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प्रमोद भार्गव का आलेख - मई दिवस के अवसर पर : मजदूरों के एकीकरण से विस्‍थापन तक

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जो मई दिवस दुनिया के मजदूरों के एक हो जाने के पर्याय से जुड़ा था, भूमण्‍डलीकरण और आर्थिक उदारवादी नीतियों के लागू होने के बाद वह किसान और मजदूर के शोषण और विस्‍थापन से जुड़ता चला गया। मई दिवस का मुख्‍य उद्‌देश्‍य मजदूरों का सामंती और पूंजी के शिकंजे से बाहर आने के साथ उद्योगों में बराबर की भागीदारी भी थी। जिससे किसान-मजदूरों को राज्‍यसत्ता और पूंजी के षड्‌यंत्रकारी कुचक्रों से छुटकारा मिल सके। लेकिन भारत तो क्‍या वैश्‍विक परिप्रेक्ष्‍य में भी ऐसा संभव हुआ नहीं। भारतीय परिदृश्‍य में यही कारण है कि करीब पौने दो सौ जिलों में आदिवासी व खेतिहर समाज में सक्रिय नक्‍सलवाद भारतीय राष्‍ट्र-राज्‍य के लिए चुनौती बना हुआ है। ओड़ीसा में एक भाजपा विधायक और छत्तीसगढ़ से कलेक्‍टर का अपहरण करके नक्‍सलवादियों ने संविधान के दो स्‍तंभ विधायिका और कार्यपालिका को सीधी चुनौती पेश की है। दरअसल कथित औद्योगिक विकास के बहाने वंचित तबकों के विस्‍थापन का जो सिलसिला तेज हुआ है, उसके तहत आमजन आर्थिक बद्‌हाली का शिकार तो हुआ ही, उसे अपनी सामाजिक और सांस्‍कृतिक पहचान बनाए रखने के भी संकट से जुझना पड़ा है। मसलन एक ओर त…

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य - मध्‍यावधि चुनावी बाजा और ढपली

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आज कल हर कोई मध्‍यावधि चुनावों का बाजा बजा रहा है। हर हारा हुआ दल या नेता मध्‍यावधि चुनावों का बाजा आम चुनाव के तुरन्‍त बाद बजाने लग जाता है। चुनाव कब होंगे कोई नहीं जानता मगर हर दल मध्‍यावधि चुनावो का राग अलापता रहता है। चुनावों के लिए कमर कस कर तैयार नेता हार जीत की परवाह नहीं करता वो तो बस ये जानता है कि हो सकता है अगले आम चुनाव में उसकी लाटरी लग जाये। उत्‍तर प्रदेश में जीतते ही मुलायम सिंह ने दिल्‍ली में धावा बोलने के लिए मध्‍यावधि चुनावों के तबले पर थाप दी। ममता ने बंगाल से ही सुर मिलाया और दिल्‍ली में मध्‍यवधि चुनावी बाजा अपने सुर में बजने लगा। सत्‍ताधारी पक्ष जानता है कि इस बेसुरी सारंगी से संगीत नहीं बन सकता है ये तो बस शोर-गुल है, मगर सरकार के गठबंधन वाले दल इस मामले को हवा में देने में क्‍यों पीछे रहे। सरकारी सुविधाओं वाले सभी जानते है कि यदि चुनाव हुए तो लुटिया डूबते देर नहीं लगती। अपनी डूबती नैय्‌या को बचाने के लिए इस बेसुरे आलाप को प्रलाप घोपित करना अनिवार्य है सो सरकारी भोंपू हर मंच पर इस मध्‍यावधि बाजे से ज्‍यादा तेज आवाज में चिल्‍ला चिल्‍ला कर इस दावे की हवा निकालने म…

