गुरुवार, 8 मार्च 2012

रामवृक्ष सिंह का व्यंग्य लेख - बापू लोगों की बपौती

व्यंग्य-लेख

बापू लोगों की बपौती

डॉ. रामवृक्ष सिंह

बापूजी के आश्रम में बैठे हुए मैं बड़ी तल्लीनता से उनके प्रवचन सुन रहा था। उनकी ज्ञानप्रद बातें सीधे मेरे दिल में उतर रही थीं। आँखें टकटकी लगाए उन्हीं को निहार रही थीं। बापू जमीन से लगभग छह-सात फीट की ऊँचाई पर बने शीशे के घर में बैठे थे। उनके सामने ज़मीन पर एक तरह का नो-मैन्स ज़ोन था। उस नो-मैन्स जोन में दो-तीन वीडियो कैमरे लगे थे, जो प्यारे बापूजी की हर भाव-भंगिमा, हर शब्द, श्वास-निश्वास को रिकॉर्ड कर रहे थे। हजारों दूसरे श्रद्धालुओं की भांति मैं भी स्वयं को बड़ा सौभाग्यशाली अनुभव कर रहा था। बापू के साक्षात् दर्शन जो हो गए थे! तभी पीछे से किसी कैमरे का फ्लैश चमका। सामान्य-सी बात थी। उत्सुक भक्तगण अपने पूज्य, आदरणीय जनों की फोटो नहीं खींचते क्या? लेकिन बापूजी को यह हरकत नागवार गुजरी। वे आक्रोश में आ गए। तुरन्त फतवा जारी किया- "उसका कैमरा छीन लो। रील निकाल लो।" प्यारी-प्यारी बातें करनेवाले बापू जी, लोगों को क्षमा, दया और सद्भावना की शिक्षा देनेवाले बापूजी का यह नया रूप मेरे सामने था। मेरी आस्था थोड़ी-सी डिग गई। इस प्रकरण पर कई ग्रंथ लिखे जा सकते हैं। लेकिन मैं तो साहित्यिक होने के नाते केवल इतना कहूँगा कि बापूजी रचनात्मकता और कला-सृजन के विरुद्ध हैं। उनकी फोटो चाहिए? काउंटर से खरीद लो। जैसी फोटो बापूजी की स्वेच्छा से प्रचारित होती है, उनके कैलेंडर पर छापी गई है, बस उसी से संतोष करो। अपनी रुचि का प्रदर्शन करने, अपने कैमरे से, अपने इच्छित ऐंगल से फोटो खींचकर ज्यादा श्यांणा बनने की चेष्टा न करें। अपनी ओर से कुछ नया न सोचें। जैसा आश्रम में उपलब्ध है, बस उसी को बिना किसी आपत्ति के, यथावत स्वीकार कर लें तो बापू खुश। यदि आपने अपनी ओर से रचनात्मकता दिखाने की कोशिश की तो बापूजी कुपित हो जाएंगे और बहुत संभव है कि आपको कोई शाप-वाप ही दे डालें। उस दिन के बाद से अपन बापूजी के आश्रम नहीं गए। बापूजी के शिष्य और भक्तगण इस बात के लिए हमारी लानत-मलानत कर सकते हैं, लेकिन बापूजी ने कैमराधारी उन सज्जन के साथ-साथ हमारा भी दिल तो तोड़ ही दिया है। साथ ही हमें डर है कि यदि आधी-अधूरी आस्था लेकर कभी हम उनके सामने चले गये और अंतर्यामी बापू को हमारी डिगी हुई आस्था का आभास भी हो गया तो कोई अनिष्टकारी घटना भी हमारे साथ घट सकती है। इससे तो बेहतर है कि भइया दूर ही रहो इस पचड़े से।

इस दुनिया में भक्त का दायित्व है भगवान की हर बात को ज्यों का त्यों स्वीकार कर लेना। न शंका करो, न अपना दिमाग लगाओ। बापू जो कुछ कहते हैं, बस मानते जाओ। सोचने का काम बापू पर छोड़ दो, तुम तो बस उनका अनुसरण करो। बापूजी कहते हैं कि जो निगुरा हो, यानी जिसने किसी गुरु से विधिवत दीक्षा न ली हो, उसके घर का पानी भी नहीं पीना चाहिए। क्यों? क्योंकि निगुरे के घर का पानी मूत्र-तुल्य होता है। हाँ, किसी वनचारी गाय का मूत्र चाहे पी लो। गोमूत्र अमृत-तुल्य है। गाय का गोबर तो और भी उत्तम है। जितना खा सको, खाओ। गोबर खाओ, गोमूत्र पियो। उससे तुम्हारे जन्म-जन्मान्तर सुधर जाएँगे। सारे पाप धुल जाएँगे। पेट और दिमाग, दोनों के कीड़े साफ हो जाएँगे। सब आधि-व्याधियाँ दूर हो जाएँगी। बस इतना ध्यान रहे कि निगुरे के घर का पानी न पीना। निगुरे का छुआ हुआ कुछ भी खाया या पिया तो गए काम से। गोया निगुरे के हाथ में साइनाइड है जिसके संपर्क में आने से वस्तुएं विषाक्त हो जाती हैं। और यदि आपने एक बार दीक्षा ले ली तो? आठों याम बापू की भक्ति करो। किसी और का ध्यान-व्यान करने की कोई ज़रूरत नहीं। बस बापू को भजो। अव्वल तो उन्हीं को भगवान मानो और यदि किसी दूसरे को मानने की जरूरत भी आन पड़े तो अपने बापू को सबसे ऊँचा वाला भगवान समझो। यदि किसी हाड़-माँस वाले को भगवान मानने का जी न करे तो इतना तो मान ही लो कि बापूजी भगवान और आपके बीच के एजेंट हैं।

