहों का नग़्मा...

सुल्तान : (बिगड़कर) क्य होगा चरहवाहों के उस नग़्मे से?

वज़ीरे आज़म : उसे सुनकर आपकी फ़ौज का हर सिपाही इन्ना का दीवाना हो जायेगा।

सुल्तान : (नाराज़ होकर) लेकिन हम ये नहीं चाहते कि एक दिन हमारे चेहरे पर इन्ना का नाम लिख जाये... (ठहरकर) इस सवाल का अगर सही जवाब न मिल पाया तो... तुम वज़ीरे आज़म रह पाओगे?

वज़ीरे आज़म : मैं समझ रहा हूं हुज़ूर।

सुल्तान : हैरत की बात है कि इतनी बड़ी फ़ौज के बावजूद हम अपने आपको कमज़ोर महसूस कर रहे हैं।

वज़ीरे आज़म : सुल्ताने आलम, कुछ लड़ाइयां मैदाने-जंग में लड़ी जाती हैं और कुछ लड़ाइयों को फैसले दिलोदिमाग़ों में होते हैं। इन्ना के जिस्म पर नहीं उसके दिल पर वार होना चाहिए सरकार।

सुल्तान : (ख़ुश लहजे में) हम जवाबात के मुंतज़िर हैं।

वजी़रे आज़म : रास्ता एक ही है हुज़ूर। वो ये कि इन्ना की आवाज़ बदल जाये। वह चरवाहों का नग़्मा गा ही न सके। वह भी अपने हाथों और पैरों का उतना ही कम इस्तेमाल करे जितना मैं करता हूं।



दृश्य : पांच

(सुल्तान अपनी ख़्वाबगाह में बेचैनी से टहल रहा है। बहुत म रोशनी है।)

सुल्तान : (अपने आपसे) हमारे पास बेतहाशा तक़ात है। दुनिया में कौन है जिसे हम शिकस्त नहीं दे सकते (चीख़कर) कौन है ऐसा? (आवाज़ आती है)- इन्ना।

-इन्ना? किसने इन्ना का नाम लिया। कौन है सामने आये? (आवाज़ फिर आती है)- इन्ना, इन्ना...

(सुल्तान चारों तरफ़ देखता है। घबराहट बढ़ती है।)

-रोशनी करो, तेज़ रोशनी।

(आवाज़ आती है) इन्ना, इन्ना, इन्ना, इन्ना।

-तेज़ रोशनी करो... कोई है यहां।

(गजर बजाता है और सुल्तान उसकी आवाज़ से डर जाता है।

सिपाही सामने आता है और सुल्तान संभल जाता है)

-इन्ना को इसी वक़्त हमारे सामने हाज़ि किया जाये।

(सिपाही चला जाता है।)

-ज़ंजीरों में जकड़ा हुआ इन्ना हमरे क़दमों पर डाल दिया जायेगा... हमारे क़दमों पर... (नकीब की आवाज़ में) बाअदब बामुलाहिज़ा होशियार... हज़रत सुल्ताने आलम अबुल मुज़फ़्फ़र, जिल्ले सुब्हानी, सिकन्दरे सानी...

(इन्ना को सिपाही धक्का देते हैं और वह सुल्तान के सामने आ गिरता है)

सुल्तान : (थोड़ी देर तक इन्ना को देखता रहता है) तुम्हारा नाम महल के दरवाज़े पर अपने आप कैसे लिख जाता है?

इन्ना : (हकलाते हुए) म... मु... मुझे नहीं मालूम...

सुल्तान : इन दो कमज़ो हाथों के अलावा और क्या है तुम्हारे पास?

(इन्ना चुप रहता है)

-क्या महल तुमने बनवाया है?

इन्ना : आपने सरकार।

सुल्तान : हां, महल हमने बनवाया है लेकिन उसके दरवाज़े पर तुम्हारा नाम अपने आप लिख जाता है। क्यों? (इन्ना चुप रहता है डर की वजह से कांपता रहता है)

-महल को बनाने वाले गुलामों में हो। लेकिन कई हज़ार में सिर्फ़ तुम्हारा ही नाम अपने आप क्यों लिख जाता है?

इन्नाम : म... मु... मुझे नहीं मालूम... सर...

सुल्तान : र्को काम खुद-ब-खुद नहीं होता (सोचते हुए) क्या महल को बनाने में तुमने कोई ऐसा काम किया है जो दूसरे गु़लामों ने न किया हो?

इन्ना : न.न नहीं... ह...

सुल्तान : याद करो।

(इन्ना सोचता है)

इन्ना : ले... लेकिन वो कोई नाम नहीं...

सुल्तान : (बेताबी से इन्ना की तरफ़ देखता हुआ) बताओ तुमने क्या किया था?

इन्ना : (अटक-अटक कर कहता है) म.... मैं... घोढ़ों को पानी पिलाया करता था। उनकी जवाब कांटा ही... रात मेेरे झोपड़े के सामने... गाड़ियां निकालतीं... चढ़ाई पड़ती थी... एक दिन पानी बरसा मैंने सोचा घोड़े जब आयेंगे तो फिसलेंगे... मैंने अपना बोरिया-बिस्तर चिथड़े-चिथड़े किया... चढ़ाई पर डाल दिया... फिर घोड़े गिरे नहीं सर..

सुल्तान : (ज़ोर का क़हक़हा लगाकर) बस इतनी-सी बात। किसी बच्चे के ख़्वाब से मिलती-जुलती है तुम्हारी बातें।

(लहजा बदलकर) लेकिन इससे ये तो ज़ाहिर है कि तुम्हारे दिल में जानवरों के लिए बेपनाह हमदर्दी है... लेकिन महल के दरवाज़े पर... (ठहर कर) अगर तुम्हें कत्ल कर दिया जाए तो न तुम रहोगे और न तुम्हारा नाम।

(इन्ना डर जाता है)

-लेकिन अगर तुम्हें क़त्ल कर देने के बाद भी महल के दरवाज़े पर तुम्हारा नाम लिखा रहा तो?

(इन्ना कुछ नहीं बोलता)

-कल हम दूसरा महल बनवायेंगे। उसके दरवाज़े पर भी तुम्हारा नाम अपने आप लिख जायेगा... जाओ, निकल जाओ यहां से...

(सिपाही आकर इन्ना को बाहर ले जाते हैं। मल्का आती है)

मल्का : आधी रात का गजर बज गया। सुल्ताने आलम और आप...

सुल्तान : अभी इन्ना ज़ंजीरों में जकड़ा हुआ हमारे सामने पड़ा था। अगर हम चाहते तो उसे मसलकर रख देते... बेहद कमज़ोर... लेकिन बेहद ताक़तवर... हम इन्ना के साथ क्या करें? ये ऐसी गुत्थी है जो...

मल्का : हुजूर, इन्ना के साथ आपको वैसा ही सुलूक करना चाहिए जैसा आप अपने बाग़ी सूबेदार के साथ करते हैं।

सुल्तान : (चौंककर) वैसा सुलूक... बाग़ी सूबेदारों को तो हम सख़्त सज़ा देते हैं

मल्का : सख़्त सज़ाऐं देने के बाद सुताने आलम उन्हें इनाम भी देते हैं। आग़ी सूबेदार सज़ा और इनाम पाने के बाद सुल्ताने आलम के वफ़ादार ख़िदमतगार बन जाते हैं।

सुलतन : (थोड़ी देर सोचते रहने के बाद) यही रास्ता हो सकता है। वज़ीरे आज़म ने भी शायद इसी तरफ़ इशारा किया था। (ख़ुश होकर) एक काम तुम्हें करना होगा। इन्ना के पास जाओ। उसकी तारीफ़ में ज़मीनो-आसमान के कुलावे मिला दो। उसे एहसास हो जाना चाहिए कि वह बहुत अहम शख़्स है। उसके बाद उससे दरख़्वास्त करो कि वह वज़ीरे का ओहदा क़ुबूल कर ले। हम उसे वज़ीर बनाना चाहते हैं (व्यंग्यात्मक ढंग से) जानवरों की ख़िदमत करने का इससे अच्छा मौक़ा न मिलेगा।

मल्का : मैं पूरी कोशिश करूंगी।

सुल्तान : कोशिश नहीं, ये काम होना ही चाहिए किसी भी क़ीमत पर। (ठहरकर) लोग तूफ़ान आने से पहले अपने घरों के दरवाज़े बंद कर लेते हैं। लेकिन मैं अपने महल के दरवाज़े खोल रहा हूं। तूफ़ान मेरे महल के दरो-दीवार से सिर टकरा-टकरा कर ख़त्म हो जाएगा।



दृश्य : छह

(मल्का दो सिपाहियों के साथ इन्ना के झोपड़े के सामने खड़ी है)

सिपाही : इन्ना... इन्ना बाहर निकलो।

इन्ना : (आदाब अर्ज़ करता है) कैसे आना हुआ हुजूर?

सिपाही : मल्का ए आलिया तुमसे मिलने आई हैं।

इन्ना : क्या कहा हुजू़र... खुद मल्का ए आलिया... इस वक्त... यहां... मुझसे मिलने?

मल्का : हां, इन्ना, हम खुद तुमसे मिलने आए हैं।

इन्ना : अल्लाताला बेगम साहिबा को सलामत रखे।

मल्का : इन्ना, हम अपनी और हुजूर बादशाह सलामत की तरफ़ से तुमको मुबारकबाद पेश करने आए हैं। हुजूर बादशाह सलामत को अपने ख़्याले फ़ासिद पर सख़्त अफ़सोस है। तुम्हारे बारे में उन्होंने अपना नज़रिया बदल दिया है।

इन्ना : लेकिन मल्का ए आलिया...