मोहसिन खान की 2 लघुकथाएं

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लघुकथानींवजब खेत से मक्का और ज्वार की फसल की कटाई हो गई तो रघु ने शहर की राह ली, यह सोचकर कि खेत तो खाली हैं, शहर में चलकर मज़दूरी करके कुछ रुपये ही कमा लिए जाएँ । शाम को ही वह गाँव से शहर की ओर चल दिया ताकि सुबह से ही वह काम पर लग जाए । हर साल की तरह रात उसने प्लेटफ़ार्म पर ही कट ली सुबह ही वह शहर में बाज़ार के उस चौक पर पहुँच गया, जहाँ से मज़दूरों को मज़दूरी के लिए सौदा करके ले जाया जाता है । रघु को एक ठेकेदार नए मकान की नींव खोदने के लिए ले गया । उसके साथ और भी मज़दूर गए, रघु ने देखा कि एक साँवली सी लड़की भी है । जगह पर पहुँचकर नींव खोदने का काम प्रारम्भ हुआ, धीरे-धीरे सभी मज़दूरों में पहचान बनती गयी । शाम होते-होते तो सभी घुल–मिल गए । दिनभर में रघु की उस साँवली सी लड़की से कई बार आँखें दो-चार हुईं, रघु को उसकी दिल्लगी की मौन स्वीकृति का एहसास हो गया था । अगले दिन सुबह फिर सभी मज़दूर नींव खोदने उसी जगह पर एकत्रित हुए । रघु की आँखों में आज नई चमक थी और शरीर में इतना जोश कि लगता था कि वह आज नींव खोदते-खोदते धरती में आर-पार छेद बना देगा । सुबह से ही वह लोकगीत गाते हुए गर्मजोशी से काम करता जा …

हिमकर श्याम का व्यंग्य आलेख - शब्द ही सबकुछ है

शब्द ही सबकुछ हैहिमकर श्याम शब्द क्या नहीं है? शब्द ही ब्रह्मा है, शब्द ही विष्णु है, शब्द ही शिव है, शब्द ही साक्षात् बह्म है, शब्द के इसी निराकार रूप को सादर नमन्। यह कहावत अब पुरानी पड़ गयी है कि हर सफल व्यक्ति की सफलता के पीछे कोई औरत होती है। आज हर सफल व्यक्ति के पीछे शब्द होता है। यानि, मनुष्य की सफलता का राज शब्द में निहित है। शब्द के बिना भाषा की और भाषा के बिना मनुष्य की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। शब्द पर रीझनेवाले लोग पुराने दौर में ही नहीं आज भी अपना योगदान दे रहे हैं। शब्द की महिमा अपरम्पार है। शब्दों में चिकनापन, भारीपन, मीठापन, कड़वापन, लचीलापन जैसे गुण पाये जाते हैं। समय के साथ इसके गुण-धर्म में परिवर्तन होते रहते हैं। भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में शब्द विभिन्न रूप धारण करते हैं। आज शब्दों की भीड़ में कोई शब्द दुखी नजर आता है तो कोई सुखी। शब्दों के इसी भीड़ में से कोई शब्द एक दूसरे को धकियाता, लतियाता आगे बढ़ जाता है और बेचारा कमजोर शब्द अपने अस्तित्व के लंगड़ेपन को कोसता हुआ अपनी बारी की प्रतीक्षा करता रह जाता है। जो शब्द के धनी होते हैं वे जेब से भी धनी होंगे इसमे…

हिन्दी का गौरवशाली अध्यायः हिन्दी-विश्व गौरव-ग्रन्थ - कृष्ण कुमार यादव

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हिन्दी का गौरवशाली अध्यायः हिन्दी-विश्व गौरव-ग्रन्थ - कृष्ण कुमार यादव

डा0 राजेन्द्र नाथ मेहरोत्रा द्वारा संपादित हिन्दी-विश्व गौरव-ग्रन्थ (प्रथम खण्ड) से प्रथम परिचय तब हुआ, जब अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में पदस्थ रहने के दौरान पहली बार इसकी समीक्षा पढ़ी थी। तभी से मन में चाह थी कि इस ग्रंथ को मंगवाना सुनिश्चित करूंगा और इसी बहाने अपने ज्ञान में कुछ और वृद्धि कर सकूंगा। कहते हैं जहाँ चाह, वहाँ राह। अंडमान से इलाहाबाद में स्थानांतरण को एक माह भी नहीं बीते होंगे कि डा0 मेहरोत्रा का फोन आया। उन्होंने मेरे द्वारा संपादित पुस्तक, ”क्रांति यज्ञः 1857-1947 की गाथा” की प्रशंसा की और इसी क्रम में हिन्दी-विश्व गौरव ग्रंथ की भी चर्चा की। फिर क्या था, अगले तीन दिनों में यह ग्रंथ मेरे सामने था। पहली बार इसे देखकर लगा कि यह किसी प्रतिष्ठित प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है पर अगले ही पल महसूस हुआ कि यह एकला चलो की राह पर डा0 मेहरोत्रा जी के अथक प्रयास का मीठा फल है।
अतीत की श्रृंखलाओं को वर्तमान से जोड़ते एवं वर्तमान के आधार पर भविष्य की हिन्दी का सुन्दर खाका खींचता यह ग्रंथ अपने में एक समग्र शोध कार्य है। …