बापू लोगों का पूरा बल अधिक से अधिक लोगों को शिष्य बनाने पर रहता है। अपने देश की सरकार कितने जतन करने के बाद भी देश के सभी बच्चों को गुरुजी के पास पढ़ना-लिखना सीखने नहीं भेज पाई है। क्या-क्या उपाय नहीं किए गए! कौन-सा टोटका छोड़ा है? कभी मुफ्त वर्दी और कापी-किताब, कभी मोटा वजीफा तो कभी दोपहर का भोजन और कभी पुष्टाहार। इधर कुछ राज्य सरकारों ने स्कूल जानेवाली बालिकाओं को मुफ्त साइकिलें बांटी हैं। लेकिन निरक्षरता है कि देश से जाने का नाम ही नहीं लेती। जबसे बापू लोगों की महिमा अपनी समझ में आई है बार-बार हमारा दिल कहता है कि यदि देश में दो-चार सौ ढंग के बापू हो जाएँ और राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की बागडोर बापूजी लोगों के हाथ में दे दी जाए, तो बस कुछ ही दिनों में देश से निरक्षरता दूर हो जाए। देश की सारी अनपढ़, निरक्षर जनता बापू लोगों से दीक्षा लेकर साक्षर हो जाए। बापूजी हर निगुरे को सगुरा कर दें। क्योंकि जो निगुरा है, उसके जैसा पतित और घटिया इन्सान तो बकौल बापूजी कोई होता नहीं और बैकुण्ठ-कामी इस देश में कौन खुद को घटिया, पतित और स्वयं बापू व बापू-भक्तों के लिए अस्पृश्य कहलाना चाहेगा? किन्तु हमारी इस मनोकामना में एक बहुत ही गहरी विसंगति है, जो अधिकतर बापू लोगों के स्वयं निरक्षर भट्टाचार्य होने के कारण उपजी है। सच्चाई यह है कि अव्वल तो ज्यादातर गुरु लोग, खुद बहुत बड़े गुरु-घंटाल यानी निरक्षर होते हैं और जो इस देश के परम सौभाग्य से तथा अपने लाखों भक्तों के पुण्य-प्रताप से थोड़ा पढ़े-लिखे होते भी हैं उनकी रुचि किसी को पढ़ना-लिखना सिखाने में कतई नहीं होती। देश की चालीस-पैंतालीस प्रतिशत अनपढ़ जनता पढ़ना-लिखना सीख जाए, इस तरह का कोई सुविचार इन बापू लोगों के मन में कभी भूले से भी नहीं आता। बस उनकी तो एक ही साध है, किसी तरह लोगों के मन में बिठा तो कि निगुरे के घर का पानी भी मूत्र-तुल्य है। जो निगुरा है, उसे अस्पृश्य और समाज-बाह्य समझो। यह बापू लोगों का नया समाजशास्त्र है। इसीलिए अपना मत है कि बापूजी नैतिकता, आध्यात्मिकता, लोकाचार आदि के स्तर पर कोई रचनात्मक बातें नहीं करते।

हाँ, एक मामले में उनकी रचनात्मक सोच बिलकुल अद्भुत और श्लाघ्य है। वह है जैविक रचनाधर्मिता। बच्चों की आमद पर किसी भी प्रकार की रोक लगाने के बापूजी बहुत विरोधी हैं। बच्चे जितने पैदा कर सकें, करते जाएँ। भ्रूण-हत्या तो क्या, गर्भ-निरोध भी न करें। कारण बिलकुल स्पष्ट है। शिष्यों-प्रशिष्यों की संख्या बढ़ाने का एक बहुत बड़ा उपाय यही तो है। जितनी अधिक आबादी होगी, उतने ही अधिक शिष्य-प्रशिष्य होंगे। जितने अधिक शिष्य-प्रशिष्य होंगे, उतना ही अधिक पुजापा और चढ़ावा चढ़ेगा। उतना ही अधिक प्रसाद मिलेगा। बापू का जनाधार बढ़ेगा तो जाहिर है बापू का भंडार भी भरेगा और बढ़ेगा। बापू लोगों के तईं जानवरों और आदमियों में कोई खास अंतर नहीं है। भेड़ों में एक आदत होती है। जिधर एक भेड़ चल देती है, उधर ही सब की सब चल पड़ती हैं। यही स्थिति अनपढ़ इन्सानों की होती है। एक जिधर गया उधर ही सब के सब हो लेंगे- चल पढ़े जिधर दो डग मग में, चल पड़े कोटि पग उसी ओर। बापू लोगों को भीड़ चाहिए। भीड़ और भेड़ में बस एक मात्रा का अंतर है। इस बात को बापू लोग खूब जानते हैं। ऐसी भेड़ों का आवाहन करके, उनकी बलि चढ़ाने वाले भेड़ियों की कोई कमी नहीं। इसीलिए गाहे-ब-गाहे सुनने में आता है कि अमुक-अमुक पंथ के साधु लोग अमुक स्थान पर गलत हरकतें करते पकड़े गए, अमुक बापू ने अमुक अपराधी को प्रश्रय दिया और अमुक बापू के आश्रम में अमुक गोरखधंधा पकड़ा गया।

प्रसंगवश, यदि किसी पाठक की बापू-भक्ति को इस लेख से ठेस पहुँची हो तो वह हमें निगुरा और इस नाते अज्ञानी समझ कर माफ कर दे और कभी ऐसे बापू से उसका संवाद (जो भक्त और बापू में प्रायः दुर्लभ ही होता है) हो तो उन तक हमारी यह अर्दास पहुँचा दे।

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rvsingh@sidbi.in

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