रविवार, 18 मार्च 2012

एस के पाण्डेय की लघुकथा - प्रारब्ध

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प्रारब्ध

रामनगर के बाबाजी मनोहर के घर आये। मनोहर की पत्नी ने अपनी विवाह योग्य वेटी नेहा की शादी के बारे में पूछा। बाबा बोले ‘शीघ्र ही शादी हो जाएगी। लेकिन शादी के बाद कई वर्षों तक जीवन सुखमय नहीं रहेगा”।

मनोहर सोचने लगे कि बहुत सा दहेज देकर किसी अति सम्पन्न घराने में शादी करेंगे। और पति-पत्नी बोले “हम इसके लिए सारी खुशियाँ खरीद लेंगे”। बाबा बोले “ प्रारब्ध मिटाए नहीं मिटता। खैर कोशिश तो करना ही चाहिए”। यह कहकर चले गए।

कुछ दिन बाद बहुत सा दहेज देकर एक बहुत बड़े घर में नेहा की शादी कर दी गई। सब लोग कहते थे कि समझो राजा के घर में शादी हुई है। लेकिन कुछ दिन बाद पता चला कि धन से राजा दिखने वाले उसके घर वाले मन से कंगाल हैं। परिवार वाले उसकी छोटी-बड़ी किसी भी आवश्यकता का ध्यान नहीं रखते थे। उसके पति ने शादी के बाद पढ़ाई-लिखाई छोड़ दिया और यदा-कदा उसकी पिटाई किया करता था। कुछ भी जरूरत हो तो कहता था अपने माइके से मगा ले।

नेहा के माता-पिता उसके लिए खुशियाँ खरीदते रहे। लेकिन खरीदी हुई खुशी से नेहा ज्यादा खुश नहीं थी। फिर भी प्रारब्ध समझ कर एक अच्छे कल की आशा में जिए जा रही थी।

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डॉ एस के पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.)।

URL: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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1 blogger-facebook:

  1. har ghar ki khani hain ishiumeed main har ladki jee rahe hain shayad ayne wale kal acche hoga....

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