मल्का : महल के दरवाज़े पर तुम्हारा नाम अपने आप लिख जाने से यही साबित होता है कि तुम बेपनाह सलाहियतों के मालिक हो और हमारा फ़र्ज़ है कि हम बासलाहियत लोगों की क़द्र करें।

इन्ना : मैं एक बहुम मामूली ग़रीब आदमी हूं।

मल्का : मामूली और ग़रीब होने का ये मतलइ नहीं कि तुम बासलाहियत नहीं हो। ये तुम्हारी इन्केसारी है कि तुम अपने आपको मामूली समझते हो। हम ये सच्चे दिल से मानते हैं कि तुम्हारे अन्दर ईमानदारी, इंसाफ, ईसार और ख़िदमत के जज़्बात हैं।

इन्ना : (अपनी इतनी तारीफ़ सुनकर परेशान हो जाता है और हकलाते हुए) म... म... मे... मैं...

मल्का : कोई भी शख़्स अपने बारे मेु खुद कोई राय नहीं क़ायम कर सकता। हीरे की पहचान तो जौहरी करता है।

इन्ना : लेकिन...मैंतो...बिल्कुल जाहिल हूं मल्का-ए- मोअज़्ज़मा।

मल्का : लेकिन तुम्हारे दिल में मुहब्बत का नूर है। दुनिया का बड़ा-से-बड़ा इल्म नेक जज़्बे के बग़ैर बेमानी है। तुम पढ़े-लिखे न सही लेकिन अवाम से तुम्हारी मुहब्बत, ख़िदमते ख़ल्क़ में तुम्हारी दिलचस्पी तुम्हें हमेशा हक़, इंसाफ़ के रास्ते पर गामज़न रखेगी।

इन्ना : मैंने तो ज़िंदगी भर मेहनत मज़दूरी की है और...

मल्का : मेहनत इंसान का सबसे बड़ा और बुनियादी जौहर है। तुम्हें इस बात पर फ़ख़्र करना चाहिए कि तुमने मेहनत-मज़दूरी से अपना पेट पाला है जबकि हमारी सल्तनत में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो दूसरों की मेहनत से नाजायज़ फ़ायदा उठाते हैं। मेहनत और मशक़्क़त इंसान की खूबियों को जिला देती है, उसे चार चांद लगा देती है।

इन्ना : मल्का-ए- मोअज़्ज़मा, ये आपकी क़द्रदानी है वरना नाचीज़ ग़ुलाम...

मल्का : (अधिकार जमाने वाले स्वर में) इन्ना, तुम अपनी सलाहियतों को पहचानो और उनका सही इस्तेमल करो। हुजूर की दिली ख़्वाहिश है कि सल्तनत के अवाम की खुशहाली को हुकूमत का सबसे बड़ा और पहला फ़र्ज़ क़रार दिया जाये। उन्होंने ऐसे अेहेकामात हमेशा जारी किये हैं जिनपसे अवाम को फ़ायदा पहुंचने की सौ फ़ीसदी उम्मीद की जा सकती थी। लेकिन सुल्तान के तमाम मुसाहिग आराम पसंद हो गए हैं कि उनसे सल्तनत का कोई भीकाम सलीक़े से होना नामुमकिन है। दिन-ब-दिन रिआया पर जुल्म बढ़ते जा रहे हैं। सुल्ताने आलम के दिल में अवाम के लिए बेहद प्यार है। लेकिन उनकी ख़्वाहिश को अमली जामा पहनाना एक मुश्किल काम है जिसे करने के लिए ऐसे लोगों की ज़रूरत है जो पूरी ईमानदारी से कुछ कुर्बानी करने को तैयार हों।

इन्ना : आप बजा फ़रमाती हैं मल्क-ए-मोअज़्ज़मा।

मल्का : सिर्फ़ इतना कह देने से काम नहीं चलेगा।

इन्न : (हैरत से) जी?

मल्का : (अधिक सुभावने स्वर में) हमें तुम जैसे लोगों की ज़रूरत है।

इन्ना : (बहुत अधिक आश्चर्य से) य-य-ये आप क्या कह रही हैं आली-जाह? मेरी ज़रूरत है? मैं एक अदना, नाचीज़ और कम्ज़ोर ग़ुलाम क्या कर सकता हूं? न तो मैं किसी आला ख़ानदान में पैदा हुआ और न मैंने कभी किसी मदरसे में तालीम पाई है। (दर्दनाक और करुण स्वर में) मेरी पूरी ज़िंदगी तकलीफ़ों और अजाबों में गुज़री है। मुझे अब तक है हमारी झोपड़ी गांव के सिरे पर थी और मेरी मां एक नेकदिल और मासूम औरत थी। मेरा बाप कितनी बेदर्दी से उसे पीटा करता था ये सोचकर अब भी मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। सरकारी फ़ौजें हमारे गांव को तहस-नहस कर जाया करती थाीं और हम फिर बस जाते थे। एक रात रहज़नों ने हमारे गांव पर हमला किया। वो घोड़ों पर बैठे मशालें लिये गांव में घुस आयै उन्होंने क़त्लोग़ारत का बाज़ार गर्म कर दिया। घरों में आग लगा दी। मेरी मां मुझे अपने बाज़ुओं में उठाये भागी लेकिन रहज़नों ने उसे पकड़ लिया। (ठहरकर) मैं... मैं... बच्चा था लेकिन मुझे अब तक याद है मेरी मां खून से लिथड़ी कराह रही थी और वो लोग बेशरमी से हंस रहे थे। उस पर थूक रहे थे। उसके सीने में अने नैजे चुभो रहे थे और फिर वह मर गयी। रहज़नों ने मुझे ग़ुलाम बना लिया। मैं कई साल के बाद वहां से भागा। फर पकड़ा गया। फिर भागा...फिर...

मल्का : इन्ना, तुम अपने माज़ी को भूल जाओ क्योंकि तुम्हारा मुस्तक़बिल बहुत शानदार है। तुम्हारी सलाहियतों से मुतस्सिर होकर हम तुम्हें अपना वज़ीरे आज़म बनाना चाहते हैं।

इन्ना : (डरकर) नहीं खुदाबंद, ये कैसे हो सकता है?

मल्का : क्यों? ये क्यों नहीं हो सकता?

इन्ना : मैंने अपने हाात से समझौता कर लिया है मल्क-ए-मोअज़्ज़मा। मैं अपनी ज़िंदगी से मुतमइन हूं। मेरे दिल में कोई ऐसी ख़्वाहिश नहीं है जो मुझे...

मल्का : सुल्ताने आलम चाहते हैं कि ईमानदार और लायक़ लोग सल्तनत की तरक़्क़ी और अवाज की फ़लाहो-बहबूदी में उनका साथ दें। तुमको वज़ीरे आज़म का ओहदा कुबूल करने में क्या हर्ज है?

इन्ना : नहीं, ये नामुमकिन है। मैं अपने को उस अहम काम के लायक़ नहीं पाता।

मल्का : मेरी समझ में नहीं आता इना कि एक नेक इंसान होने के बावजूद तुम वज़ीरे आज़म के ओहदे को कुबूल करने से क्यों इंकार कर रहे हो। जिस इंसान के दिल में इंसानियत के लिए बेपनाह मुहब्बत का जज़्बा हो और उसे अपने ख़्यालात को अमली जामा पहनाने का मौक़ा दिया जाये, तो वो कैसे इंकार कर सकता है?

इन्ना : छोटे-छोटे काम करने में मुझे अजीब क़िस्म का रूहानी सुकून मिलता है। मैं अपनी ज़िन्दगी का ढर्रा बदल नहीं सकता सरकार।

मल्का : क्या तुम्हारी ज़िंदगी सिर्फ़ तुम्हारे लिए है?

इन्ना : क़तई नहीं।

मल्का : फिर तुम ऐसे ओहदे के कुबूल क्यों नहीं करते जिसके ज़रिये तुम अवाज की बेपनाह ख़िदमत कर सकते हो। तुम ज़ुल्म और जब्र और नाइंसाफ़ी को मिटा मोहब्बत, क़ुर्बानी और ईसार की क़दरों की मुस्तहकम कर सकते हो। (ठहरकर) तुम्हें सल्तनत के काम को अपनी मर्ज़ी से करने का पूरा इिख़्तयार होगा।

इन्ना : मैं समझा नहीं...

मल्का : बात बहुत साफ़ है इन्ना। तुम जो काम करना चाहते हो उसे करने के मौक़े तुम्हें फ़राहम किये जा रहे हैं। अगर तुम्हारे दिल में ख़िदमत का जज़्बा है तो तुम लाखों लोगों की ख़्वाहिशात को पूरा कर सकते हो, उनकी ज़िंदगी बेहतर बना सकते हो... सोचो इन्ना, ये कोई मामूली काम नहीं होगा।

इन्ना : लेकिन हुकूमत करना...

मल्का : हुकूमत करना कोई ऐसा फ़न नहीं है और न उसके लिए किसी ऐसी खूबी की ज़रूरत है जो तुम में न हो। (ठहरकर) तुम्हारे अंदर जो खूबियां हैं वही हुकूमत करने की बुनियादी शर्तें हैं।

इन्ना : (घबराकर और परेशान होकर) लेकिन मैं इंकार करता हूं।

मल्का : ये तुम्हारी ख़ुदगर्ज़ी है इन्ना।

इन्ना : (और परेशान होकर) नहीं आलीजाह...

