रविवार, 25 मार्च 2012

देवेन्द्र कुमार पाठक की चैतहर कविताई

नवगीत/चले चैतुए

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अपने घर-गाँव छोड़ चले चैतुए !

कब तक भटकाएगी ? पगडण्डी पेट की ,

साँसोँ का कर्ज़भार छाती पर लादे :

जाने किस ठौर-ठाँव करेँगे बसेरे !

 

बड़े भागवाले किस ख़ेतिहर के ख़ेत की

फ़सल की कटाई की उम्मीदेँ बाँधे ,

खुले गगन तले कहीँ डालेँगे डेरे ;

पुरखोँ की धरती की ममता के पिंजरोँ मेँ

लगते चौमास लौट आएँगे ये सुए !

 

सोचेँगे जीने की और कोई नई जुगत ,

या बँधुआ हलवाही मेँ कस-फँस जाएँगे ,

दुर्गम दुर्दिन पर्वत लाँघेँगे जैसे-तैसे ;

कड़वे मीठे कितने अनुभव पल भोग भुगत ,

नए सबक सिक्के मध मेँ गँठिये लाएँगे ,

बतियाएँगे बीते बंजारे दिन कैसे

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