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April 2012
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जो मई दिवस दुनिया के मजदूरों के एक हो जाने के पर्याय से जुड़ा था, भूमण्‍डलीकरण और आर्थिक उदारवादी नीतियों के लागू होने के बाद वह किसान और मजदूर के शोषण और विस्‍थापन से जुड़ता चला गया। मई दिवस का मुख्‍य उद्‌देश्‍य मजदूरों का सामंती और पूंजी के शिकंजे से बाहर आने के साथ उद्योगों में बराबर की भागीदारी भी थी। जिससे किसान-मजदूरों को राज्‍यसत्ता और पूंजी के षड्‌यंत्रकारी कुचक्रों से छुटकारा मिल सके। लेकिन भारत तो क्‍या वैश्‍विक परिप्रेक्ष्‍य में भी ऐसा संभव हुआ नहीं। भारतीय परिदृश्‍य में यही कारण है कि करीब पौने दो सौ जिलों में आदिवासी व खेतिहर समाज में सक्रिय नक्‍सलवाद भारतीय राष्‍ट्र-राज्‍य के लिए चुनौती बना हुआ है। ओड़ीसा में एक भाजपा विधायक और छत्तीसगढ़ से कलेक्‍टर का अपहरण करके नक्‍सलवादियों ने संविधान के दो स्‍तंभ विधायिका और कार्यपालिका को सीधी चुनौती पेश की है। दरअसल कथित औद्योगिक विकास के बहाने वंचित तबकों के विस्‍थापन का जो सिलसिला तेज हुआ है, उसके तहत आमजन आर्थिक बद्‌हाली का शिकार तो हुआ ही, उसे अपनी सामाजिक और सांस्‍कृतिक पहचान बनाए रखने के भी संकट से जुझना पड़ा है। मसलन एक ओर तो उसकी अस्‍मिता कुंद हुई जा रही है, वहीं दूसरी ओर वैश्‍विक नीतियों ने उसकी आत्‍मनिर्भरता को भी परावलंबी बनाकर मई दिवस की सार्थकता को वर्तमान परिदृश्‍य में दरकिनार ही किया है।

फिरंगी हुकूमत के पहले भारत में यूरोप जैसा एकाधिकारवादी सामंतवाद नहीं था और न ही भूमि व्‍यक्‍तिगत संपत्ति थी। भूमि व्‍यक्‍तिगत संपत्ति नहीं थी इसलिए उसे बेचा अथवा खरीदा भी नहीं जा सकता था। किसान भू-राजस्‍व चुकाने का सिलसिला जारी रखते हुए भूमि पर खेती-किसानी कर सकता था। यदि किसान खेती नहीं करना चाहता है तो गांव में ही लागू गणतंत्र के आधार पर सामुदायिक स्‍तर पर भूमि का आवंटन कर लिया जाता था। इसे मार्क्‍स ने एशियाई उत्‍पादन प्रणाली नाम देते हुए किसानी की दृष्‍टि से श्रेष्‍ठ प्रणाली माना था। किंतु अंग्रेजों के भारत पर वर्चस्‍व के बाद भू-राजस्‍व व्‍यवस्‍था में दखल की जो शुरूआत हुई उसने भूमि के साथ निजी स्‍वामित्‍व के अधिकार जोड़ दिए। भूमि के निजी स्‍वामित्‍व के इस कानून से किसान भूमि से वंचित होने लगा। इसके बाद किसान की हालत लगातार बद्‌तर होती चली गई।

पूंजीवाद के देश में विकास के साथ-साथ मजदूरों का शोषण बढ़ा। उनसे 12 से 14 घंटे तक काम लिया जाता था यही स्‍थिति यूरोप के देशों बहुत पहले से जारी थी। लिहाजा वहां काम के घंटे 8 करा देने की मांगे के साथ मई दिवस का संघर्ष परवान चढ़ा बाद में यह मजदूर वर्ग के जीवन का हिस्‍सा बन गया। करीब 10 हजार साल पहले खेती के हुए विकास क्रम के साथ ही दास, अर्धदास, गुलाम, दस्‍तकार और दूसरे महनत कसों को अपने खून-पसीने की कमाई सौंपने के लिए मजबूर होना पड़ता था। श्रमिक इसी शोषण से मुक्‍ति के लिए एक हुए इस आंदोलन की शुरूआत अमेरिका में हुई। फिलाडेल्‍फिया के बढईयों ने 1791 में 10 घंटे काम के बदले 8 घंटे काम की मांग रखी। 1830 आते-आते यह आंदोलन दुनिया के मजदूरों का प्रमुख आंदोलन बन गया। आज भी यह धन्‍ना सेठों को डराता है। यही बजह रही कि इसे वैश्‍विक ग्राम के चेहरे में परिवर्तित करके कमोबेश खत्‍म कर दिया गया।

भारत में आजादी के बाद सही मायनों में खेती, किसान और मजदूर को बाजिव हकों का इंदिरा गांधी ने अनुभव किया। नतीजतन हरित क्रांति की शुरुआत हुई और कृषि के क्षेत्र में रोजगार बढ़े। 1969 में इंदिरा गांधी द्वारा निजी बैंकों और बीमा कंपनियों का राष्‍ट्रीयकरण कर दिया गया। इस व्‍यवस्‍था से किसानों को खेती व उपकरणों के लिए कर्ज मिलने का सिलसिला शुरु हुआ। शिक्षित बेरोजगारों को भी अपना लघु उद्योग लगाने के लिए सब्‍सिडी के आधार पर ऋण दिए जाने की मुकम्‍मल शुरुआत हुई। आठवें दशक के अंत तक रोजगार और किसानी के संकट हल होते धरातल पर नजर आए। लिहाजा ग्रामीणों में न असंतोष देखने को मिला और न ही शहरों की ओर पलायन हुआ।

इंदिरा गांधी के बाद ग्राम व खेती-किसानी को मजबूत किए जाने वाले कार्यक्रमों को और आगे बढ़ाने की जरुरत थी ? लेकिन उनकी हत्‍या के बाद उपजे राजनीतिक संकट के बीच राजीव गांधी ने कमान संभाली। उनका विकास का दायरा संचार क्रांति की उड़ान में सिमटकर रह गया। बाद में पीवी नरसिंह राव सरकार के वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने आर्थिक सुधारों के बहाने अमेरिकी नीतियों से उपजे नव उदारवादं को लागू करके किसान व मजदूर हितों को पलीता ही नहीं लगाया औद्योगिक और प्रौद्योगिक विकास के बहाने किसान, मजदूर और आदिवासियों को विस्‍थापन के लिए विवश कर दिया। जिसके चलते भूमिहीनता बढ़ी और सीमांत किसान ऐसा शहरी मजदूर बनकर रह गया कि आज उसके पास अपनी आवाज बुलंद करने के लिए किसी मजबूत संगठन की छत्रछाया ही नहीं बची है।

भू-मण्‍डलीकरण के हितों को भारतीय धरती पर साध्‍य बनाने के लिए डब्‍ल्‍यू.टी.ओ. पर हस्‍ताक्षर करने के साथ ही हमने किसान और मजदूर के हित गिरवी रख दिए। नतीजतन कृषि और किसान तो बदहाल हुए ही अंधाधंधु जीएम यानी संशोधित बीजों, रासायनिक खादों और कीटनाश्‍कों का इस्‍तेमाल कर जमीन की उर्वरा शक्‍ति भी हमने खो दी। आनुवंशिक फसलों को तो मनुष्‍य के लिए स्‍वास्‍थ्‍य की दुष्‍टि से भी हानिकारक माना जा रहा है, बावजूद हम विश्‍व व्‍यापार संगठन के करार से बंधे होने के कारण हानिकारक वस्‍तुओं के इस्‍तेमाल पर अंकुश लगाने में लाचार दिखाई दे रहे हैं।

एक तरफ हम किसान-मजदूर को बड़े बांध, उद्योग, सेज, मॉल और एक्‍सप्रेस हाई-वे के लिए खेती योग्‍य भूमि से बेदखल करने में लगे हैं, वहीं दूसरी तरफ नगदी, फसलों की शर्त पर बायोडीजल के लिए रतनजोत, ज्‍यादा पैदावार के लिए बीटी कपास आदि ऐसे पौधे लगाए जाने के लिए प्रोत्‍साहित करने में लगे हैं, जिन्‍हें बनाए रखने के लिए ज्‍यादा सिंचाई की जरुरत तो पड़ती ही है, साथ ही वे जमीन की आर्दता और उर्वरा शक्‍ति का भी खात्‍मा कर देते हैं। बहुराष्‍ट्रीय कंपनियां खुदरा व्‍यापार में दखल देने के साथ कार्पोरेट फार्मिंग पर भी गिद्ध दृष्‍टि लगाए हैं। कुछ अर्थशास्‍त्री और सरकारी नीतियों के निर्माता कृषि का आधुनिकीकरण किए जाने के बहाने सरकार पर दबाव बना रही हैं कि बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों को पूंजी निवेश के लिए तैयार किया जाए। इस मश्‍विरे को उदारीकरण के परिप्रेक्ष्‍य में देखने वाली कई राज्‍य सरकारों ने तो अनुबंध खेती की नीति के आधार पर बिन्‍दु ही तलाशना शुरु कर दिए हैं। लेकिन भला हो आर्थिक उदारीकरण के सूत्रधार मनमोहन सिंह का कि उन्‍होंने खेती और किसान की दशा सुधारे जाने की दृष्‍टि से इस निवेश को उचित नहीं ठहराया है। यह सही भी है कि अनुबंध खेती से न किसान के हित साधने वाले है और न ही खाद्याान्‍न सुरक्षा सुनिश्‍चित की जा सकती है। पंजाब और उड़ीसा में अनुबंध खेती का प्रयोग किया भी गया लेकिन नतीजे संतोषजनक नहीं आए। दरअसल पूंजीनिवेश करने वाली संस्‍था फसल की ज्‍यादा उत्‍पादकता लेने के लिए एक ओर तो हर नई तकनीक का उपयोग करती है, दूसरी ओर खेत के रकबे में गहरे नलकूपों का खनन कर जल का भरपूर दोहन भी कर लेती है। जब खेत की उर्वरा क्षमता और भू-जल समाप्‍त हो जाते हैं तो अनुबंध तोड़ने में कंपनी को कोई देर नहीं लगती। तय है इस कारनामे की महत्ता में किसान और खेत की चिंता तभी तक है जब तक दोहन की प्राकृतिक उपलब्‍धता सुनिश्‍चित रहे। लेकिन कॉर्पोरेट फार्मिंग के विरुद्ध जब तक कोई नीतिगत फैसला लेने की इच्‍छाशक्‍ति मनमोहन सिंह नहीं जता पाते तब तक किसान और खेती के प्रति चिंता के कोई अर्थ नहीं रह जाते।

भूमण्‍डलीकरण प्रथा के लागू होने के बाद बदहाल हुई खेती और किसान की आम बजट में पहली बार सुध ली गई, साठ हजार करोड़ की कर्जमाफी करके। देश में ऋणग्रस्‍त परिवारों की कुल संख्‍या कृषक परिवारों के कुल संख्‍या के 48 प्रतिशत है। इससे जाहिर है कि ऋणमाफी के ये प्रावधान किसानों के लिए हितकारी हैं। जबकि रिजर्व बैंक की माने तो औद्योगिक घराने राष्‍ट्रीयकृत बैंकों को अब तक दस लाख करोड़ से भी ज्‍यादा का चूना लगा चुके हैं और हमारी सरकारें इन कर्जों को नॉन पर्फामिंग एसेट मद में डालकर इन घरानों को ऋणमुक्‍ति का प्रमाण-पत्र देती चली आ रही हैं। ऋणग्रस्‍त के अभिशाप के चलते लाखों किसानों ने तो आत्‍महत्‍या की लेकिन किसी उद्योगपति ने ऋण अभिशाप से मुक्‍ति के लिए आत्‍महत्‍या की हो ऐसी जानकारी अभी तक नहीं है ?

यदि किसान और मजदूर की आत्‍मनिर्भरता को बढ़ाना है तो उसके आर्थिक सशक्‍तीकरण का ख्‍याल रखना होगा और किसान को आर्थिक रुप से सशक्‍त बनाने के लिए भू-मण्‍डलीकरण के मार्फत अमल में लाई गई नीतियों से मुक्‍ति पानी होगी। मजदूर दिवस की सार्थकता कमजोर क्रय शक्‍ति वाले किसान और मजदूर के आर्थिक सशक्‍तिकरण में थी, किंतु आधुनिक विकास के बहाने चार करोड़ से भी ज्‍यादा लोगों का विस्‍थापन हो चुकने के बावजूद मजदूर आंदोलनों की सार्थकता कहीं देखने में नहीं आ रही है। इससे लगता है मई दिवस को मनाया जाना रस्‍म-अदायगी भर रह गया है।

प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी म.प्र.