मल्का : तुम क्यों इंकार कर रहे हो? इसकी कोई वजह नहीं है। इंकार का मतलब अवाम से गद्दारी है। अपने फ़र्ज से कोताही (ठहरकर) वज़ीरे आज़म हो जाने के बाद तुम्हारे इिख़्तयारात लामहदूद होंगे, तुम जो चाहोगे वही किया जाएगा। बोलो क्या इससे अवाम को फ़ायदा नहीं होगा? जवाब दो? बताओ?

इन्ना : (डरे हुए अंदाज़ से) हागा...

मल्का : फिर तुम इस ओहदे को कुबूल करने से इंकार नहीं कर सकते। तुम वज़ीरे आज़म हो इन्ना- अब सारी हुकूमत तुम्हारे अहकामात की पाबदं है। अपने उन ख़्यालात और ख़्वाहेशात को अमलीजामा पहनाओ जिनसे अवाम को फ़ायदा हो सके। उनकी ज़िंदगी बेहतर हो सके। इन्ना... नहीं वज़ीरे आज़म इन्ना रहती दुनिया तक तुम्हारा नाम तारीख़ के सफ़हात पर रोशन रहेगा।



दृश्य : सात

(मंच पर काम प्रकाश है। इन्ना के झोंपड़े के सामने फसी बैठा है। वह सिर झुकाए है। बूढ़ा मज़दूर धीरे-धीरे चलता हुआ उसके पास आता है।)

बूढ़ा : फसी... इन्ना कहां है?

(फसी एक क्षण तक कोई उत्तर नहीं देता।)

बूढ़ा : कहां है इन्ना...?

फसी : इन्ना को वे लोग ले गए...

बूढ़ा : कौन लोग?

फसी : सुल्तान के लोग।

बूढ़ा : ज़बरदस्ती ले गए... क्या उसे क़त्ल करने ले गए हैं।

फसी : नहीं...

(दो मज़दूर और आते हैं।)

मज़दूर-1: क्या इन्ना को सुल्तान के सिपाही ले गए?

फसी : हां।

मज़दूर-2: वो क्यों चला गया।

फसी : सुल्तान उसे अपना वज़ीर अना रहा है।

बूढ़ा : (हैरत से) वज़ीर... सुल्तान का वज़ीर...

फसी : हां।

(चार-पांच मज़दूर और आते हैं।)

मज़दूर-3: फसी, इन्ना क्य वज़ीन बन गया है?

फसी : हां।

मज़दूर-4: क्या वो यहां आता रहेगा।

मज़दूर-1: यहां आने का अब क्या मतलब है भाई।

बूढ़ा : उसे राजकाज से फ़ुर्सत ही कहां होगी।

मज़दूर-3: अगर उसका गाना सुनना हो तो क्या करेंगे?

बूढ़ा : हां उसकी जैसी आवाज़ न मिलेगी... कहीं न मिलेगी... मैं तो सारी दुनिया में भटका हूं लेकिन इन्ना जैसी आवाज़ कहीं न मिली।

मज़दूर-4: इन्ना को हम लोगों की याद तो आएगी।

बूढ़ा : (हसरत से) यादें किसे नहीं बेटे... यादें ही तो हम लोगों का सरमाया हैं।

मज़दूर-5: चलो इन्ना के पास चलें।

मज़दूर-1: ऐसी ग़लती भी न करना।

मज़दूर-2: क्यों?

मज़दूर-3: दरबार या महल के पास देख लिए गए तो सारी उम्र क़ैदख़ाने में सड़ जाओगे।

बूढ़ा : फसी तुम इतना चुप क्यों हो।

फसी : इतने साल तक इन्ना के साथ रहने के बाद अकेले झोपड़े में नहीं रहा जाता।

बूढ़ा : मुझे तो यक़ीन है... वह लौट कर आएगा।

फसी : देखो क्या होता है।

मज़दूर-4: या हो सकता है वो तुम्हें कोई बड़ा अफ़सर बना दे।

(कुछ क्षण ख़ामोशी।)

मज़दूर-1: चलो यारो चलें...

(सब उठने लगते हैं।)



दृश्य : आठ

(इन्ना का दरबार)

(इन्ना शानदार कपड़े पहने आता है। लेकिन घबराया हुआ दिखाई देता है। वज़ीरे तामीरात उसके पीछे-पीछे आते दिखाई पड़ते हैं। इन्ना वज़ीरे आज़म के तख़्त के पास पहुंचता है और वहां खड़ा हो जाता है।)

दरोग़ा : (इन्ना से) तशरीफ़ रखिए सरकार।

(इना घबराया हुआ इस तरह बैठ जाता है जैसे अभी उठ कर भाग खड़ा होगा।)

इन्ना : इन कपड़ों में मेरा दम घुटता है। मैं इन्हें उतार दूं?

दरोग़ा : ग़ज़ब हो जाएगा हुजू़र। नहीं, बिल्कल नहीं वज़ीरे आज़म। ये लिबासे फ़ाख़रा तो आपको जेबितन करना है।

इन्ना : (परेशान आवाज़ से) बहुत गर्मी लग रही है।

(दरोग़ा ताली बजाते हैं। दो गुलाम आते हैं। जिनके हाथों में पंखे हैं। वे इन्ना को पंखा झलने लगते हैं।)

इन्ना : मैं काम करना चाहता हूं। कोई काम...

दरोग़ा : (हैरत से) काम... अब आप कोई काम नहीं कर सकते बन्दापरवर।

इन्ना : इस तरह बैठे-बैठे मेरे हाथ और पैर दर्द से फटे जा रहे हैं। इन बन्द जगहों (चारों तरफ़ देखता है) में मेरी सांस घुट जाएगी।

दरोग़ा : हुक्म दीजिए सरकार।

इन्ना : (हैरत और अनिच्छा से) हुक्म।

दरोग़ा : आप कहें तो दरबारी रक़्क़ासों को इसी वक़्त हाज़िर किया जाए या जामो मीना ख़िदमत में पेश किया जाए। अगर ख़्वाहिश हो तो भूखे शेरों के पिंजरे में किसी बाग़ी की मौत का तमाशा देखिए।

इन्ना : (घबरा कर खड़ा हो जाता है) नहीं नहीं, बिल्कुल नहीं, क़तई नहीं।

दरोग़ा : जंगली जानवरों के शिकार की ख़्वाहिश होतो मीर-शिकारी को हाज़िर किया जाए।

इन्ना : नहीं, मुझे कोई ख़्वाहिश नहीं है।

दरोग़ा : सरकार, आप वज़ीरे आज़म हैं, यही तफ़रीहात आपके शायानेशान हैं।

इन्ना : (बताना चाहता है कि वह क्या करना चाहता है लेकिन बता नहीं पाता और हकलाता हुआ) म...म... मैं... (सोचने लगता है)

दरोग़ा : आप इस बहुत बड़ी सल्तनत के वज़ीरे आज़म हं।

इन्ना : बहुत बड़ी सल्तनत... कितनी बड़ी?

दरोग़ा : हुजूर, आपकी सल्तनत मग़रिब आसमान से बातें करते पहाड़ों से लेकर मशरिक़ में समंदरी साहिल तक फैली हुई है। अब पूरी सल्तनत में आपका हुक्म चलेगा।

इन्ना : मेरा हुक्म?

दरोग़ा : आपकी ज़बान से निकला हर लफ़्ज़ हुक्म होगा। आपके हुक्म से फ़ौजें जंग करेंगी और आप ही के हुक्म से सुलह होगी। आप सल्तनत के बड़े से बड़े आदमी को तोप से उड़वा सकते हैं... हसीन से हसीन औरत को आपके क़दमों पर डाला जा स...

इन्ना : नहीं, नहीं, ये सब मैं नहीं चाहता।

दरोग़ा : हुजू़र, कुछ अर्ज़ करने की इजाज़त है? (इन्ना के जवाब का इंतज़ार किये बगै़र कहता है) हुजूर, आपने बड़ी तकलीफ़ें उठायी हैं अपनी ज़िन्दगी में। आज खुदा की मेहरबानी और बादशाह सलामत की फ़य्याज़ी ने ये मुबारक दिन दिखाया है कि आप सल्तनत के वज़ीरे आज़म हैं। सरकार मेरी यही ख़्वाकहिश है कि आपके दिल से माज़ी के दाग़ मिट जायें। आपके चारों तरफ़ खुशियां बिखरी हुई हैं बंदा-परवर उन्हें अपने दामन में समेट लीजिए। हुक्म दीजिए रक़्सो सूरूर की महफ़िलें आरास्ता की जाएं जामे सेहत लुढ़काए जाएं, दमकते हुए सोने-चांदी की जिस्म आपके लम्स से पिघल जाएं। नूर की बारिश हो सरकार जिसमें आप गुस्ल करें। आप जिस चीज़ को छुएं वह सोना हो जाए वज़ीरे आज़म... सोना...

