बुधवार, 21 मार्च 2012

अवधेश तिवारी की बुंदेली हास्य कविता - कँदर मँदर जी होवे...

  कँदर मँदर जी होवे
       कँदर मँदर जी होवे मेरो कँदर मँदर जी होवे
       पिया न लौटे अब तक बिन्नी मेरो मनुआ रोवे|

     भुनसारे के निकरे कहखें चाँदामेटा जाहूँ
      आज फसनवारो है सट्टा चौउआ क्लोज़ लगा हूँ
      भुन्सारे सें संजा हो गई अब तक लौटो नईंयाँ
      मोहे लगत है ओपन क्लोज़ सुनई खे आहे सईंयाँ
      लड़का बच्चा सबरे जग रये मुन्ना बी न सोवे
      कँदर मँदर जी होवे मेरो कँदर मँदर जी होवे|

      इत्तो सुनखे मुन्ना बोलो बऊ तू मत कँदराये
      पक्कई चऊआ फँद गओ ओको जभई न दद्दा आये
      पहले वे सट्टा पट्टी वारे सें लेहें चुकारा
      फिर वे लेहें पोलका तोरो,मेरो मीठा खारा
      नईहाँ दम बऊ कोई की,दद्दा को रुपया डोबे
      कँदर मँदर मत होवे बऊरी कँदर मँदर मत‌ होवे|

      बात चलत्ती कि इत्तई में दद्दई आत दिखाने
      मुहड़ो पूरो तुतरा गओ थो लग रये थे खिसयाने
     मुन्ना समझ गओ दद्दा ने ले लओ तगड़ो पऊआ
      दद्दा बोले दुक्की आ गई फिर नईं आओ चऊआ
      इत्तो सुनखे मुन्नी की बऊ धड़ने गिर गई आड़ी
      किस्मत की गबदस में फँस गई अब जिनगी की गाड़ी
      पर मुन्नी हँसखे बोली दद्दा‍..मती खेलियो सट्टा
      बिक जाहें रे बैल बछेरू उड़ जाहे रे फट्टा
      दुग्गी के पीछे दद्दा मत घर की इज्जत धोवे
      कँदर मँदर सबको जी होवे कँदर मँदर जी होवे|

         Awdhesh Tiwari chhindwada M P

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