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लेखक प्रिंट और इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।

आज कल हर कोई मध्‍यावधि चुनावों का बाजा बजा रहा है। हर हारा हुआ दल या नेता मध्‍यावधि चुनावों का बाजा आम चुनाव के तुरन्‍त बाद बजाने लग जाता है। चुनाव कब होंगे कोई नहीं जानता मगर हर दल मध्‍यावधि चुनावो का राग अलापता रहता है। चुनावों के लिए कमर कस कर तैयार नेता हार जीत की परवाह नहीं करता वो तो बस ये जानता है कि हो सकता है अगले आम चुनाव में उसकी लाटरी लग जाये। उत्‍तर प्रदेश में जीतते ही मुलायम सिंह ने दिल्‍ली में धावा बोलने के लिए मध्‍यावधि चुनावों के तबले पर थाप दी। ममता ने बंगाल से ही सुर मिलाया और दिल्‍ली में मध्‍यवधि चुनावी बाजा अपने सुर में बजने लगा। सत्‍ताधारी पक्ष जानता है कि इस बेसुरी सारंगी से संगीत नहीं बन सकता है ये तो बस शोर-गुल है, मगर सरकार के गठबंधन वाले दल इस मामले को हवा में देने में क्‍यों पीछे रहे। सरकारी सुविधाओं वाले सभी जानते है कि यदि चुनाव हुए तो लुटिया डूबते देर नहीं लगती।

अपनी डूबती नैय्‌या को बचाने के लिए इस बेसुरे आलाप को प्रलाप घोपित करना अनिवार्य है सो सरकारी भोंपू हर मंच पर इस मध्‍यावधि बाजे से ज्‍यादा तेज आवाज में चिल्‍ला चिल्‍ला कर इस दावे की हवा निकालने में लगे रहते हैं। सब जानते है यदि चुनाव हुए तो कई महावीर इस चुनावी महा भारत में खेत रहेंगे। कई नये महावीर आयेंगे और चुनावी अर्थ शास्‍त्र के मुताबिक अगले चुनाव के बाद मंहगाई इतनी बढ़ जायेगी कि कोई दल शायद चुनावों का नाम ही नहीं ले। एक-एक सीट पर दस से बीस करोड़ का खर्चा है श्रीमान। और जीतने की संभावना फिफ्‌टी फिफ्‌टी। याने कम से कम आधे उम्‍मीदवार तो दस-बीस करोड़ के नीचे आ जायेंगे। ऐसी स्‍थिति में मध्‍यावधि चुनावों का बाजा बजाने का मतलब लेकिन, राज नेताओं को कौन समझाये।

सत्‍ता के शीर्ष पर बैठे लोग अक्‍सर बता देते हैं कि मेरी कुर्सी पक्‍की है। मैं रिटायर होने वाला नहीं हँ देश हर छः महीने में चुनाव नहीं चाहता। कभी कभी जोश में वे यह भी कह देते है- मेरी सरकार बहुमत में है, अच्‍छा काम कर रही है। मध्‍यावधि चुनावों का सवाल ही नहीं उठता। जनता कृपया अफवाहों पर ध्‍यान नहीं दे। वैसे चलती सरकार को लत्‍ती मारने का आसान रास्‍ता है मध्‍यावधि चुनाव।

मध्‍यावधि बाजा राज्‍यों में भी बजता रहता है। जहाँ भी अल्‍पमत सरकार है वे बहुमत की आशा में मध्‍यावधि बाजा बजाते रहते है, मगर सब जानते है कि कोई नहीं जानता चुनाव का उॅट किस करवट बैठ जाये, क्‍यों रिस्‍क ले। कहीं आधि छोड़ पूरी को धावे और आधि भी हाथ से जावे।

वैसे होना तो ये चाहिये कि पूरे देश में एक साथ चुनाव हो जाये और कम से कम पांच वर्पो के लिए शान्‍ति से देश आगे बढ सके। लेकिन देश की परवाह किसे है सब अपनी अपनी ढपली और अपना अपना राग बजा रहे हैं। चुनाव हो या नहीं हो बाजे, ढोलक, सारंगी, हारमोनियम, तबले, ढपली और नवकारखाने में तूती बजती रहनी चाहिये। रंगले का चुनावी बाजा बजता रहे। क्‍योंकि सरकार की धोती खोलने का सबसे आसान रास्‍ता है मध्‍यावधि चुनाव का बाजा और ढपली।

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यशवन्‍त कोठारी, 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर - 2, फोन - 2670596

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लघुकथा

नींव

जब खेत से मक्का और ज्वार की फसल की कटाई हो गई तो रघु ने शहर की राह ली, यह सोचकर कि खेत तो खाली हैं, शहर में चलकर मज़दूरी करके कुछ रुपये ही कमा लिए जाएँ । शाम को ही वह गाँव से शहर की ओर चल दिया ताकि सुबह से ही वह काम पर लग जाए । हर साल की तरह रात उसने प्लेटफ़ार्म पर ही कट ली सुबह ही वह शहर में बाज़ार के उस चौक पर पहुँच गया, जहाँ से मज़दूरों को मज़दूरी के लिए सौदा करके ले जाया जाता है ।

रघु को एक ठेकेदार नए मकान की नींव खोदने के लिए ले गया । उसके साथ और भी मज़दूर गए, रघु ने देखा कि एक साँवली सी लड़की भी है । जगह पर पहुँचकर नींव खोदने का काम प्रारम्भ हुआ, धीरे-धीरे सभी मज़दूरों में पहचान बनती गयी । शाम होते-होते तो सभी घुल–मिल गए । दिनभर में रघु की उस साँवली सी लड़की से कई बार आँखें दो-चार हुईं, रघु को उसकी दिल्लगी की मौन स्वीकृति का एहसास हो गया था ।

अगले दिन सुबह फिर सभी मज़दूर नींव खोदने उसी जगह पर एकत्रित हुए । रघु की आँखों में आज नई चमक थी और शरीर में इतना जोश कि लगता था कि वह आज नींव खोदते-खोदते धरती में आर-पार छेद बना देगा । सुबह से ही वह लोकगीत गाते हुए गर्मजोशी से काम करता जा रहा था और उस साँवली सी लड़की से कई बार आँखें दो-चार करता रहा । साँवली सी लड़की भी उसे अपनी सहमति देती रही, इसी सहमति से रघु ने उसके हाथों को तगारी देते हुए छुआ भी था और साँवली सी लड़की ने कई बार शरमा भी दिया था । शाम होते तो एकांत देखकर रघु ने उसका हाथ भी पकड़ लिया, साँवली सी लड़की कुछ न बोली थी ।

अगले दिन दोनों में कुछ और नज़दीकियाँ तथा छेड़खानियाँ बढ़ गईं और जोश भी । जब शाम हुई और मज़दूर अपने काम से छूटे तो साँवली सी लड़की अपने परिवार के साथ चल दी । रघु भी अपने ठिकाने चल दिया । अगले दिन सुबह रघु उसी जोश और ऊर्जा से कार्य करने लगा, लेकिन उस साँवली सी लड़की ने आज उसके प्रति उदासीनता दिखाई । कई बार रघु ने उसे छेड़ा भी, उसने कोई प्रत्युत्तर न दिया, हाथ भी पकड़ा तो उसने झटक दिया । रघु बुझे दिल से काम कने लगा उसे दिन अब बहुत भारी पड़ने लगा । वह कारण खोजने लगा आखिर क्यूँ वह ऐसा कर रही है ? शाम हुई मज़दूरों ने अपनी राह ली तो रघु साँवली सी लड़की को ही जाते देख रहा था, साँवली सी लड़की ने भी जाते-जाते रघु को देखा । रघु नाह-धोकर साँवली सी लड़की के ठिकाने की ओर गया तो उसने देखा, वह साँवली सी लड़की ठेकेदार से हँस-हँस कर बात कर रही है । रघु से बर्दाश्त न हुआ, वह वहाँ से चलने लगा तो रास्ते में बोर्ड लगा था ‘देसी दारू की दुकान’ वह वहीं रुक गया ।

लघुकथा

आज चौथा दिन है !

कई वर्षों की कठोर तपस्या करने के बाद छोटे से कस्बे का एक सामान्य सा विद्यार्थी दिनेश तिवारी का डिप्टी कलेक्टर का स्वप्न पूरा हुआ । जब जॉइनिंग के तीन दिन पूरे हुए और सारी प्रक्रिया पूरी हुई तो अपनी उत्सुकता पूर्ण करने के लिए अपनी सबसे प्रिय अध्यापिका को उसने हर बार की तरह एस.एम.एस. किया कि “मैं अब डिप्टी कलेक्टर बन गया हूँ, आज चार दिन हो गए हैं - आपका दिनेश ।” दिनेश ने सोचा था कि मैडम खुशी के मारे से तुरंत कॉल करेंगीं, परंतु बहुत देर प्रतीक्षा करने के बाद भी मैडम का कोई फोन नहीं आया तो स्वयं दिनेश ने फोन लगाया “हेलो, मैडम”, “हाँ दिनेश मैं कविता बोल रही हूँ ।” “दीदी नमस्ते ! आप कब आईं ।”, “अभी दो-तीन दिन पहले, और तुम कैसे हो ?” “जी अच्छा हूँ । मैडम को एक ख़ुशख़बरी देना है, मैडम को फोन दीजिये न ।” “दिनेश मैडम तो अब नहीं रहीं उनका देहांत अभी तीन दिन पहले हो गया । आज चौथा दिन है । मुझे याद ही नहीं आया कि मैं तुम्हें बताऊँ, यह सबकुछ अचानक ही हो गया ।”

डॉ. मोहसिन ख़ान

(वरिष्ठ प्राध्यापक-हिन्दी)

जे. एस. एम. महाविद्यालय,

अलीबाग – जिला-रायगड़

(महाराष्ट्र) पिन – 402201

मोबाइल – 09860657970

शब्द ही सबकुछ है

हिमकर श्याम

शब्द क्या नहीं है? शब्द ही ब्रह्मा है, शब्द ही विष्णु है, शब्द ही शिव है, शब्द ही साक्षात् बह्म है, शब्द के इसी निराकार रूप को सादर नमन्। यह कहावत अब पुरानी पड़ गयी है कि हर सफल व्यक्ति की सफलता के पीछे कोई औरत होती है। आज हर सफल व्यक्ति के पीछे शब्द होता है। यानि, मनुष्य की सफलता का राज शब्द में निहित है।

शब्द के बिना भाषा की और भाषा के बिना मनुष्य की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। शब्द पर रीझनेवाले लोग पुराने दौर में ही नहीं आज भी अपना योगदान दे रहे हैं। शब्द की महिमा अपरम्पार है। शब्दों में चिकनापन, भारीपन, मीठापन, कड़वापन, लचीलापन जैसे गुण पाये जाते हैं। समय के साथ इसके गुण-धर्म में परिवर्तन होते रहते हैं। भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में शब्द विभिन्न रूप धारण करते हैं। आज शब्दों की भीड़ में कोई शब्द दुखी नजर आता है तो कोई सुखी। शब्दों के इसी भीड़ में से कोई शब्द एक दूसरे को धकियाता, लतियाता आगे बढ़ जाता है और बेचारा कमजोर शब्द अपने अस्तित्व के लंगड़ेपन को कोसता हुआ अपनी बारी की प्रतीक्षा करता रह जाता है।

जो शब्द के धनी होते हैं वे जेब से भी धनी होंगे इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। शब्दों के सहारे बड़े-बड़े काम आसानी से हो जाया करते हैं। इतना ही नहीं आज हमारे नेताओं को जब कुछ नहीं सूझता तो वे शब्द के सहारे देश का विकास करते हैं। वैसे भी लोकतंत्र शब्द तंत्र पर ही टिका हुआ है अर्थात् लोकतंत्र की नींव में शब्द ही है। शब्दों के मायाजाल में फंसाकर हमारे नेतागण वोट पाकर थोक के भाव में विधायक और सांसद बनते हैं फिर उन्हें खरीदकर बहुमत की साबित की जाती है। शब्द सरकारें बनाती भी हैं और गिराती भी हैं। सरकार बदल जाती है, मगर शब्द वहीं रहते हैं।

शब्दों की बढ़ती हुई मांग से प्रभावित होकर हमारे मुहल्ले में एक होनहार ने शब्दों का एक स्टॉल खोल रखा है। यहां हर वर्ग के दैनिक उपयोग के शब्द आसानी से प्राप्त किये जा सकते हैं। इस स्टॉल पर अक्सर भीड़ रहा करती है। पास ही एक लड़का चिल्लाता हुआ मिल जाता है- ''आइए मेहरबान, कद्रदान यह शब्दों की दुकान है। यह आपकी अपनी दुकान है। यहां हर प्रकार के शब्द सस्ते और उचित मूल्य पर प्राप्त किए जा सकते हैं।'' ''शब्दों की आवश्कता हर किसी को पड़ सकती है चाहे वह बुद्धिजीवी हो, बाबा हो, लीडर हो या पुलिस महकमे का कोई आदमी या फिर हमारे पथ-प्रदर्शक तो आइए एक बार हमें अवश्य आजमाइये। आपकी संतुष्टि ही हमारी खुशी है।'' यहां लीडरों के लिए नए-नए आश्वासनों, वायदों का अच्छा खासा स्टॉक है (इन्हीं आश्वासनों के बल पर ही तो वे अपनी कुर्सी पर टिके रहते हैं।) बुद्धिजीवियों में शब्दों का इधर अकाल पड़ गया है (भ्रष्टाचार शब्द के अलावा इन्हें दूसरा कोई शब्द सूझता ही नहीं है) इस शब्द रूपी अकाल को दूर करने के लिए भी इस स्टॉल में खासी मेहनत की गई है। राहत साम्रगी अर्थात् नए-नए शब्द बाहरी मुल्क से मंगाए गए है जिन पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है। पुलिस महकमे पर यह स्टॉल कुछ ज्यादा ही मेहरबान है। यह तो सर्वविदित है कि इस महकमे के लिए सबसे जरूरी शब्द यदि कुछ है तो वह है गाली और यहां एक गाली के साथ दस गाली फ्री देने की योजना बनायी गयी है। योजना सीमित समय के लिए है। हमारे यहां ऐसी-ऐसी गालियां है, जिसे सुन कोठे की वेश्या भी शरमा जाए। गालियों से थानेदार की और थानेदार से थाने की शोभा बढ़ती है तो आइए और यहां से गालियां ले जाइए और अपने थाने की शोभा बढ़ाइये।

किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि शब्दों का स्टॉल भला चल सकता है मगर यह चल ही नहीं रहा बल्कि दौड़ पड़ा है। कल तक जो मुहल्ले वाले के बीच नाकाबिल, निकम्मा समझा जाता था वहीं उनके आंखों का तारा बना हुआ है। सैकड़ों की भीड़ उसके आगे-पीछे घूमती रहती है इस उम्मीद में की शायद वह उन्हें भी कुछ ऐसा शब्द दे दे जिससे उनके सितारे भी बुलंद हो जाएं। इस दुनिया में कुछ भी बिक सकता है बशर्ते कि उसे बेचने की कला हमारे पास हो। सच ही कहा गया है ''खुदा मेहरबान तो गदहा पहलवान।'' यह होनहार शब्द बेच कर आज ऐश कर रहा है।

आम आदमी और शब्द के बीच दूरी बढ़ती जा रही है। आज आम आदमी शब्दहीन हो गया है। शब्दों के तलाश में भटकता हुआ आम आदमी बड़ी उम्मीद के साथ उस स्टॉल पर पहुंचता है और कहता है- ''भाई मेरे लिए भी कोई शब्द है क्या तुम्हारे पास ? ''यह सुनकर वह खामोश हो जाता है। वह दुकान से बाहर निकल कर कहता है ''भाई यही तो एक वर्ग है जिसके शब्द मेरे पास नहीं है, इसी की तलाश में तो मैं भी हूं, तुम्हे मिल जाए तो मुझे भी खबर करना। तुम्हारे जैसे न जाने कितने भाई रोज मेरे इस स्टॉल से लौट जाते हैं। यह सुन कर उस आदमी की आंखों में पानी भर आता है। शब्द के बिना क्या जीना? आम आदमी के लिए शब्द नहीं है, खास आदमी के लिए शब्द ही शब्द हैं। इस हालत का बखान करने के लिए आपके पास शब्द है क्या?

पत्र-व्यहार का पता : हिमकर श्याम

द्वारा: एन. पी. श्रीवास्तव

5, टैगोर हिल रोड, मोराबादी,

रांची: 8, झारखंड।

ई-मेल पता : himkarshyam@gmail.com

हिन्दी का गौरवशाली अध्यायः हिन्दी-विश्व गौरव-ग्रन्थ - कृष्ण कुमार यादव
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डा0 राजेन्द्र नाथ मेहरोत्रा द्वारा संपादित हिन्दी-विश्व गौरव-ग्रन्थ (प्रथम खण्ड) से प्रथम परिचय तब हुआ, जब अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में पदस्थ रहने के दौरान पहली बार इसकी समीक्षा पढ़ी थी। तभी से मन में चाह थी कि इस ग्रंथ को मंगवाना सुनिश्चित करूंगा और इसी बहाने अपने ज्ञान में कुछ और वृद्धि कर सकूंगा। कहते हैं जहाँ चाह, वहाँ राह। अंडमान से इलाहाबाद में स्थानांतरण को एक माह भी नहीं बीते होंगे कि डा0 मेहरोत्रा का फोन आया। उन्होंने मेरे द्वारा संपादित पुस्तक, ”क्रांति यज्ञः 1857-1947 की गाथा” की प्रशंसा की और इसी क्रम में हिन्दी-विश्व गौरव ग्रंथ की भी चर्चा की। फिर क्या था, अगले तीन दिनों में यह ग्रंथ मेरे सामने था। पहली बार इसे देखकर लगा कि यह किसी प्रतिष्ठित प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है पर अगले ही पल महसूस हुआ कि यह एकला चलो की राह पर डा0 मेहरोत्रा जी के अथक प्रयास का मीठा फल है।


अतीत की श्रृंखलाओं को वर्तमान से जोड़ते एवं वर्तमान के आधार पर भविष्य की हिन्दी का सुन्दर खाका खींचता यह ग्रंथ अपने में एक समग्र शोध कार्य है। देश-विदेश के विभिन्न कोनों में निरपेक्ष भाव से हिन्दी का परचम फैला चुके एवं फैला रहे मनीषियों-विदुषियों के सुंदर चित्रों से सुसज्जित इस ग्रंथ में हिन्दी को न सिर्फ राष्ट्रीयता की भावना से जोड़ा गया है बल्कि एक साथ भगवती सरस्वती, भारत माता की आराधना के साथ-साथ राष्ट्रगीत वंदेमातरम, राष्ट्रगान एवं राष्ट्रध्वज के बारे में सारगर्भित जानकारियां समाहित कर इसे भारतीयता के प्रतीक से भी जोड़ा गया है । इस ग्रंथ में हिन्दी को सिर्फ भारत तक नहीं बल्कि विदेशों तक व्याप्त हिन्दी की वर्तमान परिदृश्य में भाषा चिंतन के नजरिये से विश्लेषित किया गया है। बकौल संपादक, ''इस ग्रंथ का प्रकाशन मेरे अनुसार केवल भाषायी उत्थान से संबंधित न होकर राष्ट्र की भाषायी एकता द्वारा राष्ट्रोत्थान का सर्वोच्य महायश है।''


इसके प्रथम अध्याय में हिन्दी भाषा चिंतन, द्वितीय अध्याय में हिन्दी की भाव-भूमि के प्रति काव्य संग्रह एवं तृतीय अध्याय में हिन्दी की विकास यात्रा शामिल है। हिन्दी एवं भाषा के संबंध में संत बिनोबा भावे, महात्मा गाँधी, रवीन्द्र नाथ ठाकुर, सुभाष चन्द्र बोस, महादेवी वर्मा, फादर डा0 कामिल बुल्के, ज्ञानी जैल सिंह, काका कालेलकर इत्यादि के विचार इस ग्रंथ की गरिमा में और भी वृद्धि करते है। डा0 लक्ष्मीमल सिंघवी (संविधान में हिन्दी), डा0 वेद प्रताप वैदिक (अंग्रेजी विश्व-भाषा नहीं है), डा0 जयंती प्रसाद नौटियाल (विश्व में सर्वाधिक बोली-समझी जाने वाली भाषा हिन्दी), इत्यादि आलेख हिन्दी भाषा चिंतन की समृद्ध परंपरा को दर्शाते हैं। द्वितीय अध्याय में संकलित हिन्दी की भाव-भूमि के प्रति काव्य रचनाओं को जिस तरह मोतियों की तरह एक कड़ी में गूंथा गया है, वह इसे रोचक एवं सारवान बनाती है। हिन्दी की विकासयात्रा के क्रम में विभिन्न प्रान्तों में हिन्दी की स्थिति, हिन्दी एवं, प्रौद्यागिकी विकास, यूनीकोड, वैश्विक संदर्भ में नागरी लिपि का तथात्मक विश्लेषण करते आलेख इस गं्रथ के नाम की सार्थकता को ही सिद्ध करते नजर आते हैं।


ग्रंथ में सुदूर अंडमान-निकोबार द्वीप समूह और अ-हिन्दी भाषाई राज्यों में हिन्दी की समृद्ध पंरपरा, इन्टरनेट के इस दौर में ब्लॉग एवं सोशल नेटवर्किंग, साइबर जगत में हिन्दी की दशा और दिशा जैसे आलेख यदि आगामी संस्करणों में शामिल किये जा सकें तो इस ग्रंथ को और भी व्यापक बनाया जा सकता है।
इस गौरव ग्रंथ के संपादक डा0 राजेन्द्र नाथ मेहरोत्रा पेशे से इंजीनियर एवं सैन्य अधिकारी हैं और यही कारण है कि उन्होंनें इस ग्रंथ के एक-एक पृष्ठ को बड़े सुनियोजित एवं अनुशासनबद्ध रूप में प्रस्तुत किया है। आज जबकि हमारी युवा पीढ़ी पाश्चात्य सभ्यता से प्रेरित होकर अंग्रेजी के पीछे भाग रही है, वहाँ हिन्दी विश्व गौरव-ग्रंथ जैसे उत्कृष्ट ग्रंथ भारतीय संस्कृति, हिन्दी की भाषाई चेतना एवं समृद्ध परंपरा को उल्लिखित करते हुए इसके भविष्य के प्रति आश्वस्त करते हैं।


पुस्तक : हिन्दी-विश्व गौरव-ग्रन्थ (प्रथम खण्ड)
संपादक: डा0 राजेन्द्र नाथ मेहरोत्रा
प्रकाशकः कर्मण्य तपोभूमि सेवा न्यास प्रकाशन, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
संस्करण: वर्ष 2011
मूल्य: रू 400/- (विदेश में 25 डालर/15 पौण्ड)
समीक्षक: कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएँ, इलाहाबाद परिक्षेत्र, इलाहाबाद-211001
kkyadav.y@rediffmail.com, www.kkyadav.blogspot.in/, www.dakbabu.blogspot.in/
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कृष्ण कुमार यादव : 10 अगस्त, 1977 को तहबरपुर, आजमगढ़ (उ. प्र.) में श्री राम शिव मूर्ति यादव और श्रीमती बिमला यादव के प्रथम सुपुत्र के रूप में जन्म. परिवार में मेरे अलावा बहन किरन यादव और अनुज अमित कुमार यादव शामिल. आरंभिक शिक्षा जवाहर नवोदय विद्यालय, जीयनपुर-आजमगढ़ में एवं तत्पश्चात इलाहाबाद विश्वविद्यालय से वर्ष 1999 में राजनीति शास्त्र में परास्नातक. वर्ष 2001 में भारत की प्रतिष्ठित ‘सिविल सेवा’ में चयन। सम्प्रति ‘भारतीय डाक सेवा’ के अधिकारी। सूरत, लखनऊ, कानपुर और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में नियुक्ति के पश्चात फिलहाल इलाहाबद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ पद पर पदस्थ। 28 नवम्बर, 2004 को आकांक्षा यादव से विवाह। दो पुत्रियाँ: अक्षिता (जन्म- 25 मार्च, 2007) और अपूर्व (जन्म-27 अक्तूबर 2010)। प्रशासन के साथ-साथ साहित्य, लेखन और ब्लाॅगिंग के क्षेत्र में भी प्रवृत्त। देश की प्राय: अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं और इंटरनेट पर विभिन्न वेब पत्रिकाओं एवं ब्लॉग पर रचनाओं का निरंतर प्रकाशन. व्यक्तिश: 'शब्द-सृजन की ओर' और 'डाकिया डाक लाया' एवं युगल रूप में सप्तरंगी प्रेम, उत्सव के रंग और बाल-दुनिया ब्लॉग का सञ्चालन. इंटरनेट पर 'कविता कोश' में भी कविताएँ संकलित. 50 से अधिक पुस्तकों/संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित. आकाशवाणी लखनऊ, कानपुर व पोर्टब्लेयर, Red FM कानपुर और दूरदर्शन पर कविताओं, लेख, वार्ता और साक्षात्कार का प्रसारण. अब तक कुल 5 कृतियाँ प्रकाशित- 'अभिलाषा' (काव्य-संग्रह,2005) 'अभिव्यक्तियों के बहाने' व 'अनुभूतियाँ और विमर्श' (निबंध-संग्रह, 2006 व 2007), 'India Post : 150 Glorious Years' (2006) एवं 'क्रांति-यज्ञ : 1857-1947 की गाथा' . व्यक्तित्व-कृतित्व पर 'बाल साहित्य समीक्षा' (सं. डा. राष्ट्रबंधु, कानपुर, सितम्बर 2007) और 'गुफ्तगू' (सं. मो. इम्तियाज़ गाज़ी, इलाहाबाद, मार्च 2008) पत्रिकाओं द्वारा विशेषांक जारी. व्यक्तित्व-कृतित्व पर एक पुस्तक 'बढ़ते चरण शिखर की ओर : कृष्ण कुमार यादव' (सं0- दुर्गाचरण मिश्र, 2009) प्रकाशित. विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक-सामाजिक संस्थानों द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु 50 से ज्यादा सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त। विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, भागलपुर, बिहार द्वारा डाक्टरेट (विद्यावाचस्पति) की मानद उपाधि। अभिरूचियों में रचनात्मक लेखन व अध्ययन, चिंतन, ब्लाॅगिंग, फिलेटली, पर्यटन इत्यादि शामिल.

