शनिवार, 10 मार्च 2012

नन्दलाल भारती की कविताएँ

भारतीयता के राह जाएँ .
कल होली थी रंग भी बरसे
बरसों पहले जैसे ना सरसे
सरसे भी कैसे वक्त कहा...
हेलो -हाय- बाय-बाय चलते-चलते
मिलावटी रंग कहीं तन बदरंग या
कोई जख्म ना दे दे का भय ..............
महंगाई और मिलावट के द्वन्द के बीच
होली सजी जली और मनी
कल ही होली बीती
आज निशान ढूंढना पड़ रहा है ..........
मिलावटी दिखावटी कहाँ ठहरेगा
महंगाई का असर दिखेगा
होली खुशियों का त्यौहार
सद्भावना,संस्कृति परंपरा बसंत बहार.....
बदलते वक्त में होली मनाने के
तरीकों पर करें विचार
चावल, कंकू, हल्दी या चन्दन का
तिलक लगाए
पानी पैसे की तरह ना बहाए .....
घर के बने व्यंजन
खिलाये और खाए
समभाव सद्भाव संग खुशियाँ मनाएं
त्यौहारों के असली अस्तित्व बचाए
भारतीयता के राह जाएँ


बधाई हो कन्हाई
बसंत पंचमी, माँ भारती के
आराधना का दिन
इसी दिन फल फूल से लदा
रेड का पेड़ कट गया
काकी खूब गरियायी
ओरहना घर-घर दे आयी II
बच्चे इकट्ठा हो आये
काकी के कुंडी बजाये
काकी चिल्लाई
रेड के चोर आये
बच्चे खिलखिलाए और
जोर से चिल्लाए
काकी बुरा नो मानो होली आयी
काकी दांत लगाई आधे गाल मुस्काई
डंडा गाड़ने के जश्न में काकी
हंसी -खुशी आयी II
सजने लगा होली का डंडा
बच्चो ने खड़ा कर लिया पहाड़
नीम-बांस के पत्ते ,कंडे,पुआल,
रहतठा,लकड़ी का ,
होली के दिन पूरे गाँव की
हाजिरी में
होलिका दहन हुआ
लपटे दूर -के कई गांवो तक
देखी गयीं
लगा अहंकार भस्म हो गया II
खुशी में जश्न जमा
बांस की पिचकारी से निकला रंग
आकाश तक उड़ा
भर-भर मुट्ठी गुलाल गाल मले
गले मिले -मिलाये
गुड -बतासे मिठाई खिलाये -खाए II
बज उठे ढोल नगाड़े
शुरू हुआ होली के गीत संगीत
बिरहा,नांच गाने के संग
भंग -ठंडाई का दौर
जो देर रात तक चला
पूरा गाँव होली के जश्न में रहा डूबा II
वो भी क्या दिन थे
हाथ तंग और खुशिया भरपूर
मेहमान देवता
आज भी होली है
हाईटेक जमाना है
लेकिन समय कि कमी
ना मिलने-मिलाने का बहाना II
जोर आजमाईश की रस्सा-कसी
इसी बीच महंगाई का
उठ रहा धुंआ वैसे
भूंज गयी हो कुन्तलों आग में
लाल मिर्च जैसे
और
भर आयी हो आँखे II
आस्था-विश्वास रीती-रिवाज है
होली त्यौहार
कितनी क्यों ना हो महंगाई
उड़ता रहेगा गुलाल रंग
सोच-विचार में डूबा
इसी बीच गृह लक्ष्मी सजी -सजाई
थाली लेकर आयी
माथे गुलाल लगाई
बोली होली के बधाई हो कन्हाई
फिर क्या उठ गयी
गूंज बधाई हो बधाई  ......

कसम उम्र भर
नहीं थमा जीवन सफ़र प्यारे
शरंडो के झरते जुल्म सारे
बचाता गया साबूत
सबका रखवाला
पर ढोने को मिला कमर तोड़
रिसता दर्द ,मशकत
मरते सपनों का बोझ
ज़माने का हर चौराहा
सूना लगा प्यारे ......
जहां चाह वहाँ राह
यही होता है विश्वास और
वंचित गरीब आदमी की थाती
मशकते बहुत चाह सकून
सहने को दर्द तड़पने को बेबस
झरता श्रमनीर झराझर
शरंडो की जोर अजमाईस का
मैदान मिलता
शोषितों की छाती
शरंडो की खूनी प्यास से
छलती रही शोषितों की चाह सारी......
शरंडो की सत्ता और
जोर अजमाईस से
शोषित कभी ना थे बेखबर
छ्ला जा रहा है उनका मंतव्य
बिछ रहे शूल राह निरंतर
कब तक जारी रहेगा सफ़र.................
शूल की सेज पर जीने को
शोषित हो रहा अभ्यस्त
यही नसीब बना दी गयी है
शोषित हाशिये के आदमी की
वह भी दृढप्रतिज्ञ
मंजिल की चाह में खा लिया है
चलते रहने की कसम उम्र भर

