सोमवार, 5 मार्च 2012

देवेन्द्र कुमार पाठक "महरूम" के फागुनी दोहे

टूट गए एकबारगी, संयम के तटबंध ;

जोड़ रहीँ मनलहरियाँ, मनमाने संबंध.

 

बौराईँ अमराइयाँ उन्मत हुआ पवन

मन-अनंग रंग-रागमय, हुलसित तन-मधुवन.

 

मन वृन्दावन हो रहा, तन जनु गोकुल धाम ;

श्यामा-श्याम विचर रहे, तन-मन आठोँ याम.

 

खिले कमल-मुख मुदित मधु अधर पाखुरी-हास ;

बेँदी मध्य ललाट ज्योँ रवि सोहे आकाश.

 

रँगे अबीर-गुलाल से, युवा,वृद्ध,आबाल ;

सुख-सुमनोँ से लद रहीँ, मन-छेवलोँ की डाल.

 

नयनोँ की पिचकारियाँ, मारेँ भर-भर रंग ;

मन-गलियोँ मेँ फिर रहा, है मनचला अनंग.

 

मस्ती- मेल, हँसी-खुशी, छेड़छाड़-उत्पात ;

प्रेम-राग-रंग दे मिटा, हद-क़द,पद-औकात.

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1 blogger-facebook:

  1. बहुत सुंदर दोहे आध्यात्मिकता का रंग लिए हुए........
    मोहसिन खान

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