 

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बहुत क्षण ऐसे आए 
जब आसमान मेँ तने
ऐन सूरज के नीचे
गुम हो गयी सारी पंक्तियाँ
और तन गयी
कोलतार सी नंगी देह
ठीक जावाकुसुम की तरह

विस्फारित खुली आँखोँ मेँ
अंदर की आवरगी
नहीँ छूटी थी
और लाख चाहने पर भी
लालटेन जला ही नहीँ था
दोपहर की शाखोँ से टकराते
नंगे पैर
धूप से जलते रहे
और फागुन के गीत
उन होँठोँ मेँ
आया ही नहीँ
जहाँ देह के पसीने
हथेली मेँ बंद हो गये थे

अपनी जगह के लिए
कभी-कभी तो
न चाहते हुए भी
चप्पे-चप्पे धूप खिल जाते हैँ
और राहत कार्योँ की गिट्टियाँ
रोटी के मूक प्रश्न मेँ
हथेली मेँ आ जाते हैँ ।

* मोतीलाल/राउरकेला

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प्रेम कथा

लड़के का नाम -  चुप

लड़की का नाम - ख़ामोशी

गाँव का मुखिया -शोर

अंत                 - पारंपरिक

 

सत्य कथा

एक आदमी के दो बेटे थे ,दोनों हमशकल ,

उसमे एक नेता था और दूसरा पागल ,

वह आदमी ज़िन्दगी भर नहीं समझ पाया

उसका कौन सा बेटा नेता है और कौन सा बेटा पागल |

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अखतर अली

फजली अपार्टमेंट

आमानाका ,कुकुरबेड़ा

रायपुर |

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1-
खर्चा यदि बचाने की, तुझे लगी है चाह।
करके नैना चार तू , करले प्रेम विवाह।।
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2-
मँहगाई डायन भई, बेरोजगारि चुड़ैल।
पैसा को नहिं समझिए, अब हाथों का मैल।।
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3-
हिन्दी भाषा हाय रे, घर की रही न घाट।
थूक गये अंग्रेज जो, इंग्लिश रहे हो चाट।।
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4-
अध्यापक की नौकरी, गईं ललायिन पाय।
लाला जी चौका करें, घर में शिशु खेलाय।।
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5-
नेता जी तो ठीक हैं, नहीं हैं उनमें खोट।
बुड़बक तो हम लोग हैं, दियें उनहिं को वोट।।
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6-
पिछली बातें भूलकर, आगे की अब सोच।
कुर्ता फाड़ न सर पटक, बालों को मत नोच।।
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7-
तेल भराने को नहीं, पाकिट में है धन।
हीरोहोंड-दहेज में , माँगने का तुझे मन।।
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8-
गइ भैंसिया पानी में, तो होत क्यूँ परसान।
दिन है बन्धू गर्मि का, करने दो असनान।।
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9-
मालुम नहीं क्यूँ उल्लु ही, कहे तुझे सब कोय।
सात बजे से पहिलेहि, तू तो जाता सोय।।
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10-
अब गुलजामुन बरफि से, खोया गया है खो।
'हलवाई' का नाम अब , 'मिलवाई' रख दो।।
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11-
लड़की लड़का बन रहीं, जिन्स टिशट को धार।
खूंटी पर लटका हुआ, रोये सुट सलवार।।
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12-
गलती अब जो करत है, वो कछु सजा न पाय।
आइ-लभ-यु तो मुँह कहे, गाल तमाचा खाय।।
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13-
शादी का मैं अभी तक, बना ना पाया मन।
क्योंकि हर इक लड़की को, मैंने समझा
बहन।।
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14-
जुग-जुग जीयें आप जी, ईश्वर से फरियाद।
जूता पालिश कीजिए, मेरा आशीर्वाद।।
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15-
जब-जब बक-बक तू करे , बोले फाल्तू बोल।
मच्छर मक्खी घुस पड़ें, तू जब मुँहवा खोल।।
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16-
बचपन का अब बाग तो, गया है आज उजड़।
चिकनी चमेलि देख के, छोटके रहें बिगड़।।
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17-
सोचो इंटर-नेट से , बढ़ेगा कैसे इल्म।
यू-ट्यूब पर छुप-छुपके, देख रहे हो फिल्म।।
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18-
वस्त्र बचाने की लगी, लड़किन में अब होड़।
छोटे-छोटे पहन रहीं, लम्बे कपड़े छोड़।।
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19-
जय हो बेरोजगारि माँ , काम नहीं फिर आज।
क्यों बैठे चुपचाप से, लाओ छीलें प्याज।।
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20-
मुर्गा भ्रष्टाचार का, बहुत दे चुका बांग।
खींचे अन्ना संग मिल, आओ इसकी टांग।।
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21-
प्रेम किसी से ना करो, बहुत बुरी है बात।
उल्लू तुम बन जावगे, जागोगे भर रात।।
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रचनाकार :- सुरेश कुमार 'सौरभ'
पता:- जमानिया कस्बा, जिला गाजीपुर, उत्तर प्रदेश
ई-मेल पता:- sureshkumarsaurabh@gmail.com

एक ग़ज़ल
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आज दिल जो जला जा रहा था
आग उसमें उठा जा रहा था


जिसने देखा तमाशा अजल का,
ख़ाक में वो मिला जा रहा था


फूल सब जल चुके थे ख़िज़ाँ में
फ़लक़ में लौ उठा जा रहा था


जिस्म में अब हरारत हमारी
ज़िन्दगी को दिखा जा रहा था


सुन हमारी कहानी ज़माना
उफ़क़ पे खूँ लगा जा रहा था


ग़ैर की जिन्दगी में ‘सपन’ तो
बन मसीहा घुटा जा रहा था

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किस्मत

रानू पार्क में बैठा हुआ एक बूढ़े से बात कर रहा था। वह इतनी ऊँची आवाज में बोल रहा था कि पार्क में आये हुए अन्य लोग उसे देखने व सुनने लगते थे। वह कह रहा था कि हमारे गाँव का सोनू और मैं एक ही कक्षा में पढ़ते थे। सोनू पढ़ने में बहुत तेज था। वह रोज स्कूल जाता था और बहुत मेहनत करता था। मेरा मन पढ़ाई में नहीं लगता था।

घर से तो मैं भी रोज जाता था। लेकिन स्कूल कभी-कभी ही पहुँचता था। कभी सिनेमा देख कर और घूम-घाम कर वापस आ जाया करता था। किसी-किसी दिन जंगल में बैठ कर ताश खेलते थे। और पेड़ पर चढ़कर सिनेमा वाला गाना गाते थे।

पिता जी अक्सर डाँटते थे कि सोनू को देखो कितना मेहनत करता है। रात में दस बजे तक पढ़ता है और सुबह भी जल्दी उठ जाता है। और तुम सूरज उगने के बाद तक सोते रहते हो। जब किस्मत में खेत जोतना ही लिखा है तो दिमांग में पढ़ाई-लिखाई क्यों बैठेगी ? देख लेना सोनू कोई साहेब बनेगा।

इतना कहकर रानू ठहाका लगाकर हँसा। फिर कई लोग उसे देखने लगे। वह बोला कि आज सोनू खेत जोतता है और मैं अठारह हजार महीने की सरकारी नौकरी करता हूँ। बूढ़ा बोला बेटा तुम्हारी किस्मत में सरकारी नौकरी और सोनू के खेती-बारी ही थी तो कोई क्या करता ?

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.)।

URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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1. क्या करें, इस फ़िक्र में भगवान बैठे हैं

क्या करें, इस फ़िक्र में भगवान बैठे हैं।

क्या बनाया, क्या बने इंसान बैठे हैं।

 

राम को करते भ्रमित मारीच हर युग में,

स्वर्ण से लदकर सभी हैवान बैठे हैं।

 

मुल्क़ को तक़दीर भी कब तक बचाएगी,

आसनों पर गिद्ध धारे ध्यान बैठे हैं।

 

दर पे अब किस सर झुकाएँ,मन्नतें माँगे,

पत्थरों से हो गए भगवान बैठे हैं।

 

भीड़, भागमभाग, भारी शोर शहरों का,

पंगु जीवन, आदमी सुनसान बैठे हैं।

 

सब गुजरते जा रहे हैं पैर रख-रखकर,

सर बचाने का लिए अरमान बैठे हैं।

 

कृष्ण भी बनने लगे हैं कंस कलियुग में,

क्या लिखें अब सोच में रसखान बैठे हैं।

 

दिल से पत्थर फेंककर हर आसमाँ छिद जाए,

कितने इस भ्रम में गवाँकर जान बैठे हैं।

 

जंग जीवन जीतने की धुन सुना तू चल

लोग सर पकड़े लहू-लुहान बैठे हैं।

 

अब जले ये आशियाना या बुझे फिर लौ,

आग से हम खेलने की ठान बैठे हैं।

 

2. हरिद्वार

महादेव पैरों के नीचे पड़े हुए थे पग-पग पर,

कल-कल करती गंगा छल-छल जल करता चंचल पग धर ।

 

घंटों-घड़ियालों की ध्वनि से भरा हुआ आकाश मगन,

शिव बमभोले - शिव बमभोले गूँजे धरती गर्भ गगन,

 

महके अगरू, चंदन भीगे, फूलों की गम-गमक सघन,

धूप, दिये, आरती, थाल, जल-कलश, बेल, अर्पण -तर्पन ।

 

खील- बताशे, लड्डू -पेड़े, चाट -पकौड़े, पानीपूरी,

कुल्फी, शरबत, लीची का रस, शीतल जल, लस्सी रसचूरी,

 

टमटम - इक्के, रिक्शे -ताँगे, टैम्पो भागे दौड़े दूरी,

भीड़ -भड़क्का, कूड़ा -करकट, धूल -धूसरित घाट अघोरी ।

 

साधू मोटे पतले-दुबले, भिखमंगें निर्धन बीमारी,

दुर्बल काया कोई न देखे सरस काय पर नजर बिलौरी,

 

हरिद्वार की हरि-पौड़ी पर मन चंगा नंगा तन गोरी,

धोए काया, ढूँढे माया, मन दरिद्र तन स्वर्ण लदो री ।

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प्रियंका सिंह (शोधकर्ती)

गृहविज्ञान संकाय,

वनस्थली विद्यापीठ,टोंक (राजस्थान)

बालक राष्ट्र कि धरोहर होते हैं। सुविख्यात अंग्रेजी कवि मिल्टन का कथन है कि - “यथा सूर्योदय होने पर ही दिवस होता है ” वैसे ही मानव का उदभव बालक से होता है। अत: प्रत्येक राष्ट्र का यह परम पुनीत कर्तव्य है। कि वह अपने अमूल बाल धन की सर्वाधिक सुरक्षा करे। परिवर्तन एक शाश्वत नियम है परिवर्तन के इस चक्र से हर समाज एवं व्यवस्था को गुजरना होता है आज भारतीय संस्कृति में त्याग, तपस्या, श्रम ,साधना, प्रेम, दया - भाव, बड़ों के प्रति आदर भाव, सदाचार, शालीनता आदि मूल्यों के आधार पर स्वार्थ, अशिष्ट, द्वेषभाव, हिंसा, संवेदनशीलता, असत्य, छल -कपट, जैसे मूल्यों का विकास होता है। इन सब का सर्वाधिक प्रभाव आज के किशोर बालक बालिकाओं में ज्यादा देखने को मिलता है। आधुनिक युग में किशोरों की विशेषताओं को ध्यान में रखकर शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिये। वही शिक्षा किशोरों के लिये लाभप्रद होगी क्योंकि किशोरों के सम्पूर्ण विकास में शिक्षा का बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान है। शिक्षा एक महत्वपूर्ण सामाजिक क्रिया है जिसका आयोजन छात्रों के संरक्षकों अध्यापकों विद्यालय समितियों और समाज के सदस्यों द्वारा किया जाता है ।इसका मानव जाति के बौद्धिक सावेंगिक सांस्कृतिक आर्थिक एव सामाजिक जीवन से निकट का सम्बन्ध है यह व्यक्ति को प्रकृति प्रदत शक्तियों का ज्ञान कराती है और इस प्रकार बालकों में सुखी एव उतरदायी व्याक्ति बनने की योग्यता लाती है।

‘एजुकेशन’ शब्द की उत्पति लैटिन भाषा के निम्नांकित शब्दों से मिलकर हुयी है

Educare - जिसका अर्थ विकसित करना या प्रकाश में लाना है।

इस वाक्य का आशय है कि ‘भीतर से वृद्वि’ की सूचना मिलना बालक में पहले से ही कुछ शक्तियाँ और क्षमतायें विद्यमान होती हैं। वह क्रियाशील रहता है उसे अपनी क्रिया और अनुभव के आधार पर स्वत: ज्ञान प्राप्ति के लिये स्वतन्त्र कर देना चाहिये इस कार्य में किसी भी प्रकार के बहारी प्रभाव को स्थान नहीं मिलना चाहिये वरन् स्वाभविेक वृद्धि और अन्तर्निहित शक्तियों के विकास को ही महत्व प्रदान किया जाना चाहिये।

