रविवार, 4 मार्च 2012

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की कविता : बोलो बोलो क्या क्या बदलें ?

बोलो बोलो क्या क्या बदलें ?

बोलो बोलो क्या क्या बदलें
हवा और क्या पानी बदलें
स्वच्छ चांदनी रातें बदलें
या फिर धूप सुहानी बदलें?

शीतल मंद पवन कॆ झोंके
आंधी के पीछे पछियाते
मीठा मीठा गप कर लेते
कड़ुआ कड़ुआ थू कर जाते
हवा आज बीमार हो गई
पानी दवा नहीं बन पाया
तूफानों ने हर मौसम को
आंसू आंसू खूब रुलाया
बैतालों को बदल न पाये
विक्रम की नादानी बदलें?

पहले अंगुली फिर पहुंचे पर
पूरा हाथ पकड़ फिर लेता
बाहुबली सागर, नदियों को
किसी तरह काबू कर लेता
क्यों विराट का लक्ष्य यही है
लघुता को संपूर्ण मिटाना
भले रोम जलता रहता हो
नीरो से वंशी बजवाना
मच्छर का अस्तित्व मिटायें
या फिर मच्छर दानी बदले?

ऐसे ऐसे एक था राजा
एक हुआ करती थी रानी
इसी तरह बच्चों से कहती
रहती रोज कहानी नानी
जनता बहुत त्रस्त राजा से
रानी भी आतंक मचाती
प्रजा बेचारी डर के मारे
खुलकर के कुछ कह न पाती
जनता को जड़ मूल मिटा दें
या फिर राजा रानी बदलें?

पीली सरसों के घोड़े पर
चढ़ बसंत फिर फिर आ जाता
मेरे घर के लगा सामनॆ
आम कभी अब न बौराता
बड़े शहर की किसी सार में
गाय भैंस अब नहीं रंभाते
तथा कथित छोटे आंगन में
कार बाइक अब बांधे जाते
दुनियां को तो बदल न पाये
क्या हम राम कहानी बदलें?

नये साल में क्या क्या होगा
वही कहानी वही तमाशे
सच्चाई पर नहीं पड़ेंगे
क्या झूठों के रोज तमाचे?
सड़क गली में नहीं दिखेंगे
क्या अब नहीं भिखारी बच्चे
गांव शहर में नहीं बचेंगे
डाकू गुंडे चोर उचक्के
जब मेहमान बिगड़ जायें तो
क्यों न फिर यजमानी बदलें?

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------