(इन्ना गु़स्से में खड़ा हो जाता है)

इन्ना : (घबराहट,ऊब और गुस्से में) निकल जाइए यहां से। आप मुझे अकेला छोड़ दीजिए, बिल्कुल अकेला।

(दारोग़ा और ख़िदमतगार चले जाते हैं)

इन्ना : (परेशान होकर अपने हाथों से सिर दबाता है) ओफ़्फ़ोह मेरे खुदा! ये मेरे साथ क्या हुआ। मैंने ओहदा क्यों कु़बूल किया? मैं वज़ीरे आज़म हूं। मैं सब कुछ कर सकता हूं। क्या मैं वाकई अपने आपको वज़ीरे आज़म समझूं? (सोचता है) अब ये मेरा फ़र्ज़ है। इस ओहदे को कूबूल कर लेने के बाद भी अगर मैंने कोई ऐसा हुक्म न दिया जिससे अवाम का फ़ायदा हो तो मेरी ज़िन्दगी अज़ाब हो जाएगी। मुझे अपने आपको वज़ीरे आज़म समझना ही पड़ेगा। हुक्म देना ही पड़ेगा...

कैसी अजीब बात है- मैं सब कुछ कर सकता हूं। मैं... मैं जिसको चाहूं अपने पास बुला सकता हूं और जो चाहूं खा सकता हूं। मेरे ऊपर कोई पाबंदी नहीं है? मेरे पास फ़ौज है जो फ़तेह के बाजे बजाती, जब मेरे गांव के पास से गुज़रती थी, तो मैं डरकर मां की गोद में छिप जाया करता था। अब मैं उस फ़ौज को हुक्म दे सकता हूं। मैं कह सकता हूं। (सेना को आदेश देने वाले स्वर में) फ़ौजियो रुक जाओ, आगे मत बढ़ो, आगे खेत हैं। पीछे मुड़ो घूम कर आगे बढ़ो (सामान्य स्वर में) हां, मैं हुक्म दे सकता हूं। (वापस आकर अपने असान मैं बैठ जाता है औ दरोग़ा को बुलाने केे लिए ताली बजाता है।)

इन्ना : मेरा हुक्म है कि पूरी सल्तनत में घोड़ों के मारने पर पाबंदी लगा दी जाय। कोई आदमी किसी थोड़े को कोड़ों से पीटते पाया जाए तो कड़ी सज़ा दी जाए।

दराग़ा : (हैरत से) जी?

इन्ना : घोड़ों को मारना नाइंसाफ़ी है। और मेरा हुक्म है कि पूरी सल्तनत की उन इमारतों को नीचा कर दिया जाए जो बहुत ऊंचाई पर बनी हुई हैं। ताक घोड़ों को चढ़ाई न चढ़नी पड़े।

दरोग़ा : (व्यंग भरे अंदाज़ में, पर सहमति प्रकट करते हुए) बहुत ख़ूब।

इन्ना : मेरा तीसरा हुक्म है कि पूरी सल्तनत में कोई श़ख़्स किसी परिंदे को पिंजड़े में न रखे। चिड़ियाघर के दरवाज़े खुलवा दिए जाएं ताकि चिड़ियां पेड़ों पर जा बैठें और आज़ादी से उउ़ सकें। चिड़ियाघरों के पिंजड़ों में चिड़ीमारों को क़ैद कर दिया जाए। रात दिन शाही सिपाही इस बात का ख़्याल रखें कि कोई नया चिड़ीमार सल्तनत की सरहदों में दाख़िल न होने पाए।

दरोग़ा : बेहतर है हुजूर।

इन्ना : पूरी सल्तनत के अवाम की ख़ुशहाली और बहबूदी मुकद्दम है। इसलिए आज मैं लगान माफ़ी का एलान करता हूं।

दरोग़ा : ये कैसे हो सकता है सरकार, अगर...

इन्ना : नामुमकिन को मुमकिन बनाना पड़ेगा।

दरोग़ा : बजा फ़रमाते हैं हुजूर।

इन्ना : कोई शख़्स चीथड़ों में न दिखाई दे।

दरोग़ा : किसमें सरकार?

इन्ना : चीथड़ों में... पूरी कोशिश की जाए कि अवाम गन्दी सड़ी हुई चीज़ों को न खाएं।

दरोग़ा : पूरी कोशिश की जाएगी हुजूर।

इन्ना : सल्तनत में हर उस शख़्स को जूते दिए जाएं जो नंगे पैर मेहनत-मज़दूरी करते हैं।

दरोग़ा : (हैरत से) जूते दिए जाएं?

इन्ना : हां जूते?

दरोग़ा : लकिन इतने जूते आएंगे कहां से हुजू़र?

इन्ना : (अपने जेते दिखा कर) जहां से ये जूते आए हैं।

दरोग़ा : बेहतर है सरकार।

इन्ना : जाइए, मेरे अहेकामात पर सख़्ती से अमल किया जाए। किसी क़िस्म की कोताही न हो।

(दरोग़ा चले जाते हैं। इन्ना अकेला रह जाता है)

इन्ना : (अपने आपसे) ये अल्लाह! तू रहीम और करीम है। मैं क़सम खाता हूं कि मेरी हर सांस हक़ और इंसाफ़ की पाबंद होगी। मेरा हम क़दम अवाम की ख़ुशहाली के लिए उठेगा और मैं ताज़िन्दगी अपने फर्ज़़ को पूरा करता रहूंगा।



दृश्य : नौ

(इन्ना अपने महल में)

इन्ना : (अपने आपसे) ऐसी मसर्रत का एहसास तो मुझे कभी नहीं हुआ खुशी के इस जज़्ब से तो मैं अब तक नावाक़िफ़ था। (गर्व से) दुनिया की किसी भी सल्तनत में क्या ऐसे अहेमामात कभी जारी किए गए हैं? क्या आज तक ऐसा हुआ है कि सल्तनत की तरफ़ से लोगों को जूते दिए गए हों? लगान माफ़ कर दिया गया हो। इंसानियत की ख़िदमत का ऐसा अहम क़दम कभी उठाया गया है। (ख़ुशी) ये सब मैंने किया है, मैंने। क्या इस काम को कभी भुलाया जा सकेगा?

(नर्तकी आती है)

(इन्ना नर्तकी से ख़ुश होकर)- आओ, मैं तुम्हारा इंतिज़ार कर रहा था। आज मेरा दिल मसर्रत से सरशार है। लगता है मैंने ज़िन्दगी के अहमतरीन फर्ज़ को अदा कर दिया है।

नर्तकी : हुजूर वज़ीरे आज़म की सलाहियतों से कौन है जो वाक़िफ़ नहीं। लेकिन सरकार, आज कोई ख़ास बात हुई क्या?

इन्ना : लफ़्ज़े ख़ास! उसके लिए बहुत छोटा लफ़्ज़ है रक्क़ासा। आज मैंने ऐसे अहेकामात दिए है जो अवाम की ज़़िंदगी को मेआर बुलन्द कर देंगे। आज उनकी हज़ारों साल की बदहाली का ख़ात्मा हो जाएगा।

नर्तकी : आपके हेकामात इस बात की दलील हैं कि आपके दिल में अवाज के लिए सिर्फ़ बेतहाशा हमदर्दी ही नहीं है बल्कि आप एक इन्तेहाई ज़ेहीन शख़्स भी हैं। लेकिन...

इन्ना : मैंने ऐसे अहेकामात दिए हैं जिनमें लेकिन और गरचे जैसे लफ़्ज़ों की गुंजाइश नहीं है।

नर्तक : सरकार, आपके अहेकामात को अमली जामा पहनाने वाले कौन हैं!

इन्ना : मैं जानता हूं तुम क्या कहना चाहती हो लेकिन अहेकामात अगर साफ़ हों तो मज़दूरन उन पर अमल किया जाएगा।

नर्तकी : हर लफ़्ज़ के कई मतलइ होते हैं हुजू़र। सल्तनत के दूरदराज़ में आपके अल्फ़ाज़ का क्या मतलइ निकाला जाएगा इसकी आप तसव्वर भी नहीं कर सकते।

इन्ना : तुम बहुत मासूम हो रक़्क़ासा। (ठहरकर) अच्छा तुम्हारे ख़्याल से लफ़्ज़े मुहब्बत का मतलब सल्तनत के दूर-दराज़ इलाक़े में कितना बदल सकता है।

निर्तकी : ये इस बात पर मुन्हसिर है हुजूर वज़ीरे आज़म कि लफ़्ज़ को कौन बोल रहा है। मुहब्बत पैसे से भी होती है सरकार। ताक़त और हुकूमत से भी।

(इन्ना कुछ गम्भीर होना शुरू होता है)

इन्ना : चलो मैंने माना। लेकिन मैंने जो अहेकामात दिए हैं वे एक लफ़्ज़ की तरह मुब्हत नहीं है। साफ़-साफ़ लफ़्ज़ों में मैंने साफ़-साफ़ अहेकामात दिए हैं। मैंने हुक्म दिया है कि पूरी सल्तनत में कोई शख़्स घोड़ों को कोड़ों से न मारे।

नर्तकी : नहीं, ये नामुमकिन है।

नर्तकी : अलोग घोड़ों को ताजयानों से पीटेंगे। उन्हें भुखा रखेंगे। उन्हें ऐसी तकलीफ़ें देंगे कि देखने वाले को मालूम ही न हो सके।

इन्ना : नहीं, ये नामुमकिन है।

नर्तकी : आप बजा फ़रमाते हैं सरकार।

इन्ना : ये हो कैसे हो सकता है। मेरे साफ़ अहेकामात हैं कि फ़टे-पुराने, मैले गन्दे कपड़ों में कोई शख्स न दिाखाई दे।

नर्तकी : तब लोग रंगे दिखाई देंगे।

इन्ना : (थोड़ा गुस्से में) मैं देखूंगा कि मेरे अहेकामात पर पूरी तरह अमल किया जाए और वही सब कुछ हो जो मैं चाहता हूं।