किशोरावस्था के सम्बन्ध में यह परम्परागत विश्वास रहा है कि किशोरावस्था विकास की एक क्रान्तिक अवस्था है इस अवस्था के बालक को न बालक कह सकते हैं ओर न प्रौढ़ व्यक्ति ही कह सकते हैं इस अवस्था में बालक कें शारीरिक और मनोवैज्ञनिक गुणों में परिवर्तन प्रौढ़वस्था की दिशा में होते हैं। Adolescence शब्द के यदि शब्दिक अर्थ को देखा जाये तो स्पष्ट होता है कि Adolescence शब्द की उत्पति लैटिन भाषा के शब्द Adolescere से हुआ है जिसका अर्थ परिपक्वता की और बढना है।

जर्सील्ड़ (1978) के अनुसार किशोरावस्था वह अवस्था है जिसमें एक विकासशील व्यक्ति बाल्यावस्था से परिपक्वावस्था की और बढ़ता है।

इस अवस्था में बालक की जो जीवन शैली बन जाती है। वही जीवन शैली थोड़े बहुत परिवर्तन के साथ जीवन पर्यन्त चलती रहती है बाल्यावस्था कि अपेक्षा किशोरावस्था में बालकों में बदलाव दिखाई देता है यह बदलाव मूलत: उनकी यौन परिपक्वता के कारण ही होता है सभी विकासत्मक अवस्थाओ में किशोरावस्था सर्वाधिक आनन्दमयी होती है। इसलिए इस अवस्था को सुनहरी अवस्था कहा जाता है।

अघ्ययनों के आधार पर कहा गया है कि किशोरावस्था समस्याओं की आयु है। किशोरों की समस्यायें परिवार, विद्यालय, स्वाथ्य, मनोरंजन, भविष्य, व्यवसाय, विपरीत लिंग के लोगों आदि से सम्बधित हो सकती हैं। ये समस्यायें अर्थिक, व्यकितगत और सामाजिक आदि किसी भी स्तर की हो सकती हैं। किशोरावस्था को समस्याओ की आयु इसलिए कहा जाता है कि बालक अपने माता पिता सरंक्षकों और अध्यापको आदि के लिए एक समस्या होता है। अत: उसमें चिन्ता, उत्सुकता, अनिश्चितता और भ्रान्ति के लक्ष्ण उत्पन हो जाते हैं। किशोरावस्था के अन्त तक अधिकांश समस्यायें धन, सेक्स या शैक्षिक उपलब्धि के सम्बन्ध में ही होती हैं। किशोरावस्था में आयु बढ़ने के साथ - साथ किशोर अपनी समस्याओं का समाधान करना स्वयं सीखते जाते हैं। फलस्वरूप वे समय व्यतीत होने के साथ - साथ समायोजन में अच्छे और खुशहाल होते जाते हैं।

आज का अध्यापक यह प्रयत्न करता है कि छात्र स्वयं ही किसी बात का निरीक्षण करे उस पर विचार करे और तत्सम्बन्धी निष्कर्ष निकाले। अत: शिक्षा का अर्थ अग्रसर करना या मनुष्य के गुप्त गुणों को प्रकाश में लाना है अन्य शब्दों में शिक्षा मनुष्य की विविध शारीरिक मानसिक और नैतिक शक्तियों के उत्पादन और विकास की एक कला है।

इस प्रकार शिक्षा स्वाभाविक विकास के परिवर्तन में निहित होती है यह परिवर्तन शिक्षा के परिणाम के कारण उस परिवर्तन से भिन्नता रखता है जो शिक्षा के अभाव में हुआ होता है। एडिसन के अनुसार “शिक्षा मानव मस्तिष्क की प्रत्येक छिपी विशेषता और पूर्णता को प्रकाश में ला देती हैं जो ऐसी सहायता के बिना कभी भी प्रकट होने में समर्थ नहीं हो सकती थी” जीवन की सफलता दो बातों पर निर्भर होती है।

1. बालक की जन्मजात शक्तियों और क्षमताओं का विकास और

2. इस विकास द्धारा समाज की आवश्कताओं की पूर्ति की सीमा। अतएव शिक्षा को दो प्रकार के कार्यों का सम्पादन करना होता है - व्यक्ति के प्रति कार्य और समाज के प्रति कार्य।

आधुनिक शिक्षा की प्रमुख विशेषता उसकी सर्वग्रही पद्धति है आज हम शिक्षा के सिद्धातों और क्रियाओं का चयन सभी विचार धाराओं और गुणों के आधार पर करते हैं किसी एक विशेष विचार धारा की सीमा में अपने को बाँधते नहीं। शिक्षा के विभिन्न उद्देश्यों की विवेचना करने के पश्चात् हम शिक्षा के उद्देश्यों के सम्बन्ध में अपना विचार कर सकते हैं। हम शिक्षा के कुछ ठोस उद्देश्य प्रस्तुत कर रहे हैं।

शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित शक्तियों का विकास करना है।

1. उत्तम स्वास्थ्य

2. परिष्कृत रूचियाँ औंर धारणायें

3. तार्किक विचार शक्ति

4. सामाजिक दृष्टिकोण

5. तथ्यों की जानकारी और कौशल

6. नैतिक चरित्र।

ये सभी उद्देश्य परस्पर संबद्ध है हर उद्देश्य एक दूसरे पर निर्भर है और एक दूसरे का पूरक हैं। कोई भी एक उद्देश्य दूसरे पर शासन नहीं कर सकता। सतत् जागरूक प्रत्यनों द्धारा शिक्षक सर्वांगीण व्यक्तित्व का विकास कर सकता है। जो स्वयं तथा दूसरों के जीवन को समृद्ध और सुखी बना सकता है।

माँ की ममता लाजबाब (व्यंग्य) अपने सभी भाई-बहनों में मेरी नाक थोड़ी ज्यादा ही मोटी है. हंसने पर नाक के फुफकारने की सी फूल जाती है. मगर माँ की ममता इसे मानने को तैयार ही नहीं होती, वह मेरी नाक को अत्यंत ही सुन्दर और नुकीली बताती है. इसलिए मुझे कभी –कभी शीशे पर भी संदेह हो जाता है. चेहरे में सब भाग तो काबिले तारीफ है सिवा नाक के. माँ मुझे परिवार में सर्वाधिक सुंदर और बुद्धिमान बताती है मगर मुझे अपने आप पर विश्वास ही नहीं होता है. क्योंकि मुझे अपनी इन दोनों ही चीजों पर बचपन से शक रहा है.

कभी-कभी मैं अपने इस शक को दूर रख कर सोचता हूं तो निःसंदेह मुझे भी अपने-आप पर गर्व होता है. दिमाग फिरंगी है मेरा और हमेशा से ही उलूल-जुलूल बातों पर विश्वास करता आया है,सिर्फ बेतुकी बातों पर ही चिंतन से चिंता तक करता आया है तथा अक्सर ही मुझे बाबूभाई कटारा से तुलना करने को प्रेरित करता है, अमेरिका से कनाडा तक मुझे एक ऐसी परिवहन व्यवस्था से सैर करा देता है जो अकल्पनीय है.

बस !अगर मैं अपनी सुंदरता के शक को दूर रख कर सोचता हूँ तब. इन सभी विचारों को कार्य रूप में परिणत करने के लिए मेरे परिवार की आर्थिक बदहाली आड़े आती है तथा मेरे पिता या भाई के सांसद या विधायक नहीं होने का दर्द अक्सर कराह उठता है. काश ! मेरे पिता या भाई भी अगर लोकतांत्रिक जनसेवक होते तो ऐसी बात नहीं होती, मेरे भी ख्वाब अधूरे नहीं होते, मैं भी अपनी माँ की यादृच्छिक कल्पना को साकार करता, अपने को सुन्दर होने का अलौकिक प्रमाण पेश करता, भले ही मुझे फांसी होती या आजीवन कारावास की सजा होती.

अगर मेरे परिवार के कुछ सदस्य ऐसे होते जो मेरे द्वारा किये गए कुकर्मों को सद्कर्म बनाकर संसद भवन या विधानसभा के शून्यकाल या विशेष बैठक में उठाते. फिर यह प्रक्रिया लंबी हो जाती या राष्ट्रपति के पास क्षमायाचना को लंबित रहती और फिर मेरी अवस्था इस व्यवस्था को तलाक देकर रुखसत हो जाती और मैं अपने मातृ-प्रेम को जीवंत कर अमर हो जाता अपने राष्ट्र के न्यायि़क इतिहास में. शायद इसी बात की कल्पना करके प्रकृति ने हमारे इस आदर्श परिवार में सांसद या विधायक पैदा नहीं किया और इस उन्मुक्त प्रेम प्रक्रिया से मेरी माँ को होने वाले खुशनुमा दर्द को पैदा होने से पहले ही भू-गर्भित कर दिया.

कस्‍बे की अखबारी दुनिया

यशवन्‍त कोठारी

कभी आपने सोचा है कि छोटे शहरों या कस्‍बों से निकलने अखबारों की असली समस्‍या क्‍या होती है मैंने इस सम्‍बन्‍ध में अपने कवि मित्र के साथ मिलकर अत्‍यन्‍त मौलिक चिन्‍तन किया है जिसे श्रीमान्‌ की सेवा में सादर प्रस्‍तुत करता हूं। कवि मित्र ने बताया कस्‍बे के अखबार में आप प्रधानमंत्री के खिलाफ लिख सकते है मगर इलाके थानेदार या एस․डी․ओ․ के खिलाफ नहीं लिख सकते। इसी प्रकार आप स्‍थानीय नेताओं, भू माफियाओं के खिलाफ भी नहीं लिख सकते। मैंने एक स्‍थानीय पत्र के सम्‍पादक से पूछा फिर आप क्‍या लिखते हैं, वे बोले हम अन्‍तरराष्ट्रीय समस्‍याओं पर राष्ट्रीय नीतियों पर लिखते रहते हैं। और जरुरत पडने पर कुछ पीले हो जाते हैं। वैसे पीत पत्रकारिता में भी दम है। पेडन्‍यूज, एडवेटोरियल, रिटर्न गिफट, इम्‍पेक्‍ट फीचर आदि से भी पेट भर जाता है। एक ही स्‍थान पर कई मास्‍ट हेड से अखबार छप जाते हैं।

विज्ञापनों के सहारे ये सब चलता रहता है। ये छोटे कस्‍बों के बड़े अखबार कभी कभी बड़े आतंक कायम कर देते हैं और ये आंतकी खबरे कस्‍बों-गांवो और आस पास के क्षेत्रों में बम बारी करती रहती हैं। अखबार निकलता रहता है सम्‍पादक ने मुझे समझाया जिला कलक्‍टर के खिलाफ लिखने की हिम्‍मत कोई सम्‍पादक नहीं कर सकता क्‍योंकि अखबार का पंजीकरण कभी भी निलम्‍बित हो सकता है। जन सम्‍पर्क अधिकारी की बिटिया की शादी में लिफाफा देने से विज्ञापन बिल समय पर पास होते रहते हैं।

कस्‍बे का पत्रकार जानता है कि खुद को और अखबार को जीवित रखना कितना मुश्‍किल काम है। कभी भी अफसर, माफिया, छुटभैये नेता, युवा कार्यकर्ता, प्रेस-अखबार और मालिक सभी को सूली पर टांग देते हैं। कस्‍बे का निर्भीक पत्रकार जान हथेली पर रखकर रिपोर्टिंग करते करते मर जाता है मगर किसी के कान पर जूं नहीं रेंगती। हाँ ये भी सच है कि कस्‍बे का पत्रकार पीली नीली और लाल पत्रकारिता के सहारे रोटी खाता है या अपने स्‍टाफ के बच्‍चों का पेट पालते पालते कभी भी मौत का शिकार हो जाता है।

पत्रकारों की मजबूरियों-समझोतो पर किताबे लिखी जा सकती है और लिखी गई है। पत्रकार कस्‍बा स्‍तरीय व्‍यावसायिकता के सहारे कस्‍बे में पत्रकारिता करता है और जीवन भर खुद भी शापित होता है और दूसरों का भी शोपण करता है। फिर भी अपनी रीफिल-कागज-प्रेस लेकर प्रजातन्‍त्र के लिए लड़ता है। और हो जाता है- एक बीमार, उदास, अप्रकाशित अलिखित समाचार की तरह। वो दुनिया और व्‍यवस्‍था बदलने का सपना देखते देखते खुद बदल जाता है। व्‍यावहारिक हो जाता है और धीरे धीरे अपने बच्‍चे-पालने में व्‍यस्‍त हो जाता है। बेचारा छोटे कस्‍बे का बड़ा पत्रकार। करे तो क्‍या करे।