मोतीलाल की कविता

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बहुत क्षण ऐसे आए
जब आसमान मेँ तने
ऐन सूरज के नीचे
गुम हो गयी सारी पंक्तियाँ
और तन गयी
कोलतार सी नंगी देह
ठीक जावाकुसुम की तरह

विस्फारित खुली आँखोँ मेँ
अंदर की आवरगी
नहीँ छूटी थी
और लाख चाहने पर भी
लालटेन जला ही नहीँ था
दोपहर की शाखोँ से टकराते
नंगे पैर
धूप से जलते रहे
और फागुन के गीत
उन होँठोँ मेँ
आया ही नहीँ
जहाँ देह के पसीने
हथेली मेँ बंद हो गये थे

अपनी जगह के लिए
कभी-कभी तो
न चाहते हुए भी
चप्पे-चप्पे धूप खिल जाते हैँ
और राहत कार्योँ की गिट्टियाँ
रोटी के मूक प्रश्न मेँ
हथेली मेँ आ जाते हैँ ।

* मोतीलाल/राउरकेला

अखतर अली की दो लघुकथाएं

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प्रेम कथालड़के का नाम -  चुप लड़की का नाम - ख़ामोशी गाँव का मुखिया -शोर अंत                 - पारंपरिक सत्य कथाएक आदमी के दो बेटे थे ,दोनों हमशकल , उसमे एक नेता था और दूसरा पागल , वह आदमी ज़िन्दगी भर नहीं समझ पाया उसका कौन सा बेटा नेता है और कौन सा बेटा पागल | -------------X---------------- अखतर अली फजली अपार्टमेंट आमानाका ,कुकुरबेड़ा रायपुर |

सुरेश कुमार 'सौरभ' के 21 हास्य दोहे

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1-
खर्चा यदि बचाने की, तुझे लगी है चाह।
करके नैना चार तू , करले प्रेम विवाह।।
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2-
मँहगाई डायन भई, बेरोजगारि चुड़ैल।
पैसा को नहिं समझिए, अब हाथों का मैल।।
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3-
हिन्दी भाषा हाय रे, घर की रही न घाट।
थूक गये अंग्रेज जो, इंग्लिश रहे हो चाट।।
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4-
अध्यापक की नौकरी, गईं ललायिन पाय।
लाला जी चौका करें, घर में शिशु खेलाय।।
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5-
नेता जी तो ठीक हैं, नहीं हैं उनमें खोट।
बुड़बक तो हम लोग हैं, दियें उनहिं को वोट।।
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6-
पिछली बातें भूलकर, आगे की अब सोच।
कुर्ता फाड़ न सर पटक, बालों को मत नोच।।
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7-
तेल भराने को नहीं, पाकिट में है धन।
हीरोहोंड-दहेज में , माँगने का तुझे मन।।
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8-
गइ भैंसिया पानी में, तो होत क्यूँ परसान।
दिन है बन्धू गर्मि का, करने दो असनान।।
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9-
मालुम नहीं क्यूँ उल्लु ही, कहे तुझे सब कोय।
सात बजे से पहिलेहि, तू तो जाता सोय।।
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10-
अब गुलजामुन बरफि …

विश्वजीत सपन की ग़ज़ल - सुन हमारी कहानी ज़माना उफ़क़ पे खूँ लगा जा रहा था

एक ग़ज़ल
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आज दिल जो जला जा रहा था
आग उसमें उठा जा रहा था
जिसने देखा तमाशा अजल का,
ख़ाक में वो मिला जा रहा था
फूल सब जल चुके थे ख़िज़ाँ में
फ़लक़ में लौ उठा जा रहा था
जिस्म में अब हरारत हमारी
ज़िन्दगी को दिखा जा रहा था
सुन हमारी कहानी ज़माना
उफ़क़ पे खूँ लगा जा रहा था
ग़ैर की जिन्दगी में ‘सपन’ तो
बन मसीहा घुटा जा रहा था--