नर्तकी : गुस्ताख़ी माफ़ हो जनाब, किसी एक शख़्स के लिए ये कर पाना नामुमकिन है। पूरी सल्तनत के कारन्दिों की तादाद लाखों में है। उनमें से कितने नेक दिल हैं और कितने कमीने, ये खुदा ही बेहतर जानता है। आपके अहेकामात उनकी समझ में किस कदर आते हैं ये भी किसी को नहीं मालूम। और आप हर कारिन्दे के पीछे नहीं दौड़ सकते सरकार।

इन्ना : (गुस्से से) अगर मेरे अहेकामात पर अमल न किया तो मैं शाही कारिन्दों को सख़्त सज़ा दूंगा।

नर्तकी : फ़िर वही सज़ा और इनात का पुराना सिलसिला शुरू हो जाएगा।

इन्ना : मैं उन कारिन्दों को बरख़्वास्त कर दूंगा जो मेरे अहेकामात पर अमल न करेंगे।

नर्तकी : हुजूर, बड़ा पेचीदा मसला है। मैं तो ऐसे सवालों पर कभी ग़ौर ही नहीं करती। क्या हो सकता है हमारे सोचने से? क्या हज़ारों कारिन्दों को बरख़्वास्त किया जा सकता है? क्या ये मालूम करना आसान है कि उन्होंने कहां क्या किया है। क्या बसूख ये कहा जा सकता है कि कारिन्दों को आपके अहेकमात के बारे में ठीक-ठीक बताया गया था? अगर नहीं तो किसने ग़लत बताया था? क्यों बताया था?

इन्ना : (निराशा भरे सवर में) तुमने मुझे फिर उतना ही बेचैन कर दिया रक़्क़ासा, जितना मैं इन अहेकामात को देने से पहले था।

निर्तकी : मुझे सख़्त शर्मिन्दगी है हुजू़र। मेरा तो वजूद ही इसलिए है कि आप उससे तफ़रीह करें, दुनिया की तल्ख़ियों को भूल जायें। लेकिन सरकार मैं शाही रक़्क़ासा होने से पहले इन सब सवालात पर सोचा करती थी। बहुत दिनों तक सोचती रही लेकिन नतीजा कोई नहीं निकला। वज़ीरे आज़म, गुस्ताख़ी माफ़ हो, मुझे एक छोटा-सा क़िस्सा याद आता है। एक प्यारी मासूम-सी चिड़िया थी उसने सोचा वह अपनी मीठी आवाज़ से सारे जंगल को एक नयी ज़िन्दगी दे देगी। बरसों तक चिड़िया पूरे जंगल पर उड़-उड़ कर अपना तराना गाती रही। एक दिन शेर दहाड़ दिया। सारे जंगल में मौत का सन्नाटा छा गया। चिड़िया उड़ते-उड़ते ज़मीन पर गिरी और मर गई।

इन्ना : ये तुम कय कह रही हो रक़्क़ासा?

नर्तकी : (शराब का गिलास इन्ना को देते हुए) इन सब बातों को भूल जाइए सरकार।

इन्ना : (शराब एक सांस में पीकर गिलास नर्तकी को देता हुआ) लेकिन मैं कुछ करूंगा?

नर्तकी : ज़रूर करेंगे सरकार! (गिलास भरकर फिर देती है) सरकार, हर आदमी के कुछ करने की हद है। अगर ऐसा न होता तो एक ही इंसान दुनिया के तमाम काम कर डालता। लेकिन ये हो नहीं सकता। ये मुमकिन है कि इंसान उन कामों को करने की कोशिश करे जिन्हें वह बेहतर समझता है लेकिन ये उम्मीद बिल्कुल न कीजिए कि काम हमेशा सौ-फ़ीसदी आपकी मर्ज़ी के मुताबिक़ हो जायेेंगे। (गिलास देती हुई) लीजिए सरकार।

इन्ना : (शराब पीता हुआ) तुम ठीक कहती हो रक़्क़ासा। (उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाता हुआ) आओ, जरा मेरे क़रीब आओ। आज तुमने (उसे गले लगाता हुआ) एक तरह की बे के मुत्तारिफ़ कराया है। (अचानक इन्ना नर्तकी को छोड़ कर उठ खड़ा होता है, शराब का नशा उस पर बहुत चढ़ चुका है वह चिल्लाहा है) मेरी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ मेरे अहेकामात पर अमल नहीं हो सकता... मेरी मर्ज़ी- मेरी मर्ज़ी... (वह बेहोश होने वाला होता है। डगमगाता ह। नर्तकी उसे संभाल कर लिटा देती है और उसके गले में बांहे डाल देती है।)



दृश्य : दस

(मंच पर दो सिपाही बैठे हैं। सड़क का दृश्य है। सामने से लोग गुज़र रहे हैं।)

सिपाही-1: बड़ा सख़्त हुक्म है। चिड़ीमार को सूरत से पहचानना तो नामुमकिन है।

सिपाही-2: (मज़ाक़ में) सबसे बड़े चिड़ीमार तो तुम्हीं हो।

सिपाही-1: दिल्ल्गी न करो। कहीं वज़ीरे आज़म इन्ना ने सुन लिया तो क़यामत हो जायेगी।

सिपाही-2: देखो सामने से कोई आ रहा है।

(आने वाला नज़दीक आता है।)

सिपाही-2: (आने वाले आदमी को रोककर) तुम चिड़ीमार हो। तुम्हें शहर के अन्दर नहीं दाख़िल होने दिया जायेगा।

आदमी : मैं तो बढ़ई हूं भाई। दूसरे शहर दरवाज़े बनाने गया था।

सिपाही-1: (बढ़ई के पास आकर उसका मोआइना करता हुआ) तुम ‘मुजरिम' हो।

बढ़ई : (घबराकर) मुजरिम? क्यों कैसे? मैंने क्या जुर्म किया है?

सिपाही-1: वज़ीरे आज़म का हुक्म है कि कोई शख़्स फटे-पुराने कपड़े पहने न दिखाई दे। अपने कपड़े उतारो सब तुम्हें शहर में दाख़िल होने दिया जायेगा।

बढ़ई : कपड़े उतार दूं? अरे, मैं रंगा हो जाऊंगा।

सिपाही-1: तभी शहर में दाख़िल हो सकोगे।

बढ़ई : ऐसा न करो। शहर में मेरा घर है। बीवी-बच्चे हैं, काम-धंधा है। अगर मैं शहर में नंगा घुसा तो लोग क्या कहेंगे। मुझे माफ़ करो भाई।

सिपाही-2: (उसे ध्यान से देखता हुआ) अच्छा तो... अपनी पगड़ी उतार दो। ये बहुत मैली-कुचैली है।

बढ़ई : (घबराकर) यही तो एक नया-सा कपड़ा है मेरे पास...

सिपाही-1: हुक्म हुक्म है (बढ़कर पगड़ी उतार लेता है। बढ़ई को शहर के अन्दर जाने के लिए धक्का दे देता है।)

सिपाही-2: ये भी चिड़ीमार नहीं निकला।

सिपाही-1: तुम फ़िक्र न करो। मैं आज ही कम-से-कम दस चिड़ीमारो को गिरफ़्तार करूंगा।

सिपाही-2: फिर कोई इधर आ रहा है।

(एक बुढ़िया आती है)

सिपाही-1: ऐ बुढ़िया ठहर।

(बुढ़िया रुक जाती है।)

सिपाही-2: ये तेरी पोटली में क्या है। जाल है क्या है?

बुढ़िया : नान है कल पकाया था।

सिपाही-1: (हैरत से) कल पकाया था और आज खायेगी?

बुढ़िया : हां, क्यों?... रोज़-रोज़ मुझे आटा ही कम मिलता है।

सिपाही-2: वज़ीरे आज़म का हुक्म है कि कोई शख़्स सड़ा-बुसा खाना न खाये। ला मुझे दे दे नान।

(सिपाही-1 बुढ़िया से नान छीनकर उसे शहर के अन्दर धक्का दे देता है।)

सिपाही-1: (नान खाता हुआ)ऐसी चीज़ें अगर अवाज खायेंगे तो वाक़ई मर जायेंगे।

सिपाही-2: (नान खाता हुआ) हां बेशक। तुम ठीक कहते हो।

(एक परिवार आता, दिखाई पड़ता है।)

सिपाही-1: (नान जेब में रखकर, परिवार के साथ बूढ़े आदमी से) ऐ सुनो, वज़ीरे आज़म इन्ना के हुक्म के बमूजिब तुम्हारा लगान काफ़ कर दिया गया।

बूढ़ा : लेकिन मेरे पास तो ज़मीन ही नहीं है।

सिपाही-1: तो तुम्हें ज़मीन ख़रीदनी पड़ेगी।

बूढ़ा : लेकिन मेरे पास ज़मीन ख़रीनदे के पैसे नहीं हैं।

सिपाही-1: अगर तुमने ज़मीन न ख़रीदी तो लगान माफ़ न हो पायेगा और तुम मुजरिम क़रार दिये जाओगे। तुमको गिरफ़्तार कर लिया जायेगा।

बू़ढ़ा : ये तो बड़ा अंधेर है।

सिपाही-2: बकवास मत करो। जल्दी फ़ैसला करो। तुम ज़मीन ख़रीदना चाहते हो या नहीं?

(सिपाही-1 बूढ़े के साथ खड़ी औरत के पास आता है जो अपनी बांहों में बच्चा लिए है। सिपाही बच्चे को देखता है।)

सिपाही-1: (औरत से) ये तुम्हारा बच्चा है?