ना जाने क्यूं
ना जाने क्यूं कुछ लोग
दुश्मन मान बैठे हैं,
मेरा गुनाह है तो बस
मैं
देश, आम आदमी, शोषितों-वंचितों के
भले की बात कहता हूँ
यूं ही दुश्मन मान लिया गया हूँ...
मेरी कब्र खोदे हैं,
बुराईयों के खिलाफत में उभरे
मेरे शब्द
रूक गयी मेरी तरक्की
लूट गया हक़ सरेआम
खुशियों पर खूब ओले पड़े
और पड़ रहे हैं
किन्तु जी बहलाने के लिए मिल गए है
कई उजले तमगे ...........
सच तो ये है कि मैं और हमारे लोग
कभी विरोधी नहीं रहे
ना नेक आदमी का ना आदमियत का
ना राष्ट्र का ना राष्ट्रीय एकता
ना मानवीय समानता का
फिर भी
मैं और मेरे जैसे लोग
दूध में गिरी मक्खी की तरह
दूर फेंक दिए गए हैं ....
हाँ मैं समर्थक हूँ
जल -जी -जंगल और प्रकृति का
स्व-धर्मी समानता-नातेदारी का
आदमियत-सर्वधर्म सदभावना का
शोषितों-वंचितों के
सामाजिक-आर्थिक उत्थान का
और राष्ट्रधर्म का .......
मैं समझ गया हूँ
मेरी राह फूल तो नहीं
कांटे जरुर बिछेगे
मैं खुश हूँ अपने कर्म से
जो राष्ट्रद्रोह तो कतई नहीं
अन्याय,जातिवाद-धर्मवाद का
संरक्षण भी नहीं .........
मेरी खुली आँखों के सपनों का
दहन तो हुआ है ,पर गम नहीं
क्योंकि सभी मुट्ठी बांधे आये हैं
हाथ फैलाये जाना है
बस देश ,प्रकृति और
हाशिये के आदमी के हित में ,
स्वर बुलंद करना है
भले ही कुछ निगाहों में
दुश्मन बना रहूँ ..........


पुरुषार्थ ...
पुरुषार्थ और कौतुहल भरे
इन्तजार में
पांच दशक पुराना हो गया हूँ
उड़ान भरने और आकाश छूने की
ख्वाहिश पूरी नहीं हो सकी
भेद भरे जहां में आज तक .......
जहां दशको के पुरषार्थ को
आंसू और जख्म मिले है
अभी तक
पंख नोंच-नोंच उखड़े गए
आगे पीछे कुआं और
खाई खोदा गया
ताकि असमय अलविदा कह दू
ऐसा नहीं हो सका
बचाती रही कोई अदृश्य शक्ति .....
लालसा बढ़ती रही और पुरुषार्थ भी
ऊँची उडानें भरने के लिए
गफलत और रंजिश के शोर
सपनों के क़त्ल की साजिश
सफल होती रही
शरन्ड़ो और जलौकाओ के
इशारे पर .........
हक़ को बेख़ौफ़ ढाठी
आँख फोड़ने हाथ काटने
रोटी छिनने की शाजिशें भरपूर हुई
हौसले की आक्सीजन पर
ख्वाहिशें कम नहीं हुई ...........
पुरषार्थ के दुश्मनों
शरन्ड़ों और जलौकाओं को
कहाँ पता ख्वाहिशें अंतरात्मा की
उपज होती है
विश्वास है ख्वाहिशें होगी काबू
खुदा की अदालत में
एक दिन
क्योंकि आस्था के साथ
अनवरत जारी है पुरुषार्थ ....

.....नन्दलाल भारती ..०४.०३.२०१२

1 blogger-facebook:

  1. बहुत सुंदर रचनाएँ भारद्वाज जी ....बधाई |

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