गंगा प्रसाद शर्मा 'गुणशेखर' की होली विशेष दोहे

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जाति,धर्म ,भाषाएँ,बोली, सारे भेद भुलाती होली
सबको गले लगाती आती प्रेम का पाठ पढ़ाती होली
आपको होली की मंगलकामनाएँ!


मँहगाई के भार से, चलना बहुत मुहाल।
फ़ीका है इस बार भी रंग, अबीर, गुलाल।।


जहाँ सो गया वहीं घर, जहाँ बसा वह देश।
किसी गरीब का कब हुआ ,अपना देश, प्रदेश ।।


फागुन को ऐसी चढ़ी, गाढ़ी भंग-तरंग।
मार रहा पिचकारियाँ, भर-भर नाना रंग।।


मँहगाई है होलिका, और आय प्रह्लाद ।
बची होलिका, जल गए आनंद और आह्लाद।।


शीत लहर कब की गई,छाई मलय बयार ।
घर-घर फागुन बाँटता ,राग,फाग औ प्यार।।


माना होली प्रेम का, रंगों का त्योहार।
किंतु बदलना है हमें, इन सब का व्यवहार।।


भरे गले तक प्रेम को , होली का त्योहार।
हँसी-खुशी पहना रहा, नव गुलाब का हार।।


कहीं न कोई दुखी हो ,रहे न रंच मलाल।
फागुन ऋतु का डाकिया, बाँटे रंग गुलाल।।


पहले जो बजते रहे,तासा,ढोल,मृदंग।
ना तो वैसे साज़ हैं,और न वैसे ढंग।


तन ही तन झूमा किए, मन की लुप्त तरंग।
रंग गए खेले बहुत, चढ़े न कुछ भी अंग।।

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(चित्र - मुखौटा कलाकृति - साभार नव सिद्धार्थ आर्ट ग्रुप)

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