औरत : लड़की है।

सिपाही-1: तुमने इसे जूते क्यों नहीं पहनाये?

औरत : जूते, लेकिन इसने तो अभी चलना ही नहीं सीखाा।

सिपाही-1: अपनी लड़की को यहां छोड़ जाओ। इसके नाप के जूते तैयार होंगे और जब यह जूते पहन लेगी तभी शहर में दाख़िल हो सकेगी।

बूढ़ा : ये तुम क्या उल्टी-सीधी बातें कर रहे हो?

सिपाही : 1: अच्छा, हम उल्टी-सीधी बातें कर रहे हैं। बाग़ी मालूम होते हैं। इनको गिरफ़्तार कर लो।

(बूढ़ा और औरत भागते हैं सिपाही हंसते हैं।)

सिपाही-2: बड़ा चालाक बूढ़ा था कम्बख़्त।

सिपाही-1: वह देखो चिड़ीमार आ रहा है।

(फसी आता है।)

सिपाही-2: (फसी से) तुम चिड़ीमार हो?

सिपाही-1: (फसी से) तुमकभी घोड़े पर बैठे हो?

सिपाही-2: तुम्हारे पास ज़मीन है?

सिपाही-1: तुम क्या खाते हो?

सिपाही-2: तुम्हारे कपड़े गंदेहैं।

फ़सी : मेरी समझ में नहीं आता कि इन सवालात की क्या ज़रूरत है?

सिपाही-1: वज़ीरे आज़म का हुक्म सल्तनत में...

फ़सी : (व्यंग करते हुए) वज़ीरे आज़म के अहेकामात पर शहर-बाहर अमल किया जा रहा है।

सिपाही-1: सवालात का सही-सही जवाब दो।

फसी : वज़ीरे आज़म के अहेकामात पर अमल जिस तरह हो रहा है उसके बारे में शायद वज़ीरे आज़म भी न जानते होंगे। उसका अगर ये हुक्म होता कि कोई शख़्स भूख से न मरने पाये तो शायद तुम लोग भूखे आदमी को तलवार से क़ल्त कर देते।

सिपाही-2: इसे गिरफ़्तार कर लो। वज़ीरे आजम के अहेकामात पर..

फसी : हां मुझे गिरफ़्तार कर लो और वज़ीरे आज़म के सामने ले चलो जिनके साथ मैं बीस साल तक एक झोपड़े में रहा हूं।

सिपाही-1: क्या बकते हो? वज़ीरे आज़म झोपड़े में बीतस साल... पागल हो गये हो क्या?

फसी : वज़ीरे आज़म मेरे अज़ीज़ दोस्त हैं।

सिपाही-1: (ठहाका लगाकर) आजकल सब यही कहते हैं (सिपाही-2 से) गिरफ़्तार कर लो इसे।

फसी : गिरफ़्तार नहीं, तुम लोग क्या चाहते हो ये मुझे मालूम है लो इसे संभालो (एक थैली देता है) और मुझे शहर के अन्दर जाने दो। (दोनों सिपाही थैली पर टूट पड़ते हैं और फसी अन्दर चला जाता है।)



दृश्य : ग्यारह

(इन्ना आराम से बैठा है। उसके सामने नर्तकी लेटी है। इन्ना दरोग़ा की बात सुनने के दौरान नर्तकी की तरफ़ देखता जाता है। दरोग़ा और कुछ अन्य लोग नीचे बैठे या खड़े इन्ना को सल्तनत के संबंध में सूचनाएं दे रहे हैं।)

दरोग़ा : सल्तनत में बदअमनी फैली हुई है सरकार...

इन्ना : (गुलाब के फूल से नर्तकी के चेहरे को छूते हुए) सल्तनत में अमन फैला दिया जाये।

दरोग़ा : (तंग आये अंदाज़ में) सरकार, कई सूबों से लगान का पैसा अभी तक नहीं आया है। सरकारी नौकरों को तनख़्वाहें नहीं बांटी जा सकी हैं।

इन्ना : सूबों से फ़ौरन लगान वसूल किया जाये और तनख़्वाहें बांटी दी जायें।

दरोग़ा : कुछ सूबों के सरदारों ने अपने सिर उठा लिए हैं...

इन्ना : उनके सिर कुचल दिये जायें।

दरोग़ा : चन्द सरकारी अफ़सर अपना फ़र्ज़ पूरा नहीं कर रहे हैं...

इन्ना : उनको हुक्म दिया जाये कि वे अपने फ़र्ज़ पूरे करें!

दरोग़ा : हुजूर, शहरों में लूटमार की वारदातें बढ़ गई हैं...

इन्ना : लूटमान की वारदातों को रोेक दिया जाये।

दरोग़ा : हुजूर, लोग इंसाफ़ की भीख मांग रहे हैं।

इन्ना : उनको इंसाफ़ की भीख दी जाये।

दरोग़ा : (दबे लहजे में) सल्तनत तबाह हो जायेगी।

(इन्ना गुलाब का फूल फेंककर खड़ा हो जाता है और गुस्से में)

इन्ना : ये तुम क्या बक रहे हो। सल्तनत कैसे तबाह हो सकती है। तुम्हें क्या हमारी ताक़त का अंदाज़ा नहीं है। तुम्हें क्या नहीं मालूम कि असमान को छूने वाले ऊंचे पहाड़ों से लेकर समन्दर तक हमारा हुक्म चलता है।

दरोग़ा : लेकिन ख़ुद-ब-ख़ुद नहीं चलता हुजूर।

इन्ना : क्या मतलब है तुम्हारा?

दरोग़ा : हुजूर सल्तनत के काम को चलाने के लिए बड़ी होशमंदी की ज़रूरत होती हैै।

इन्ना : (शराब में डूबा आवाज़ में) तो हम हैं होश में।

दरोग़ा : जी हां, आप होश में हैं। मेरा मतलब इसी होशमंदी से था।

इन्न : तुम हमारे सामने मसले रखो। हम तुम्हें बताएंगे कि सल्तनत कसे चलाओ।

दरोग़ा : आप बहुत रहमदिल हैं हुजूर।

इन्ना : हां, हम बहुत रहमदिल हैंं। हमें बहुत तकलीफ़ होती है दूसरों को तक्लीफ़ में देखकर।

दरोग़ा : तकलीफ़ दूर करने के लिए ही सल्तनत है, सरकार है।

इन्ना : हम जानते हैं।

दरोग़ा : लकिन तकलीफ़ दूर करने में भी तकलीफ़ होती है सरकार।

इन्ना : हम उस तकलीफ़ को उठाने के लिए तैयार हैं सरकार, लेकिन अवाम तैयार नहीं है।

इन्ना : (चीख़कर) उनको होना पड़ेगा। इसमें उन्हीं का फ़ायदा है। हमारा क्या है, हम तो वज़ीर हैं वज़ीर।

दरोग़ा : पिछले कुछ सालों से कई सूबों में बग़ावत फैल गई है। बाग़ी बहुत ताक़तवर हो गये हैं।

इन्ना : बाग़ी? कैसे ताक़तवर हो गये हैं?

दरोग़ा : वो हमारे ख़ज़ाने में पैसा नहीं देते सरकार। और उसी पैसे से हथियार ख़रीदते हैं और हमले करते हैं हुजू़र, इस वक़्त वो इस शहर पर भी हमला कर सकने की ताक़त रखते हैं।

इन्ना : इस शहर पर? इस महल पर? यानी मुझ पर? (चीख़कर) इतने सालों से मुझ पर हमला होने की तैयारी हो रही थी और तुम खद्यामोश बैठे थे।

दरोग़ा : इसलिए कि आप रहमदिल हैं सरकार। आप...

इन्ना : हम रहमदिल हैं रहमदिलों के लिए, बाग़ियों के लिए नहीं। हमारा हुक्म है कि बाग़ियों को दबाने के लिए फ़ौज भेज दी जाये। चाहे ख़ून की नदियां बह जायें लेकिन बाग़ियों को कुचल दिया जाये।

दरोग़ा : फ़ौज के अफ़सर आगे बढ़ने से इन्कार करते हैं सरकार।

इन्ना : क्यों?

इरोग़ा : फ़ौज से अफ़सर घोड़ों की सवारी करते हैं घोड़ों को जब तक पीटा न जाये वो नहीं बढ़ते।

इन्ना : (बिगड़ कर) तो वह घोड़ों को कोड़ों से क्यों नहीं पीटते?