एस. के. पाण्डेय की लघुकथा - किस्मत

किस्मत रानू पार्क में बैठा हुआ एक बूढ़े से बात कर रहा था। वह इतनी ऊँची आवाज में बोल रहा था कि पार्क में आये हुए अन्य लोग उसे देखने व सुनने लगते थे। वह कह रहा था कि हमारे गाँव का सोनू और मैं एक ही कक्षा में पढ़ते थे। सोनू पढ़ने में बहुत तेज था। वह रोज स्कूल जाता था और बहुत मेहनत करता था। मेरा मन पढ़ाई में नहीं लगता था। घर से तो मैं भी रोज जाता था। लेकिन स्कूल कभी-कभी ही पहुँचता था। कभी सिनेमा देख कर और घूम-घाम कर वापस आ जाया करता था। किसी-किसी दिन जंगल में बैठ कर ताश खेलते थे। और पेड़ पर चढ़कर सिनेमा वाला गाना गाते थे। पिता जी अक्सर डाँटते थे कि सोनू को देखो कितना मेहनत करता है। रात में दस बजे तक पढ़ता है और सुबह भी जल्दी उठ जाता है। और तुम सूरज उगने के बाद तक सोते रहते हो। जब किस्मत में खेत जोतना ही लिखा है तो दिमांग में पढ़ाई-लिखाई क्यों बैठेगी ? देख लेना सोनू कोई साहेब बनेगा। इतना कहकर रानू ठहाका लगाकर हँसा। फिर कई लोग उसे देखने लगे। वह बोला कि आज सोनू खेत जोतता है और मैं अठारह हजार महीने की सरकारी नौकरी करता हूँ। बूढ़ा बोला बेटा तुम्हारी किस्मत में सरकारी नौकरी और सोनू के खेती-बारी ही थी तो…

अतुल कुमार रस्तोगी की कविताएँ

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1. क्या करें, इस फ़िक्र में भगवान बैठे हैंक्या करें, इस फ़िक्र में भगवान बैठे हैं। क्या बनाया, क्या बने इंसान बैठे हैं। राम को करते भ्रमित मारीच हर युग में, स्वर्ण से लदकर सभी हैवान बैठे हैं। मुल्क़ को तक़दीर भी कब तक बचाएगी, आसनों पर गिद्ध धारे ध्यान बैठे हैं। दर पे अब किस सर झुकाएँ,मन्नतें माँगे, पत्थरों से हो गए भगवान बैठे हैं। भीड़, भागमभाग, भारी शोर शहरों का, पंगु जीवन, आदमी सुनसान बैठे हैं। सब गुजरते जा रहे हैं पैर रख-रखकर, सर बचाने का लिए अरमान बैठे हैं। कृष्ण भी बनने लगे हैं कंस कलियुग में, क्या लिखें अब सोच में रसखान बैठे हैं। दिल से पत्थर फेंककर हर आसमाँ छिद जाए, कितने इस भ्रम में गवाँकर जान बैठे हैं। जंग जीवन जीतने की धुन सुना तू चल लोग सर पकड़े लहू-लुहान बैठे हैं। अब जले ये आशियाना या बुझे फिर लौ, आग से हम खेलने की ठान बैठे हैं। 2. हरिद्वारमहादेव पैरों के नीचे पड़े हुए थे पग-पग पर, कल-कल करती गंगा छल-छल जल करता चंचल पग धर । घंटों-घड़ियालों की ध्वनि से भरा हुआ आकाश मगन, शिव बमभोले - शिव बमभोले गूँजे धरती गर्भ गगन, महके अगरू, चंदन भीगे, फूलों की गम-गमक सघन, धूप, दिये, आरती, …

