दिनेश शर्मा की कविता - ताबूत

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ताबूत
हमारी मृत्यू के पश्चात 
हमें मत ले जाना श्मशान 
मत लेना कोई शोकसभा 
मत सुनाना 
विदाई  का गान 
 
सभी रिश्तें 
हम तक आते आते 
मुरझाते रहे‚
जिंदगी के गुणा भाग 
हम सारा जीवन 
सुलझाते रहे। 
 
पहले टूटे सपनों से‚ 
फिर छूटे अपनो सें ।
आसपड़ोस के बच्चे
हमें तंग करते रहे‚
शहर की सभाएँ‚ 
पूजा के उत्सव 
हमारी शांति भंग करते रहे।
 
सूरज का ऊगना 
फूलों का खिलना 
हम देख नहीं पाए‚
बच्चों की मुस्काने 
बूढ़ो की दुआएँ
हम सुन नहीं पाए। 
 
सभी ॠतुएँ 
हमारे आँगन में 
आने को तरस गयी‚
कोई  शुभकामना 
हमारे  घर से 
बाहर नहीं गयी।   
 
बच्चे होस्टल में रहे
माँ बाप गाँव में‚  
हम यहीं सूखते रहे 
क्रांकीट की छाँव में।
 
हम‚ 
हर नयी शरूआत को 
अपनी जानलेवा उपेक्षा से 
कुचलते रहे
टी।वी। पर लाइव बहस सुनते
हम घर में पड़े पड़े ही 
जमाने को बदलते रहे।
 
श्मशान तो बंजर है 
जो सिर्फ  ले लेता है 
लौटाता कभी नहीं‚ 
हम भी इसीतरह जिए
बस लिया ही लिया
लौटाया कभी नहीं।
 
हम‚
ना खुल कर जिए 
ना किसी पर मरे‚
हँसे इसीलिये नहीं‚
कि हँसे तो फँसे। 
 
हम‚ 
भूतप्रेत की तरह 
जो बीत गया 
उसी के साथ अड़े रहे‚ 
जिंदगी को ताबूत बनाकर 
हम उसी में पड़े रहे।
 
दिनेश शर्मा ‚ 
dgsharma07@gmail.com

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(चित्र - नव सिद्धार्थ आर्ट ग्रुप की कलाकृति)

1 टिप्पणी "दिनेश शर्मा की कविता - ताबूत"

  1. हम‚
    भूतप्रेत की तरह
    जो बीत गया
    उसी के साथ अड़े रहे‚
    जिंदगी को ताबूत बनाकर
    हम उसी में पड़े रहे।
    bahut Badhiyaa !!! Marmik !!!

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