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यशवन्‍त कोठारी, 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर जयपुर - 2, फोन - 2670596

e-mail ID - ykkothari3@gmail़com

m--09414461207

अवरोध

शशांक मिश्र भारती

मैं-

निरन्‍तर परिस्‍थितियों से

लड़कर भी खड़ा हूं

अपनी-

मंजिल की तलाश में,

सोचता हूं तोड़ दूं

अपने-

पथ के सभी अवरोध

किन्‍तु-

समक्ष आ जाता है

शब्‍दों का अभाव

जो-

बन जाता है मेरे मन की व्‍यथा

लेकिन-

फिर भी प्रयत्‍नशील हूं

मैं अपने पथ पर

और-

प्रयत्‍न करता रहूंगा

सफलता प्राप्‍त होने तक,

वह-

मेरे लिए एक नया

सुखद प्रभात होगा

जब छंट जायेगी

मेरे पथ की

सभी अवरोधी चट्‌टानें

रोक रखा है

जिन्‍होंने-

मेरे मानसिक उत्‍कर्ष को।

‘‘उपरोक्‍त कविता मेरी अपनी स्‍वरचित,मौलिकव रश्‍मिरथी द्वैमासिक जुलाई-अगस्‍त 1993 पृ..27प्रकाशित है।''

सम्‍पर्कः-हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर-242401 0प्र0 9410985048

ईमेल:-shashank.misra73@rediffmail.com

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दोनों बस की सीट पर एकदम खामोश बैठे हुए थे। रमेश खुश था बहुत खुश। ऑटो मैं बैठकर चौपाटी जाकर आये थे वे लोग। भेलपुरी खायी थी बांहों मैं बाहें डालकर घुमे थे,और रेत का घरोंदा बनाया था। काफी था रमेश के लिए इतना। पर क्या उमा खुश थी ?बार बार उसकी नज़र उस बड़ी सी गाड़ी मैं बैठे जोड़े पर चली जाती थी,दोनों के हाथ मैं बड़ी बड़ी आइसक्रीम थी, शायद दोनों बाहर खाने का प्लान बना रहे थे। बाहर डिनर लेकर कितने संतुष्ट  होकर घर जायेंगे ये लोग। घर जाकर एसी खोलकर सो जायेंगे। पर यंहा ऐसी किस्मत कंहा?घर जाते ही रमेश चावल दाल बनाने की फरमाइश करेगा , फिर सारे बर्तन साफ़ करने होंगे,तब कंही जाकर कमर सीधी होगी वो भी मछरों से लड़ते हुए। मन ही नहीं करता थाउसे कंही बाहर जाने का,बस की लाइन मैं खड़े रहो फिर ऑटो ऑटो पुकारो पैसे देखकर खाना खाओ मीटर देखते हुए सारा ऑटो सांस रोके बैठे रहो। भीड़ का एक हिस्सा बनकर।

रमेश उस दिन जुलूस देखने का प्रोग्राम बना रहा था, उमा चाह रही थी वे किसी कॉफी शॉप जाए,और कॉफी पिए पर रमेश चाह रहा था की जुलूस देखने चले,कितने middle क्लास शौक थे रमेश के। बोर हो गयी थी उमा रमेश के साथ । अभिजात्य वर्ग की बात ही अलग होती है कितने उम्दा शौक होते है उनके। बड़ी सी बॉटल साथ लिए फिरते हैं कि कहीं इधर उधर का पानी पीकर बाबा को जुकाम ना हो जाए,पर रमेश तो पानी का बॉटल घर से ले चलने की जिद करता है। कितनी बार कहा है रमेश से एक आधा जींस ले ले पर नहीं वही ढीले ढाले पैंट पहनेगा। इससे तो अच्छा है कि वो घर के बाहर ही ना निकले।

रमेश समझ रहा था की उमा उसके साथ खुश नहीं। बाहर आकर भी वह अनमनी और बेचैन रहती है। ना जाने उसकी आँखे क्या ढूँढती रहती है? पता नहीं किधेर खोयी खोयी रहती है? सब तरफ क्या ढूँढ़ते रहती है? कोई चीज़ की फरमाइश नहीं करती ? इतना घमंड भी तो अच्छा नहीं. कोई कमी नहीं रखता मैं उसको, पर पता नहीं क्यों? शायद वह मेरे साथ खुश नहीं। आज से ऑफिस से घर जल्दी जाना बंद।

ऑफिस से देर से आने लगे है आजकल। आये मेरी बला से, चलिए जी बड़ा सुकून है मनपसंद चंनील लगा कर देखते रहो। जल्दी आते थे तो बाहर ले जाते थे और अपने मिडिल क्लास होने का अह्स्सास ही मारे डालता था । अभी अभी टीवी पर मुकेश अम्बानी का बंगला देखा आँखे फट गयी। क्या था जी उनके पास ?आगे बढ़ने की चाह होनी चाहिए. पता नहीं इतनी देर क्यों कर दी।

कितनी खुश है मेमसाब आज। फिर से लौकी बना दी। इन्हें कहां ख़याल है किसी और की ख़ुशी का। आदमी घर पर आता है चंद बोल प्यार से सुनने के लिए और ये है कि इन्हें अहसास ही नहीं। कल से सुधीर के साथ थोड़ा गपशप लड़ा कर आऊँगा।

कितना मुंह फुला कर खाना खा रहे थे, लगता था साड़ी दुनिया का बोझ इन्हीं पर है । वह तो अम्मा ने पढाया नहीं वर्ना हम भी कहीं नौकरी कर लेते। कल से हम भी मिसेज मुक्ता के घर ताश खेलने जाया करेंगी । उफ़ इतनी बेरुखी।

वह मज़ा आगया सुधीर क़े साथ कितना जिंदादिल इंसान है । थोड़ी पी भी ली मैंने,चलिए कोई बात नहीं मेमसाब के लिए फूल ले लेता हूँ

वह मज़ा आया किट्टी मैं। कुछ अच्छा बनादेती हूँ शक की कोई गुंजाइश ही ना रहे. मिसेज मुक्ता कल हमें वहां ले जायेंगी जहां बड़े लोग ताश खेलने आते हैं।

आज उल्टा सीधा बक दिया मैंने शायद कुछ ज्यादा हो गयी थी।

आज खाना न बना सकी। ताश की बाज़ी ही कुछ ऐसे चली,

आज खाना बहार ही खा लिया बड़ा अच्छा लगा । लौटते समय उमा क़े लिए आइसक्रीम ले ली।

ताश खेलते समय टाइम का ध्यान कहां रहता है। बड़े लोगों को तो पकपकाया खाना मिलता है, घरों मैं कुक जो है। रश्मि क़े घर गयी थी मैं इतना बड़ा घर,पता नहीं उसका हसबैंड कुछ अजीब नज़रों से मुझे घूर रहा था।

सुधीर मुझे जन्नत ले गया। कितनी मीठी बातें करती है सुधा। पैसे कमाता हूँ चलिए थोडा मजा भी लेंगे। इंस्टालमेंट पर कार ले लूं फिर सुधा को कहीं ले केर जा सकता हूँ।

रश्मि क़े हसबैंड ने ब्लैकबेरी फ़ोन दिया मुझे । मैंने रमेश से कह दिया की दोस्त ने दिया है।

आज सुधा बड़ी ख़ूबसूरत लग रही थी । कार मैं हम दोनों घूमने गए उसके बाद कदम डगमगाने लगे,

रश्मि का हसबैंड मुझे कॉफी पिलाने ले गया ,और उसके बाद मेरा हाथ पकड़कर ........मैंने उसे जोर से चांटा लगाया। मुझे अम्मा की याद आई।

सुधा को आज विष्णु के साथ देखा कलेजे पर सांप लोट गए। घर जल्दी ही आ गया।

रमेश और उमा रेत क़े घरोंदे बना रहे है चौपाटी पर दोनों खुश है।

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  मैं चला

यूँ ही होता रहा दर से बदर मैं

हर बार एक नया ठिकाना मिल गया

गम तो बहुत दिए जिन्दगी ने लेकिन

हमेशा हंसने का कोई बहाना मिल गया


सितम ढाने वालों से कह दो

उनका सितम बड़ा हसीन था

पर अफ़सोस कि जिन्दा हैं अभी

क्योंकि जिन्दगी पे यकीन था


सैलाब बहा ले जाये किनारा पर

किनारा खत्म होता नहीं

बसते है गुलशन उजड़ के

पतझड़ सदा रहता नहीं


है मुकम्मल सारी दुनिया

दिल जो अपने साथ है

बंद कर आँखें और देख

ख्वाहिशों की रात है


दिल के कोने में

उम्मीदों की लौ जला

खुद गिरा और खुद ही संभला

और आज मैं फिर चला

--

तेरे अक्स
बीते हुए लम्हों की
गुजरी परछाईयों में
आँखों से मेरी झांको
दिल की गहराईयों में
अक्स हैं तेरे तेरे
नक्श हैं तेरे तेरे

उजली सी सुबह जैसा
रोशन वो चेहरा तेरा
भूलूं मैं कैसे भूलूं
रूह पे छाये जो मेरे
अक्स हैं तेरे तेरे
नक्श हैं तेरे तेरे

यादों की तन्हाईओं में
पल पल दिल डूबता जाये
ख्वाबों के आसमां पे
बादल बनके जो बिखरे
अक्स हैं तेरे तेरे
नक्श हैं तेरे तेरे

अक्स हैं तेरे तेरे
नक्श हैं तेरे तेरे
 

आओ मिल बैठ कर कुछ जि़न्‍दगी की बात करें।

क्‍यूँ न हम आज इक नयी शुरुआत करें।

 

लड़ रहे हैं मुद्‌दत से मगर हुआ न कुछ हासिल,

भुला कर गिले शिकवों को, दोस्‍ती की बात करें।

 

सफ़र में तुम भी हो साहब, सफ़र में हम भी हैं,

हँसी खुशी ये गुज़र जाए, वो करामात करें।

 

सियाह रात है पसरी, नज़र न कुछ आता,

दिया जलाओ तो पहले, फिर सहर की बात करें।

 

हम यहाँ उलझे हैं उन चीजों में, जो अपनी ना हैं,

आओ पहचान करें खुद से, खुद की बात करें।

--

 

-सी. ए अनुराग तिवारी

5-बी, कस्‍तूरबा नगर,

सिगरा, वाराणसी- 221010

प्रो. वसीम बरेलवी

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उसूलों पर जहां आँच आये ,  टकराना ज़रूरी है

जो ज़िन्दा हो, तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है

एक शख्सियत….... प्रो. वसीम बरेलवी

आज के दौर में चाहें कोई भी क्षेत्र हो इंसानी फ़ितरत ऐसी हो गई है कि वो उरूज (तरक्की/उन्नति  ) पाने के लिए छोटे से छोटा रास्ता अख्तियार करना चाहती है न कि वो सही और तवील (लम्बा)  रस्ता जिस पे बा-क़ायदा उसे अपनी मेहनत और लगन से सफ़र करना चाहिए। हमारी नई पीढ़ी इस बीमारी से अछूती नहीं है । शाइरी के इलाके में भी ये संक्रमण बड़ी रफ़्तार से फैलता जा रहा है। शे'र कहने कि सलाहियत एक दिन में नहीं आती , शाइरी का ताल्लुक तो मिज़ाज से है। नए - नए प्रयोग ,चौंकाने वाला रवैया चका- चौंध तो एक बार पैदा कर देता है पर उसकी उम्र बहुत छोटी होती है। वक़्त के साथ -साथ शाइरी ने अपना मिज़ाज और अपना रंग बदला है और इसी राह पे आज की ग़ज़ल ने भी अपने तेवर बदल लिए है मगर एक शख्सीयत है जिसने अपने तक़रीबन पचास साला अदबी सफ़र में रवायत का दामन कभी नहीं छोड़ा और हिन्दुस्तानी शाइरी की सदियों की तहज़ीब की दस्तार का वक़ार जिसने कभी कम नहीं होने दिया है। उस अज़ीम शख्सीयत का नाम है प्रो.वसीम बरेलवी। प्रगतिशीलता और इंक़लाब के नाम पे अदब पे चाहे कैसा भी वक़्त गुज़रा हो या नए ज़माने के साथ चलने की हौड़ में मोतबर अदीबों ने भी बहुत से समझौते किये हो पर वसीम बरेलवी हिन्दुस्तानी अदब के वो श्रवण कुमार है जो अपनी शाइरी के काँधे पर तहज़ीब और रवायत दोनों को पचास सालों से मुसलसल ढो नहीं रहे हैं बल्कि इन्हें एक ख़ूबसूरत सफ़र करवा रहे हैं। इस हसीन सफ़र की दास्तान इस मतले और शे'र से बयान होती है :---