दरोग़ा : सरकार, आपका हुक्म है कि घोड़ों को पीटना जुर्म है।

इन्ना : (हैरत से) मेरा हुक्म है? हमने ऐसा फिजूल हुक्म नहीं दिया होगा।

दरोग़ा : (ख़ुशामदी अंदाज़ में) हुजू़र, घोड़ों को पीटे बग़ैर कोई काम नहीं हो सकता। खेत में हल घोड़े ही चलाते हैं, सामान लाने-ले जाने के लिए घोड़े हैं, सवारी के लिए घोड़े हैं, डाक पहुंचाना घोड़ों का काम है, वे सौ तरह के बेबार करते हैं हुजूर। घोड़े नहीं चलेंगे तो अफ़सर कैसे चलेंगे और घोड़ों को चलाने के लिए उनको पीटना तो पड़ता ही है। सरकार।... लेकिन सरकार, बाग़ियों को दबाने के लिए फ़ौज भेजी गई है।

इन्ना : कैसे? ये तुम कैसी उल्टी-सीधी बातें कर रहे हो।

दरोग़ा : गुस्ताख़ी माफ़ हो सरकार, आपने घोड़ों को कोड़ों से मारने पर पाबंदी लगाई थी। इसलिए घोड़ों को मारने के नये तरीक़े ईजाद कर लिए गए।

इन्ना : तुम होशमंद आदमी हो।

दरोग़ा : इसलिए फ़ौजें आगे बढ़ पाईं सरकार। उन्होंने हर उस आदमी को क़त्ल कर दिया है जिसपर बाग़ी होने का शक था। उन्होंने पूरे-पूरे शहरों पर क़ब्ज़ा कर लिया है। लाखों की तादाद में गुलाम हासिल कर लिए हैं और ढेरों सोना-चांदी इकट्ठा हो गया है जो सरकारी ख़ज़ाने में जमा हो जायेगा।... सरका, गुस्ताख़ी माफ़ हो। हम जानते थे कि लोगों को जूते दे दिये जाने का मतलब यह था कि हर मौक़े पर जूते चलते... और इससे रिआया का इख़लाक गिर जाता... और उन सब किसानों का लगान भी माफ़कर दिया गया था जिनके पास ज़मीन नहीं थी। अवाम की सेहत का ख़्याल रखने की ग़रज़ से जो महकमा बनाया गया है उसने ऐसे लाखों लोगों पर जुर्माने किए जो सड़ी- बुसी चीज़ें खाते थे।... आप रहमदिल हैं सरकार, आपने चिड़ियाख़ाने के दरवाज़े खोल देने का हुक्म दिया था पर अगर अमल किया गया होता तो उसका अंजाम यही होता कि हूजूर की नींद हराम हो गई होती। चिड़िया महल की दीवारों पर इस क़दर चहचहातीं कि आप सुबह आराम न फ़रमा सकते थे। रात देर तक सल्तनत का कामकरने केबाद अगर... जी हां, सुबह देर तक न सोया जाये तो नींद पूरी ही नहीं होती।

(इन्ना के ख़र्राटे सुनाई देने लगते हैं।)



दृश्य : बारह

(इन्ना नर्तकी के साथ बैठा है। एक ग़ुलाम आकर फ़सी के आने की सूचना देता है।)

ग़ुलाम : सरकार के हुजू़र में फसी हाज़िर होना चाहता है।

गु़लाम : (शबराब में डूबी आवाज़ में) कौन?

गुलाम : सरकार के हुजूर में फसी हाज़िर होना चाहता है।

इन्ना : कौन हाज़िर होना चाहता है?

गुलाम : सरकार, फसी।

इन्ना : जो भी हो, उसे भेजो।

(ग़ुलाम जाता है और फसी आता है।)

फसी : इन्ना...

नर्तकी : (फसी की बात काटकर) वज़ीरे आज़म।

फसी : (कड़वे स्वर में) वज़ीरे आज़म, मैं आपके पास फ़रियाद लेकर हाज़िर हुआ हूं।

इन्ना : फ़रियाद लाने के लिए तुमने अच्छे वक़्त का इन्तिख़ाब किया है फ़सी। तुम जानते हो...

फसी : मैं जानता हूं सरकार, ये आपके आरमा का वक़्त...

इन्ना : आराम भी एक काम है फसी और उसकी अहमियत इतनी कम नहीं है कि उसे इन्कार किया जा सके।

फसी : क्या तुम्हारे कपड़ों के साथ तुम्हारा दिल और दिमाग़ भी बदल गया है इन्ना? ज़रा ख़्याल करो तुम बीस साल तक मेरे साथ एक झोपड़े रहे हो और हमने कितनी मुसीबतों में एक-दूसरे का साथ दिया है। और आज तुम्हारे वज़ीर बन जाने के बाद मैं ये नहीं गवारा कर सकता कि तुम्हारे नाम पर वह सब कुछ होता रहे जो हो रहा है।

इन्ना : मेरे नाम पर सल्तनत का काम चल रहा है फसी। क्या तुम चाहते हो वह न हो?

फसी : इन्ना, तुम अगर हुक्म देते हो कि प्यासे आदमी को पानी पिलाया जाये तो तुम्हारे सिपाही उसे नदी में ग़र्क कर देते हैं। तुम्हारे इस हुक्म पर कि अवाम सेहतमंद नज़र आये, तुम्हारे सिपाहियों ने पीट-पीट कर उसके जिस्म इतने सुजा दिये कि वो सेहतमंद नज़र आने लगे। उन्होंने लोगों को लाहे का जूते पहना दिये कि वो चल-फिर ही न सकें। इन्ना..

नर्तकी : (फसी की बात काटकर) वज़ीरे आज़म।

फसी : (कड़वे स्वर में) वज़ीरे आलम, आपने कहा था कि सल्तनत में घोड़ों...

इन्ना : हम जानते हैं हमारा क्या काम है। और हम ये भी जानते हैं कि हम किसी के कहने से अपने काम करने के तरीक़े में कोई तब्दीली नहीं ला सकते।

फसी : (हमदर्दी से) इन्ना, मैं तुम्हें आख़िरी बार समझाने आया हूं। तुम्हारे जलाये हुए चिराग़ से मुल्क में आग लग गई है।

इन्ना : जो कुछ हो रहा है वे सल्तनत को क़ायम रखने के लिए किया जा रहा है। सल्तनत से ग़द्दारी करने की सज़ा मौत है।

फसी : लेकिन इन्ना मासूम, बूढ़े, औरतें और बच्चे क्योंकर सल्तनत से ग़द्दारी कर सकते हैं। उनपर इतना जुम्ल क्यों किया जा रहा है?

इन्ना : फसी, तुम मेरे आराम में ा़लल डाल रहे हो। इन सवालों पर कभी इत्मीनान से..

फसी : तब हज़ारों लोग उजड़ चुके होंगे...

इन्ना : तामौर भी कुर्बानी चाहती है फसी।

फसी : तुम समझते क्यों नहीं इन्ना, मुझे हैरत होती है तुम्हारी अक़्ल कहां चली गई है। ज़रा सोचो इन्नाा, जुल्म जुल्म है चाहे वह जिस नाम पर किया जाये। ख़्याल करो इन्ना, अवाम को कुछ देने की बात तो दूर रही, तुम्हारी फौजें उनके गांव के गांव तबाह करती हुई गुजर जाती हैं ओर उनकी फ़रयाद पर कोई कान नहीं धरता। मैं इनल वक़्त, तुम्हारे आराम के वक़्त, इसलिए आया हूं, तुम्हें तक़लीफ़ दी है कि मैं अपनी आंखों से वही सब कुछ देखकर आ रहा हूं जिसके बारे में अब तक सुना करता था।

इन्ना : फसी, इन्हीं ख़्यालात से बग़ावत पनपती है। मैं हर उस शख़्स को कड़ी से कड़ी सज़ा दूंगा जो बग़ावत पर आमादा हो।

फसी : इन्ना, मैं ये उम्मीद लेकर आया था कि तुम कम से कम मेरी बात पर तो संजीदगी से ग़ौर करोगे। मैंने तुम्हारे साथ तवील वक़्त गुज़ारा है। हम एक साथ मुश्किलात में फंसे हैं और हमने एक खुशियां मनाई हैं। मुझे ये ख़्याल था इन्ना कि मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूं। लेकिन मुझे मालूम पड़ता है, मैं ग़लत जगह आ गया। इन्नाा...

नर्तकी : वज़ीरे आज़म...

फ़सी : (काफ़ी कड़वे लहजे में) वज़ीरे आज़म, मैं बाग़ी नहीं हूं। लेकिन मैं हर उस बात को कहने के लिए तैयार हूं जो मुझे बेजा लगती है। मैं...

इन्ना : गु़लाम फसी, तुम अपनी हदों से आगे बढ़ रहे हो।

फसी : नहीं, मैं अपनी हदों में जा रहा हूं वज़ीरे आज़म।

(फसी तेज़ी से बाहर निकल जाता है।)



दृश्य : तेरह

(बादशा और इन महल के सामने खड़े हैं।)

सुल्तान : इन्ना, तुम कुछ साल पहले ग़ुलाम थे।

इना : था सरकार, लेकिन अब मैं उन दिनों को भूल गया हूं।

सुल्तान : ठीक है इन्ना। गुलामी की ज़िन्दगी तो मौत से बदतर है। (ठहर कर) लेकिन इन्ना, तुम हीरा थे, पत्थरों के बीच पड़ा हीरा। हमने तुम्हें अपना वज़ीर अनाया और तुम चमक गये। हमें यह कहते हुए खुशी हो रही है कि तुमने सल्तनत की काम जिस खूबी से चलाया है वैसा कभी नहीं चला। आज शाही ख़ज़ाने में जितनी दौलत है उतनी तो हम सैकड़ों लड़ाइयां लड़ने के बाद भी न हासिल कर सके थे। बाग़ियों को तुमने नामोनिशान मिटा दिया है। चारों तरफ़ अमन क़ायम है।

इन्ना : ये मेरा फ़र्ज़ था सरकार।

सुल्तान : नहीं इन्ना, तुमने उससे ज़्यादा किया है। हमने अपनी पूरी ज़िन्दगी में जितने लोगों को सज़ा दी है, उतने लोगों को तो तुमने दो साल में मौत के घाट उतार दिया है।

इन्ना : सल्तनत के नाम को चलाने के लिए ये ज़रूरी था आलीजाह।

सुल्तान : बेशक, सल्तनत के काम को चलाने के लिए। फै़सले हमेशा सही हुए हैं इन्ना और तुम्हारी होशमंदी क़ाबिले तारीफ़ है।