प्रियंका सिंह का आलेख - किशोरावस्था में विकास एवँ शिक्षा का महत्व

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प्रियंका सिंह (शोधकर्ती)गृहविज्ञान संकाय,वनस्थली विद्यापीठ,टोंक (राजस्थान)बालक राष्ट्र कि धरोहर होते हैं। सुविख्यात अंग्रेजी कवि मिल्टन का कथन है कि - “यथा सूर्योदय होने पर ही दिवस होता है ” वैसे ही मानव का उदभव बालक से होता है। अत: प्रत्येक राष्ट्र का यह परम पुनीत कर्तव्य है। कि वह अपने अमूल बाल धन की सर्वाधिक सुरक्षा करे। परिवर्तन एक शाश्वत नियम है परिवर्तन के इस चक्र से हर समाज एवं व्यवस्था को गुजरना होता है आज भारतीय संस्कृति में त्याग, तपस्या, श्रम ,साधना, प्रेम, दया - भाव, बड़ों के प्रति आदर भाव, सदाचार, शालीनता आदि मूल्यों के आधार पर स्वार्थ, अशिष्ट, द्वेषभाव, हिंसा, संवेदनशीलता, असत्य, छल -कपट, जैसे मूल्यों का विकास होता है। इन सब का सर्वाधिक प्रभाव आज के किशोर बालक बालिकाओं में ज्यादा देखने को मिलता है। आधुनिक युग में किशोरों की विशेषताओं को ध्यान में रखकर शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिये। वही शिक्षा किशोरों के लिये लाभप्रद होगी क्योंकि किशोरों के सम्पूर्ण विकास में शिक्षा का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान है। शिक्षा एक महत्वपूर्ण सामाजिक क्रिया है जिसका आयोजन छात्रों के संरक्षको…

धनंजय कुमार उपाध्याय “कर्णप्रिय” का व्यंग्य - मां की ममता लाजवाब

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माँ की ममता लाजबाब (व्यंग्य) अपने सभी भाई-बहनों में मेरी नाक थोड़ी ज्यादा ही मोटी है. हंसने पर नाक के फुफकारने की सी फूल जाती है. मगर माँ की ममता इसे मानने को तैयार ही नहीं होती, वह मेरी नाक को अत्यंत ही सुन्दर और नुकीली बताती है. इसलिए मुझे कभी –कभी शीशे पर भी संदेह हो जाता है. चेहरे में सब भाग तो काबिले तारीफ है सिवा नाक के. माँ मुझे परिवार में सर्वाधिक सुंदर और बुद्धिमान बताती है मगर मुझे अपने आप पर विश्वास ही नहीं होता है. क्योंकि मुझे अपनी इन दोनों ही चीजों पर बचपन से शक रहा है. कभी-कभी मैं अपने इस शक को दूर रख कर सोचता हूं तो निःसंदेह मुझे भी अपने-आप पर गर्व होता है. दिमाग फिरंगी है मेरा और हमेशा से ही उलूल-जुलूल बातों पर विश्वास करता आया है,सिर्फ बेतुकी बातों पर ही चिंतन से चिंता तक करता आया है तथा अक्सर ही मुझे बाबूभाई कटारा से तुलना करने को प्रेरित करता है, अमेरिका से कनाडा तक मुझे एक ऐसी परिवहन व्यवस्था से सैर करा देता है जो अकल्पनीय है. बस !अगर मैं अपनी सुंदरता के शक को दूर रख कर सोचता हूँ तब. इन सभी विचारों को कार्य रूप में परिणत करने के लिए मेरे परिवार की आर्थिक बदहाली आ…