क्या बताऊँ ,कैसा ख़ुद को दरबदर मैंने किया

उम्र -भर किस - किसके हिस्से का सफ़र मैंने किया

तू तो नफरत भी न कर पायेगा इस शिद्दत के साथ

जिस बला का प्यार तुझसे बे-ख़बर मैंने किया

ज़ाहिद हसन (वसीम बरेलवी) का जन्म 8  फरवरी 1940  को जनाब शाहिद हसन "नसीम" मुरादाबादी के यहाँ बरेली में हुआ। इनके वालिद का त-अल्लुक़ मुरादाबाद के ज़मीदार घराने से था मगर हालात् कुछ ऐसे हो गये कि उन्हें मुरादाबाद से अपनी ससुराल बरेली में आना पड़ा दरअसल बरेली वसीम साहब की ननिहाल है और वहीं ननिहाल में इनकी परवरिश हुई। इनके वालिद के ताल्लुक़ात रईस अमरोहवी और जिगर मुरादाबादी से बड़े अच्छे थे ,उनका घर आना जाना रहता था और घर में शाइरी की ही गुफ़्तगू रहती थी सो ज़ाहिद हसन साहब के ज़हन पर शाइरी का जादू छाने लगा। 1947  में बरेली के हालात् ज़रा नासाज़ हो गये और नसीम मुरादाबादी साहब अपने परिवार के साथ रामपुर आ गये। रामपुर का माहौल अदब के लिहाज़ से बरेली से ज़ियादा बेहतर था। उस वक़्त वसीम बरेलवी साहब की उम्र 8 -10  बरस रही होगी की इन्होंने कुछ शे'र कहे और वालिद साहब ने उन्हें जिगर मुरादाबादी साहब को दिखाए जिगर साहब ने शे'र सुन के कहा कि बेटे अभी तुम्हारी पढ़ने की उम्र है शाइरी के लिए तो उम्र पड़ी है बस वसीम साहब ने जिगर साहब का कहा माना और अपनी अकेडमिक तालीम को अंजाम देने में लग गये। बरेली कॉलेज ,बरेली से वसीम साहब ने एम्. ऐ उर्दू में गोल्ड मेडल के साथ किया । उस वक़्त शायद वसीम साहब ने सोचा भी नहीं होगा कि एक दिन उसी कॉलेज में वो उर्दू विभाग के अध्यक्ष भी बनेंगे ।

साठ के दशक के शुरूआती साल में वसीम साहब बा-कायदा मुशायरों में पढ़ने लगे । वसीम साहब का शाइरी का शौक़ अब जुनून में तब्दील हो चुका था ,उस वक़्त मुशायरों में इन मोतबर शाइरों के साथ वसीम बरेलवी को पढ़ने का मौक़ा नसीब हुआ, फिराक़ गोरखपुरी , क़मर मुरादाबादी, जगन्नाथ आज़ाद ,जोश मलसियानी , अर्श मलसियानी ,फैज़ अहमद फैज़ , कुंवर महेंदर सिंह बेदी" सहर ",नरेश शाद ,प्रेम कुमार बर्टनी , सागर निज़ामी ,कैफ़ी आज़मी, साहिर लुधियानवी और मज़रूह सुल्तानपुरी। वसीम बरेलवी साहब को फैज़ अहमद फैज़ की शाइरी में नयापन नज़र आया ,फिराक़ को पढ़ना उन्हें सुकून देने लगा मगर वे नशे से चूर हो जायेँ ऐसे क़लाम की तलाश उन्हे मुसलसल रही और ये ही तलाश उनसे उम्दा ग़ज़लें लिखवाती गई। 1972 में वसीम साहब के जश्न में फिराक़ गोरखपुरी भी शरीक़ हुए । फिराक़ गोरखपुरी ने कहा कि "मेरा महबूब शाइर वसीम बरेलवी है मैं उससे और उसके क़लाम दोनों से मुहब्बत करता हूँ , वसीम के ख़यालात भौंचाल कि कैफ़ियत रखते हैं "। आज लोग वसीम बरेलवी की शख्सीयत और फ़न पे पी-एच.डी. कर रहे है पर वसीम साहब ने शाइरी की बारीकियां और उसके साथ- साथ ज़िन्दगी जीने का सलीक़ा बरेली के जाने - माने वक़ील जनाब मुन्तकिम हैदरी साहब से सीखा। हैदरी साहब ने ज़ाहिद हसन नाम के संगे -मरमर को तराश कर वसीम बरेलवी नाम का शाइरी का ताज महल बना दिया।

वसीम बरेलवी मानते हैं कि शे'र लफ़्ज़ से पैदा नहीं होता शे'र एहसास से जन्म लेता है और उनका ये कौल उनके क़लाम से मेल भी खाता है :--

क्या दुःख है समन्दर को बता भी नहीं सकता

आंसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता

तू छोड़ रहा है तो ख़ता इसमें तेरी क्या

हर शख्स मेरा साथ निभा भी नहीं सकता

वसीम बरेलवी का ये कथन भी कितना सटीक है कि शाइरी कोई अखबार की ख़बर नहीं है ,ख़बर सुबह तक ही ब-मुश्किल ताज़ा रहती है, शाम तक तो बासी हो जाती है मगर शाइरी तो सदियों तक सफ़र करती है । वाकई उनके अशआर इस जुमले को सच साबित करते हैं :--

हादसों कि ज़द पे है तो मुस्कुराना छोड़ दें

ज़लज़लों के खौफ़ से क्या घर बनाना छोड़ दें

तुमने मेरे घर न आने की क़सम खायी तो है

आंसुओं से भी कहो आँखों में आना छोड़ दें

*****

यह सोच कर कोई अहदे-वफ़ा करो हमसे

हम एक वादे पे उम्रें गुज़ार देते हैं

रवायती शाइरी की हिमायत वसीम साहब यूँ ही नहीं करते उनका कहना है कि इतने बरसों बाद भी आज मीर और ग़ालिब हमारे लिए हवाला बने हुए हैं। शाइरी कोई भड़कते हुए शोले का नाम नहीं है सच में शाइरी तो चट्टान पे लिखी हुई वो इबारत है जो आने वाली नस्लों की नस्लें भी पढ़ती रहें तभी तो वसीम बरेलवी के शे'र तीन पीढियां एक साथ गुनगुनाती हैं :---

किसी मजलूम कि आँखों से देखा

तो ये दुनिया नज़र आई बहुत है

तुझी को आँख भर कर देख पाऊं

मुझे बस इतनी बिनाई बहुत

नहीं चलने लगी यूँ मेरे पीछे

ये दुनिया मैंने ठुकराई बहुत है

***

परों में सिमटा ,तो ठोकर में था ज़माने की

उड़ा ,तो एक ज़माना मेरी उड़ान में था

***

दूर से ही बस दरिया दरिया लगता है

डूब के देखो कितना प्यासा लगता है

पिछले दिनों सुमन गौड़ साहिबा के काव्य संग्रह "माँ कहती थी" के विमोचन के मौके पे जब अपनी तनक़ीद में मलिकज़ादा "जावेद" ने कवियित्री से उदासी की फिज़ां से बाहर निकल कर ज़िन्दगी को देखने कि बात कही तो वसीम बरेलवी ने बतौर शाइर कवियित्री की क्या ख़ूब पैरवी अपने इस शे'र के साथ की :--

हँसी जब आये, किसी बात पर ही आती है

उदास होने का अक्सर सबब नहीं होता

वसीम साहब मानते हैं कि शाइर के अन्दर की टूट - फूट ही काग़ज़ पर उतरती है ,आख़िर अन्दर की टूटन भी तो एहसासात का हिस्सा है।

वसीम बरेलवी सलीक़े का दूसरा नाम है उनका मुशायरों में बैठने का अंदाज़ , बड़ी तन्मयता से दूसरे शाइरों को सुनना यहाँ तक कि तहज़ीब की जितनी भी शर्तें है वो उनकी शख्सियत के आगे कम पड़ जाती है नई नस्ल को समझाना भी कौन-सा आसान काम है । इसे वसीम साहब यूँ बयाँ करते हैं :-- 

नई उम्र की ख़ुदमुख्तारियों को कौन समझाये

कहां से बच के चलना है ,कहां जाना ज़रूरी है

और इस सलीक़े के साथ हिन्दुस्तानी नारी को ये मशविरा भी वसीम बरेलवी के अलावा और कौन दे सकता है :-

थके - हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें

सलीक़ामंद शाखों का लचक जाना ज़रूरी है

किसी को भरोसा दिलाने की ज़मानत देने वाला वसीम साहब का ये शे'र जब पहली मरतबा सुना तो बस सन्न रह गया इस मयार का शे'र इस मफहूम पर पहले न सुना न उनके अलावा कोई और कह सकता है   :-

मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो

कि इसके बाद भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

वसीम बरेलवी एक बार पाकिस्तान किसी मुशायरे के सिलसिले में गये हुए थे तब उन्हें वहाँ एक टी.वी की लाइव बहस में बुलाया गया जिसमे उनके अलावा वहाँ के एक वजीर और कुछ साहित्यकार भी थे। वसीम साहब से दोनों मुल्कों के रिश्तों में अदब की भूमिका पे सवाल पूछा गया। वसीम साहब ने वहाँ जो बोला वो अपने आप में एक मिसाल है। उन्होंने कहा कि अदब दोनों मुल्कों के लिए अहमियत रखता है मगर आप अपने यहाँ हमारे मुल्क से जगन्नाथ आज़ाद , कृष्ण बिहारी "नूर" को बुला लेते हैं और हमारे यहाँ अहमद फ़राज़ , पीरज़ादा कासिम साहब बुलाये जाते हैं ,उर्दू अदब-उर्दू अदब से मिलता रहता है। हमारे यहाँ 20 -22 साल के उर्दू न जानने वाले नौजवान भी परवीन शाकीर और अहमद फ़राज़ के न जाने कितने शे'र आपको सुना सकते हैं मगर आप बाताये आपके यहाँ कितने लोग है जिन्होंने प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद , मीरा ,निराला , दिनकर को पढ़ा है ? आप भी अपने दरीचे खोलिए हमारे यहाँ के हिन्दी साहित्य को जानिये हम लोग भाषा की सतह पर न जाने कितने मसाइल हल कर सकते हैं। हथियारों पे होने वाले खर्च को हम इंसानी ख़िदमत में लगा सकते हैं और फिर उनकी इस बात का नतीजा ये हुआ कि उसके बाद से पाकिस्तान में हिन्दी के कवि भी बुलाये जाने लगे। ये पहली मरतबा हुआ जब किसी उर्दू के शाइर द्वारा वो भी पाकिस्तान में हिन्दी साहित्य की बात रखी गयी। हिन्दी -उर्दू दोनों ज़बानों से ज़ियादा वसीम साहब हिन्दुस्तानी अदब के ख़िदमतगार है और तहज़ीब के मुहाफ़िज़ है तभी तो वसीम बरेलवी परम्परा के धागे में शाइरी के मोती पिरोते हैं :--

तुम्हारा प्यार तो सांसों में सांस लेता है

जो होता नशा तो इक दिन उतर नहीं जाता

एक बार गुजरात दंगो के बाद दुबई के एक मुशायरे में पाकिस्तान के एक शाइर ने वसीम साहब से तन्ज़ लहजे में कहा कि आपके यहाँ ये सब क्या हो रहा है ? तब वसीम साहब ने उनसे कहा कि ये हमारे घर के मसअले है और हम इसे अपने घर में निबटाना जानते हैं। हमारे यहाँ साझा संस्कृति है 95 फीसदी लोग अमन चाहते हैं बाकी बचे फ़िरकापरस्त हमारी तहज़ीब की दीवार नहीं ढहा सकते।

मुहब्बत के यह आंसू है ,इन्हें आँखों में रहने दो

शरीफ़ों के घरों का मसअला बाहर नहीं जाता

वसीम बरेलवी के हर मिसरे पे वसीम बरेलवी की मुहर लगी होती है उनका हर मिसरा ऐसे लगता है कि ये 300 साल पहले का भी है ,आज का भी और आने वाले 300  साल बाद का भी :---

उस ने क्या लाज रखी है मेरी गुमराही की

कि मैं भटकूँ तो भटक कर भी उसी तक पहुँचूँ

*****

कहां क़तरे की ग़मख्वारी करे है

समन्दर है अदाकारी करे है

नहीं लम्हा भी जिसकी दस्तरस में

वही सदियों की तैयारी करे है

***

उसी को जीने का हक़ है, जो इस ज़माने में

इधर का लगता रहे और उधर का हो जाये

वसीम बरेलवी की अभी तक ये किताबें मंज़रे - आम पे आ चुकीं है तब्स्सुमे - ग़म (1965 ),आंसू मेरे दामन तेरा (1972 ),मिज़ाज(1990 ),आँख आंसू हुई (2000 ),मेरा क्या (2000),आँखों आँखों रहे (2007 ),और मौसम अन्दर बाहर के(2007 )।

वसीम बरेलवी ने समाज के हर हिस्से के मसाइल को अपनी अहसास की क़लम से उकेरा है चाहे वो वतन पे शहीद हो चुके किसी जाबांज का दर्द ही क्यूँ न हो  :--

कभी लफ़्ज़ों से गद्दारी न करना

ग़ज़ल पढ़ना ,अदाकारी न करना

मेरे बच्चों के आंसू पोंछ देना

लिफ़ाफ़े का टिकट जारी न करना

एक आम आदमी को जीने के लिए रोज़ाना न जाने कितनी मरतबा अपने मन को मारना पड़ता है कितने समझौते उसे सुब्ह से शाम तक करने पड़ते हैं इस अंतर-मन की पीड़ा को वसीम साहब ऐसे शाइरी बनाते हैं :--

शाम तक सुबह की नज़रों से उतर जाते हैं

इतने समझौतों पे जीते हैं कि मर जाते हैं

टी. वी ने किस तरह हमारी संस्कृति पे हमला किया है ,आजकल हर घर की सच्चाई क्या हो गई है अपने मिज़ाज से हटकर इस सच से भी वसीम साहब यूँ रु -ब -रु करवाते हैं :--