इन्ना : ये तो आपकी ज़र्रानवाज़ी है सरकार।

सुल्तान : तुमने ऐसे क़ायदे क़ानून बनाये, जिनसे सल्तनत को बेतहाशा फ़ायदा हुआ।

इन्ना : शुक्रिया हुजूर।

सुल्तान : हम हीरे की क़द्र करना जानते हैं। तुमने हमारी जो ख़िदमत की है उसका पूरा-पूरा मुआवज़ा तुम्हें मिलना ही चाहिए।

इन्ना : आपने ऐसा ही किया है खुदाबान।

सुल्तान : आज इस सल्तनत में हमारे बाद सबसे मालदार आदमी तुम्हीं हो। तुम्हारे हरम में औरतों की तादाद हमारे हरम की औरतें से कुछ कम होगी। हमारे बाद सल्तनत की सबसब क़ीमती शराब तुम्हारे लिए तैयार की जाती है और हमारे कपड़ों के बाद तुम्हारे कपड़े सल्तनत में बेहतरीन माने जाते हैं। हमारे बाद तुम्हारा ही हुक्म इस सल्तनत में क़ानून समझा जाता है। तुम दुनिया की उस फ़ौज को कमान करते हो जो बड़ी से बड़ी सल्तनत को हरा सकती है।

इन्ना : बजा फ़रमाते हैं हुजूर।

सुल्तान : हमने अपनी हर ख़्वाहिश को पूरा किया है। ये अजीब बात है कि ख़्वाहिशें एक तरीक़े से पूरी नहीं होतीं। तरह-तरह की ख़्वाहिशों को पूरा करने के अलग-अलग तरीक़े हैं। कभी कभी कुछ लोगों को अगर क़त्ल कर दिया जाये तो वे हमेशा ज़िन्दा रहते हैं। लेकिन अगर उन्हें लम्बी जिन्दगी गुज़रने का मौक़ा दे दिया जाये तो अपने आप मर जाते हैं।

इन्ना : मैं नहीं समझा सरकार! आप...

सुल्तान : ये समझ लो कि ज़मीन पर रेंगने वाले बहुत छोटे कीड़े पर अगर एक बड़ी फ़ौज हमला कर दे तो उसे नहीं मार सकती। लेकिन अगर उस कीड़े को ज़मीन की सतह से बहुत ऊपर उठा दिया जाये तो वह अपने आप मर जायेगा। (ठहरकर) हमने बीस साल महल के बन जाने का इंतज़ार किया। और जब महल बनकर तैयार हुआ तब...

इन्ना : उसमें मेरी कोई ख़ता नहीं थी सरकार।

सुल्तान : अगर तुम्हारी ख़ता होती तो तुम्हारा नाम खुद-ब-खुद न लिख जाता।

इन्ना : म..... मैं (परेशान होकर) मैं अगर खुद भी चाहूं तो मेरा नाम महल के ऊपर से नहीं मिट सकता है।

सुल्तान : और अगर हम चाहें...

इन्ना : शायद तब भी नहीं।

सुल्तान : हम तुम्हें बता चुके हैं कि हम अपनी हर ख्वाहिश को पूरा करने के आदी हैं। तरीक़ा चाहे जो हो। हमारी एक ख़्वाहिश यह भी थी कि तुम्हारा नाम महल के दरवाज़े से मिट जाये और अपनी इस ख़्वाहिश को पूरा करने के लिए हमने क्या नहीं किया।

इन्ना : मैंं नहीं समझा हुजूर।

सुल्तान : इन्ना, हम अपने साथ अपनी खुशक़िस्मती और बदक़िस्मती लेकर पैदा हुए थे। हम बादशाह बने और हुकूमत को चलाते रहे। अब तुम अच्छी तरह जानते हो कि हुकूमत कैसे चलती है। तुम्हारे साथ भी तुम्हारी बदक़िस्मती थी, तुम गुलाम थे और यही तुम्हारी ख़ुशक़िस्मती थी। हमने इन दोनों चीज़ों को तुमसे छीन लिया था।

इन्ना : मैं नहीं जानता आप पुरानी बातों को क्यों...

सुल्तान : अगर तुम सब समझ जाते तो अपने इरादों में काबयाब कैसे होते? हम ये जानते हैं कि अगर हम हजुकूमत न कर सके तो हुकूमत नहीं ख़त्म होगी, आग्र कोई करेगा। और वह भी वही करेगा जो हम करते। क्योंकि हुकूमत चलाने का एक ही रास्ता है, हुक्म। और हर तरीक़ से उसपर अमल।... फिर हम ही हुकूमत क्यों न करें? हम ही वह सब कुछ अपने नाम पर क्यों न होने दें जिसे कुछ कमज़ोर लोग... पता नहीं क्या क्या कहते हैं।

इन्ना : लेकिन मैंने आपकी सल्तनत के लिए वही सब कुछ किया है जो ज़रूरी था।

सुल्तान : हम यही चाहते थे। यह नहीं चाहते थे कि तुम घोड़े के मारने पर पाबंदी लगाओ और चिड़ियाघर के जानवरों को आज़ाद कर दो, जिनको हमने बड़ी-बड़ी लड़ाइयां लड़कर अपने काबू में किया है। हम बहुत खुश हैं इन्ना कि तुमने ऐसा नहीं किया और तुम एक अच्छे वज़ीर साबित हुए। और यही हमारी जीत है। जहां तुम्हारा नाम अपने आप लिख जाया करता था। (इन्ना और बादशाह दरवाज़े की तरफ़ देखते हैं) अब तुम्हारा नाम वहां नहीं है।

इन्ना : मुझे इसकी परवाह नहीं है आलीजाह। मैं आपका वज़ीर और...

सुल्तान : तुम्हारा काम पूरा हो चुका है।

इन्ना : मैं समझा नहीं खुदाबद।

सुल्तान : हां, तुम्हारा काम यही था कि इस दरवाज़े से अपना नाम मिटा दो। तुमने ऐसा कर दिया है। हमारे पास ऐसे लोगों की कमी कभी नहीं रही तो वज़ीर बन सकते हों।

इन्ना : लेकिन सरकार...

सुल्तान : हम फ़तेह के नशे में चूर हैं इन्ना।

इन्ना : मुझे आपका हर फैसला मंजूर है खुदाबन्द।

सुल्तान : हमारा फैसला यही है कि तुम वहीं वापस भेज दिये जाओ, जहां से लाये गये थे।

इन्ना : (सुल्तान के सामने घुटने टेककर) नहीं, नहीं, ऐसा न कीजिये बन्दापरवर।

सुल्तान : तुम्हें हमारा हुम मानना पड़ेगा। क्योंकि तुम अपने से ऊपर वाले का हुक्म मानने और नीचे वाले को हुक्म देने के आदी हो चुके हो।

इन्ना : लेकिन अब मैं वहां क्या करूंगा सरकार?

सुल्तान : हम जानते हैं कि तुम वहां कुछ न कर कसोगे (कहकहा लगाकर) और यहां हम तुम्हें कुछ करने न देंगे।

इन्ना : (गिड़गिड़ाकर) मुझे किस जुर्म की सजा दी जा रही है हुजूर?

सुल्तान : इस जुर्म की सज़ा कितुम इन्ना थे।

इन्ना : लेकिन अब तो मैं इन्ना नहीं हूं सुल्ताने आलम।

सुल्तान : अब तुम न इन्ना हो और न हमारे वज़ीरे आज़म। (कहकहा लगाकर) तुम कुछ भी नहीं हो इन्ना। (ठहरकर ऊंची आवाज़ में) अब तुम गा भी नहीं सकते, चरवाहों का वह नग़्मा जिसे सुनकर लोग तुम्हारे दीवाने हो जाया करते थे (ठहरकर) गाओ... आगर देखो। (इन्ना गीत गाने की कोशिश करता है लेकिन उसकी आवाज़ फट जाती है।)

(ज़ोर का कहकहा लगाकर) गाओ... कोशिश करो (इन्ना फिर गाने की कोशिश करता है। उसकी आवाज़ फिर फट जाती है।)

सुल्तान : अब तुम सिर्फ़ हुक्म दे सकते हो इन्ना... गा नहीं सकते। अब तुम्हारा हुक्म मानने वाला यहां कोई नहीं है... हां, गाना सुनने वाले ज़रूर हैं... गाओ... गा कर देखो...

(इन्ना बेसुरी आवाज़ में गाने की कोशिश करता है। आवाज़ फट जाती है। सुल्तान कहकहा लगाता है। ऐसा कई बार होता है।)

--

(समाप्त)

COMMENTS

BLOGGER: 1
  1. सत्ता पाए किसे घमंड नहीं हो जाता-तुलसी बाबा पहले ही कह चुके हैं. एक अच्छा नाटक. धन्यवाद.

    जवाब देंहटाएं
रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4288,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3239,कहानी,2360,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,1,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: असग़र वजाहत का नाटक - इन्ना की आवाज़
असग़र वजाहत का नाटक - इन्ना की आवाज़
http://lh6.ggpht.com/-l2SjfwT1hrQ/T12n79M9VLI/AAAAAAAALUk/ZO7kvZXxfBM/image%25255B2%25255D.png?imgmax=800
http://lh6.ggpht.com/-l2SjfwT1hrQ/T12n79M9VLI/AAAAAAAALUk/ZO7kvZXxfBM/s72-c/image%25255B2%25255D.png?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2012/03/blog-post_7385.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2012/03/blog-post_7385.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content