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य - कस्‍बे की अखबारी दुनिया

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कस्‍बे की अखबारी दुनिया यशवन्‍त कोठारी कभी आपने सोचा है कि छोटे शहरों या कस्‍बों से निकलने अखबारों की असली समस्‍या क्‍या होती है मैंने इस सम्‍बन्‍ध में अपने कवि मित्र के साथ मिलकर अत्‍यन्‍त मौलिक चिन्‍तन किया है जिसे श्रीमान्‌ की सेवा में सादर प्रस्‍तुत करता हूं। कवि मित्र ने बताया कस्‍बे के अखबार में आप प्रधानमंत्री के खिलाफ लिख सकते है मगर इलाके थानेदार या एस․डी․ओ․ के खिलाफ नहीं लिख सकते। इसी प्रकार आप स्‍थानीय नेताओं, भू माफियाओं के खिलाफ भी नहीं लिख सकते। मैंने एक स्‍थानीय पत्र के सम्‍पादक से पूछा फिर आप क्‍या लिखते हैं, वे बोले हम अन्‍तरराष्ट्रीय समस्‍याओं पर राष्ट्रीय नीतियों पर लिखते रहते हैं। और जरुरत पडने पर कुछ पीले हो जाते हैं। वैसे पीत पत्रकारिता में भी दम है। पेडन्‍यूज, एडवेटोरियल, रिटर्न गिफट, इम्‍पेक्‍ट फीचर आदि से भी पेट भर जाता है। एक ही स्‍थान पर कई मास्‍ट हेड से अखबार छप जाते हैं। विज्ञापनों के सहारे ये सब चलता रहता है। ये छोटे कस्‍बों के बड़े अखबार कभी कभी बड़े आतंक कायम कर देते हैं और ये आंतकी खबरे कस्‍बों-गांवो और आस पास के क्षेत्रों में बम बारी करती रहती हैं। अ…

शशांक मिश्र भारती की कविता - अवरोध

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अवरोध शशांक मिश्र भारतीमैं- निरन्‍तर परिस्‍थितियों से लड़कर भी खड़ा हूं अपनी- मंजिल की तलाश में, सोचता हूं तोड़ दूं अपने- पथ के सभी अवरोध किन्‍तु- समक्ष आ जाता है शब्‍दों का अभाव जो- बन जाता है मेरे मन की व्‍यथा लेकिन- फिर भी प्रयत्‍नशील हूं मैं अपने पथ पर और- प्रयत्‍न करता रहूंगा सफलता प्राप्‍त होने तक, वह- मेरे लिए एक नया सुखद प्रभात होगा जब छंट जायेगी मेरे पथ की सभी अवरोधी चट्‌टानें रोक रखा है जिन्‍होंने- मेरे मानसिक उत्‍कर्ष को। ‘‘उपरोक्‍त कविता मेरी अपनी स्‍वरचित,मौलिकव रश्‍मिरथी द्वैमासिक जुलाई-अगस्‍त 1993 पृ..27प्रकाशित है।'' सम्‍पर्कः-हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर-242401 0प्र0 9410985048ईमेल:-shashank.misra73@rediffmail.com

सरिता गर्ग की लघुकथा - सुबह का भूला

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दोनों बस की सीट पर एकदम खामोश बैठे हुए थे। रमेश खुश था बहुत खुश। ऑटो मैं बैठकर चौपाटी जाकर आये थे वे लोग। भेलपुरी खायी थी बांहों मैं बाहें डालकर घुमे थे,और रेत का घरोंदा बनाया था। काफी था रमेश के लिए इतना। पर क्या उमा खुश थी ?बार बार उसकी नज़र उस बड़ी सी गाड़ी मैं बैठे जोड़े पर चली जाती थी,दोनों के हाथ मैं बड़ी बड़ी आइसक्रीम थी, शायद दोनों बाहर खाने का प्लान बना रहे थे। बाहर डिनर लेकर कितने संतुष्ट  होकर घर जायेंगे ये लोग। घर जाकर एसी खोलकर सो जायेंगे। पर यंहा ऐसी किस्मत कंहा?घर जाते ही रमेश चावल दाल बनाने की फरमाइश करेगा , फिर सारे बर्तन साफ़ करने होंगे,तब कंही जाकर कमर सीधी होगी वो भी मछरों से लड़ते हुए। मन ही नहीं करता थाउसे कंही बाहर जाने का,बस की लाइन मैं खड़े रहो फिर ऑटो ऑटो पुकारो पैसे देखकर खाना खाओ मीटर देखते हुए सारा ऑटो सांस रोके बैठे रहो। भीड़ का एक हिस्सा बनकर। रमेश उस दिन जुलूस देखने का प्रोग्राम बना रहा था, उमा चाह रही थी वे किसी कॉफी शॉप जाए,और कॉफी पिए पर रमेश चाह रहा था की जुलूस देखने चले,कितने middle क्लास शौक थे रमेश के। बोर हो गयी थी उमा रमेश के साथ । अभिजात्य वर्ग की…

विनायक पाण्डेय की कविता - मैं चला

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मैं चलायूँ ही होता रहा दर से बदर मैंहर बार एक नया ठिकाना मिल गयागम तो बहुत दिए जिन्दगी ने लेकिनहमेशा हंसने का कोई बहाना मिल गया
सितम ढाने वालों से कह दोउनका सितम बड़ा हसीन थापर अफ़सोस कि जिन्दा हैं अभीक्योंकि जिन्दगी पे यकीन था
सैलाब बहा ले जाये किनारा परकिनारा खत्म होता नहींबसते है गुलशन उजड़ केपतझड़ सदा रहता नहीं
है मुकम्मल सारी दुनियादिल जो अपने साथ हैबंद कर आँखें और देखख्वाहिशों की रात है
दिल के कोने मेंउम्मीदों की लौ जलाखुद गिरा और खुद ही संभलाऔर आज मैं फिर चला --तेरे अक्स
बीते हुए लम्हों की
गुजरी परछाईयों में
आँखों से मेरी झांको
दिल की गहराईयों में
अक्स हैं तेरे तेरे
नक्श हैं तेरे तेरे

उजली सी सुबह जैसा
रोशन वो चेहरा तेरा
भूलूं मैं कैसे भूलूं
रूह पे छाये जो मेरे
अक्स हैं तेरे तेरे
नक्श हैं तेरे तेरे

यादों की तन्हाईओं में
पल पल दिल डूबता जाये
ख्वाबों के आसमां पे
बादल बनके जो बिखरे
अक्स हैं तेरे तेरे
नक्श हैं तेरे तेरे

अक्स हैं तेरे तेरे
नक्श हैं तेरे तेरे

अनुराग तिवारी की रचना - आओ मिल बैठ कर कुछ जि़न्‍दगी की बात करें। क्‍यूँ न हम आज इक नयी शुरुआत करें।

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आओ मिल बैठ कर कुछ जि़न्‍दगी की बात करें। क्‍यूँ न हम आज इक नयी शुरुआत करें। लड़ रहे हैं मुद्‌दत से मगर हुआ न कुछ हासिल, भुला कर गिले शिकवों को, दोस्‍ती की बात करें। सफ़र में तुम भी हो साहब, सफ़र में हम भी हैं, हँसी खुशी ये गुज़र जाए, वो करामात करें। सियाह रात है पसरी, नज़र न कुछ आता, दिया जलाओ तो पहले, फिर सहर की बात करें। हम यहाँ उलझे हैं उन चीजों में, जो अपनी ना हैं, आओ पहचान करें खुद से, खुद की बात करें। -- -सी. एअनुराग तिवारी5-बी, कस्‍तूरबा नगर,सिगरा, वाराणसी- 221010

एक शख्सियत….... प्रो. वसीम बरेलवी : विजेंद्र शर्मा का आलेख

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प्रो.वसीमबरेलवीउसूलों पर जहां आँच आये ,  टकराना ज़रूरी हैजो ज़िन्दा हो, तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी हैएकशख्सियत…....प्रो.वसीमबरेलवीआज के दौर में चाहें कोई भी क्षेत्र हो इंसानी फ़ितरत ऐसी हो गई है कि वो उरूज (तरक्की/उन्नति  ) पाने के लिए छोटे से छोटा रास्ता अख्तियार करना चाहती है न कि वो सही और तवील (लम्बा)  रस्ता जिस पे बा-क़ायदा उसे अपनी मेहनत और लगन से सफ़र करना चाहिए। हमारी नई पीढ़ी इस बीमारी से अछूती नहीं है । शाइरी के इलाके में भी ये संक्रमण बड़ी रफ़्तार से फैलता जा रहा है। शे'र कहने कि सलाहियत एक दिन में नहीं आती , शाइरी का ताल्लुक तो मिज़ाज से है। नए - नए प्रयोग ,चौंकाने वाला रवैया चका- चौंध तो एक बार पैदा कर देता है पर उसकी उम्र बहुत छोटी होती है। वक़्त के साथ -साथ शाइरी ने अपना मिज़ाज और अपना रंग बदला है और इसी राह पे आज की ग़ज़ल ने भी अपने तेवर बदल लिए है मगर एक शख्सीयत है जिसने अपने तक़रीबन पचास साला अदबी सफ़र में रवायत का दामन कभी नहीं छोड़ा और हिन्दुस्तानी शाइरी की सदियों की तहज़ीब की दस्तार का वक़ार जिसने कभी कम नहीं होने दिया है। उस अज़ीम शख्सीयत का नाम है प्रो.वसीम बरेलवी।…

एक शख्सियत….....डॉ.तारिक़ क़मर : विजेंद्र शर्मा का आलेख

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डॉ. तारिक़ क़मर सच बोलें तो घर में पत्थर आते हैं झूठ कहें तो ख़ुद पत्थर हो जाते हैं एकशख्सियत….....डॉ.तारिक़ क़मर शाइरी में सबसे मक़बूल कोई विधा है, तो वो है ,ग़ज़ल और इन दिनों ग़ज़ल कहने वालों की तादाद भी बढ़ती जा रही है। नई नस्ल के शाइरों में बहुत ज़ियादा कहने का माद्दा तो है पर वो कहन में है या नहीं ,शे'र में शेरियत है या नहीं इसकी उन्हें ज़रा परवाह कम है। ग़ज़ल के बुनियादी मालूमात जैसे रदीफ़ ,काफ़िया ,बहर आदी को भी दर किनार करके कुछ नए लोग बस लफ़्ज़ों को फ़िज़ूल में ख़र्च करने पे तुले हैं। ऐसे माहौल में एक मतला सुनने को मिला :------- सचबोलेंतो घरमेंपत्थर आते हैंझूठकहेंतोख़ुद पत्थरहोजाते हैंये शानदार मिसरे सुनते ही लगा कि शाइरी के अखाड़े के किसी मंझे हुए शाइर का क़लाम है और फिर जानकर बड़ी ख़ुशी हुई कि ये मतला सत्तर के दशक में पैदा हुए युवा शाइर तारिक़ क़मर का है। तारिक़ क़मर को पढने के बाद लगा कि नई नस्ल से अगर ग़ज़ल को कोई उम्मीद है तो वो तारिक़ क़मर जैसे सुख़नवरों की वज़ह से ही है। डॉ. तारिक़ क़मर का जन्म जिगर मुरादाबादी के इलाके के क़स्बे सम्भल में मरहूम अक़ील अहमद साहब के यहाँ…

एक शख्सियत…....ताहिर फ़राज़ : विजेंद्र शर्मा का आलेख

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ताहिर फ़राज़ मैंने तो एक लाश की, दी थी ख़बर "फ़राज़" उलटा मुझी पे क़त्ल का इल्ज़ाम आ गया एकशख्सियत…....ताहिरफ़राज़ग़ज़ल के तीन सो साला माज़ी पे नज़र डालें तो ये बात शीशे की तरह साफ़ है कि ग़ज़ल के चहरे पे ताज़गी हमेशा नज़र आती है चाहे वो सालों पुरानी हो या आज की। किसी ख़बर और शाइरी में सबसे बड़ा यही बुनियादी फ़र्क है कि ख़बर चंद लम्हात तक ताज़ा रहती है फिर बांसी हो जाती है। रफ़्ता- रफ़्ता उसकी साँसे उखड़ने लगती है , एक - दो रोज़ बाद अख़बार की रद्दी के साथ दफ़न हो जाती है मगर शाइरी सदियों का सफ़र दो मिसरों में तय करती है और सालों बाद भी ज़िन्दा रहती है, ताज़ा रहती है। इसकी अहम् वजह ये है कि एक तो ग़ज़ल ख़ुद भी बहुत ख़ूबसूरत है दूसरा हमारे अहद के कुछ सुख़नवर इसकी तामीर ये सोच कर करते जैसे कोई ताजमहल बना रहें हो। हिन्दुस्तान में ग़ज़ल अगर दिल्ली में फ़क़ीरों की ख़ानकाहों में पैदा हुई तो उसने यौवन की दहलीज़ पे क़दम लखनऊ में रखा जहाँ तहज़ीब के ख़ानदान में उसकी परवरीश हुई। जब कभी ग़ज़ल दिल्ली से मायूस हो जाती और जब - जब लखनऊ का तकल्लुफ़ उसे अखरने लगता तो वो दोनों तारीख़ी शहरों के दरम्यान बसे रा…

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