घर में एक शाम भी जीने का बहाना न मिले

सीरियल ख़त्म न हो जाए तो खाना न मिले

इराक में एक घटना घटित हुई एक पत्रकार ने बुश साहब पे जूता फैंका ,इस वाकिये को बहुत शाइरों ने ग़ज़ल बनाया पर जूते का इस्तेमाल शाइरी में एब माना जाता है मगर वसीम बरेलवी ने इस रिवायत को क्या ख़ूब निभाया जूते का इस्तेमाल उन्होंने किया भी नहीं और किया भी तो इस तरह :--

ये ज़ुल्म का नहीं मज़लूमियत का गुस्सा था

के जिसने हौसलामंदी को लाजवाल किया

हज़ार सर को बचाया मगर लगा मुंह पर

ज़रा से पाँव के तेवर ने क्या कमाल किया

इस अहद में इन्सान के बाज़ूओं में ईमान की ताक़त ज़रा कम हो गयी है और हुकूमत से लेकर रिआया तक पूरी प्रणाली भ्रष्टाचार से फालिज़ हो चुकी है तब वसीम साहब कुछ इस तरह अपनी बात कह्ते है :-

तलब की राह में पाने से पहले खोना पड़ता है

बड़े सौदे नज़र में हो तो छोटा होना पड़ता है

***

ग़रीब लहरों पे पहरे बिठाये जाते हैं

समन्दरों की तलाशी कोई नहीं लेता

अदब की ख़िदमत के लिए यूँ तो वसीम बरेलवी साहब को अनेकों एज़ाज़ मिले हैं पर उनमें से कुछ ये हैं :--इम्तियाज़े मीर अवार्ड ,लखनऊ ,ग़ज़ल अवार्ड ,लखनऊ ,हिन्दी उर्दू साहित्य अवार्ड ,लखनऊ , अंजुमन-ए - अमरोहा कराची द्वारा सम्मान , नसीम-ए-उर्दू अवार्ड , शिकागो ,सारस्वत सम्मान  (हिन्दी साहित्य सम्मलेन ,प्रयाग) ,गहवार -ए -अदब अमेरिका द्वारा सम्मान , सम्मान में नागरिकता ह्यूस्टन सिटी काउन्सिल टेक्सास ,अमेरिका द्वारा फिराक इंटरनेशनल अवार्ड और जाफ़री इंटरनेशनल साहित्य अवार्ड, अमेरिका। वसीम बरेलवी की बहुत सी ग़ज़लों को जगजीत सिंह ने अपनी मखमली आवाज़ से सजा कर दुनिया के हर गोशे में पहुंचाया और वे गज़लें इतनी मकबूल हुईं कि सुनने वालों के ज़हन –ओ- दिल में उन्होंने अपना हमेशा के लिए घर बना लिया ।

वसीम बरेलवी ने अपनी शाइरी से अदब में वो इज़ाफा किया है जिससे आने वाली नस्लें फायदा उठाती रहेंगी उनके इसी योगदान के कारण हुकूमते -हिंद ने उर्दू ज़बान को बढ़ावा देने वाली भारत की सबसे बड़ी संस्था (NCPUL) की कमान वसीम साहब के हाथ में सौंपी है।

मुशायरों में जहां कभी शे’रो-सुखन का आलम रहता था वहां अब अदब के नाम पर अदबी माफियाओं ने कब्ज़ा कर लिया है फिर भी वसीम बरेलवी नाम की एक शमा है जो शाइरी की लो को मद्धम नहीं होने देती हैं मगर तकलीफ़ ये है कि साल में 365  दिन होते हैं, 365 मुशायरे मुनअक़ीद होते हैं और वसीम बरेलवी एक है।

वसीम बरेलवी का एक मशविरा आज के मीडिया जगत के लिए बड़ा क़ाबिले - गौर है कि मीडिया का मंडप सियासत ,फ़िल्में और खेल के पिलर पर टिका है और लड़खड़ा रहा है। अगर ये साहित्य को अपना चौथा स्तम्भ बना ले तो ये पांडाल हर आंधी तूफ़ान का सामना कर सकता है। वसीम साहब ये भी मानते हैं कि इस दौर में नेट और मीडिया के ज़रिये ग़ज़ल अपना सफ़र तेजी से तय कर रही है ,हमारे कॉलेज के लड़के -लड़कियाँ शाइरी से जुड़ रहे है तो फिर ग़ज़ल को उदास होने की ज़रूरत नहीं है हाँ ज़रूरत है तो बस शाइरी में इमानदाराना कोशिशों की। लफ़्ज़ और एहसास के बीच के फासले को तय करने की कोशिश ही शाइरी है। आज के नौजवानों को वसीम साहब के कहन से सीखना चाहिए कि बात सलीक़े से कैसे कही और सुनी जाती है :--

कौन सी बात कहाँ कैसे कही जाती है

ये सलीक़ा हो तो हर बात सुनी जाती है

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दूरी हुई ,तो उनसे करीब और हम हुए

ये कैसे फ़ासिले थे ,जो बढ़ने से कम हुए

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चाहे जितना भी बिगड़ जाए ज़माने का चलन

झूठ से हारते देखा नहीं सच्चाई को

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ये जायदादों की तक़सीम भाइयों में हुई

के जायदादों में तक़सीम हो गये भाई

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किसी से कोई भी उम्मीद रखना छोड़ कर देखो

तो ये रिश्ते निभाना किस क़दर आसान हो जाये

वसीम बरेलवी जदीद शाइरी का वो घना दरख्त है जो एक मुद्दत से अपनी शाइरी के साये से हमारी सदियों की तहज़ीब को पश्चिमी संस्कृति की शदीद धूप से बचाये हुए है। ये दरख्त अदब की राह से भटकने वाले मुसाफिरों को राह भी दिखाता है और इसकी जड़े हमारी शानदार रिवायत की तरह मज़बूत है। जिसे आधुनिकता की आँधी गिरा तो क्या हिला भी नहीं सकती। सच तो ये है कि शाइरी की इतनी बड़ी शख्सियत पे हज़ारों सफ़े लिख दूँ तो भी कम है मगर एक पंक्ति में अपनी बात को अंजाम देता हूँ कि ग़ज़ल बड़ी क़िस्मत वाली है जिसे वसीम बरेलवी मिले है और जिसे वसीम बरेलवी मिल जाए तो फिर उसका इतराना वाज़िब है । हमारे अहद की ग़ज़ल यूँ ही इतराती रहे। हम भी एक दिन अपनी आने वाली पौध को बड़े फख्र से बताएँगे कि हमने वसीम बरेलवी को देखा था ,सुना था और उन्हें छुआ भी था। आख़िर में वसीम बरेलवी के इसी मतले के साथ कि शायद ये इशारा हिन्दी -उर्दू को बांटने वालों के ज़हन तक पहुंचे :--

छोटी-छोटी बातें करके बड़े कहाँ हो जाओगे

पतली गलियों से निकलो तो खुली सड़क पर आओगे

ख़ुदा हाफ़िज़़ ...

--

विजेंद्र शर्मा

vijendra.vijen@gmail.com

डॉ. तारिक़ क़मर

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सच बोलें तो घर में पत्थर आते हैं

झूठ कहें तो ख़ुद पत्थर हो जाते हैं

एक शख्सियत….....डॉ.तारिक़ क़मर

शाइरी में सबसे मक़बूल कोई विधा है, तो वो है ,ग़ज़ल और इन दिनों ग़ज़ल कहने वालों की तादाद भी बढ़ती जा रही है। नई नस्ल के शाइरों में बहुत ज़ियादा कहने का माद्दा तो है पर वो कहन में है या नहीं ,शे'र में शेरियत है या नहीं इसकी उन्हें ज़रा परवाह कम है। ग़ज़ल के बुनियादी मालूमात जैसे रदीफ़ ,काफ़िया ,बहर आदी को भी दर किनार करके कुछ नए लोग बस लफ़्ज़ों को फ़िज़ूल में ख़र्च करने पे तुले हैं। ऐसे माहौल में एक मतला सुनने को मिला :-------

सच बोलें तो घर में पत्थर आते हैं

झूठ कहें तो ख़ुद पत्थर हो जाते हैं

ये शानदार मिसरे सुनते ही लगा कि शाइरी के अखाड़े के किसी मंझे हुए शाइर का क़लाम है और फिर जानकर बड़ी ख़ुशी हुई कि ये मतला सत्तर के दशक में पैदा हुए युवा शाइर तारिक़ क़मर का है। तारिक़ क़मर को पढने के बाद लगा कि नई नस्ल से अगर ग़ज़ल को कोई उम्मीद है तो वो तारिक़ क़मर जैसे सुख़नवरों की वज़ह से ही है।

डॉ. तारिक़ क़मर का जन्म जिगर मुरादाबादी के इलाके के क़स्बे सम्भल में मरहूम अक़ील अहमद साहब के यहाँ 01 जुलाई 1974 को हुआ। तारिक़ साहब को शाइरी का फ़न विरासत में मिला ,इनके वालिद और इनके दादा भी शाइर थे। तारिक़ कमर की शुरूआती पढाई संभल में हुई , फिर इन्होने मुख्तलिफ़ - मुख्तलिफ़ जगहसे अपनी तालीम पूरी की जैसे कानपुर ,मुरादाबाद और मुस्लिम यूनिवर्सिटी ,अलीगढ़।

लफ़्ज़ों को शाइरी में बरतने के मामले में तारिक़ फ़िज़ूल ख़र्ची नहीं करते पर पढाई के मामले में तारिक़ रती-भर भी कंजूस नज़र नहीं आते। तारिक़ क़मर इस छोटी सी उम्र में उर्दू, अंग्रेज़ी और पत्रकारिता एंड मॉस कम्युनिकेशन में स्नात्तकोतर है। "नई ग़ज़ल में इमेज़री " पे तारिक़ ने रूहेलखंड विश्वविद्यालय ,बरेली से शोध कर पी. एच .डी की।

अमुमन लोग जैसे अपने चेहरे से दिखते हैं वैसे होते नहीं है पर तारिक़ जैसे दिखते हैं वैसे ही संजीदा है उनका संजीदा क़लाम इस बात की ज़मानत देता है कि तारिक़ क़मर 'कम उम्र के एक बुज़ुर्ग शाइर है'। तारिक़ क़मर की संजीदा शाइरी की झलक उनके इन शे'रों में मिलती है :----

दुनिया को बतलायें कैसे ख़ुद से क्यूँ शर्मिन्दा है

आज अचानक झाँक के 'तारिक़' अपनेअन्दर देख लिया

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सच है दुनिया को जगमगाते हैं

कुछ दिये घर भी तो जलाते हैं

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तुझे ख़बर भी नहीं है ,के बुझ गई आँखें

मेरे चराग़ , तेरा इंतज़ार करते हुए

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हवाहै तेरा इरादा क्या

रौशनी हो गई ज़्यादा क्या

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रात आई तो उजाले का भरम टूट गया

अब मैं समझा के ये साया भी नहीं है मेरा

तारिक़ क़मर की शाइरी में लफ़्ज़ों की जो चमक, ताज़गी और जो रिवायत की चादर में लिपटी हिन्दुस्तानी तहज़ीब देखने को मिलती है उसमे बहुत बड़ा योगदान उनके उस्ताद डॉ . नसीमुज्ज़फर साहब का है। निदा फ़ाज़ली साहब कह्ते हैं कि मैं तारिक़ क़मर की तख़लीकी ज़हानत का खैरमकदम करता हूँ , तारिक़ क़मर मुशायरे भी अपनी शर्तों के साथ पढ़ते हैं जिससे कि सुननेवाले को ये एहसास हो कि शे'र सिर्फ़ दिखाए नहीं जाते बल्कि सुनाये भी जाते हैं।

डॉ राहत इन्दौरी की नज़र में तारिक़ क़मर नई शाइरी का आठवाँ सुर है

सा रे गामा पा धानी सा

गंगा जमुना के पानी सा

मशहूर शाइर मुनव्वर राना फरमाते हैं कि तारिक़ क़मर अपने बुज़ुर्गों की शराफ़त वाली उजली तस्बीह का एक दाना भी इधर - उधर नहीं होने देते। तारिक़ क़मर की आँखें उस पतंग को नहीं देखती जो आसमान में बुलंदियों को छू रही होती हैं बल्कि इनकीआँखें देर तक उस पतंग में अटकी रहती है जो किसी नन्हे बच्चे की आरज़ूओं के हाथ से फिसलकर नीम या पीपल के पेड़ में अटक जाती है।

तारिक़ क़मर की शाइरी उनके इर्द- गिर्द बिखरी हुई समाजी ना- हमवारियों,टूट-फूट ,बिखराव और अपने अन्दर से उठने वाली उदासी की मुंह बोलती तस्वीरें है।

तारिक़ क़मर साहब की दो किताबें अभी तक मंज़रे- आम पर आई है "शजरसे लिपटी बेल “(नागरी और उर्दू ) 2009 में ,पत्तों का शोर2010 में और अपने वालिद की किताब 'जुर्मे-सुख़न ' का सम्पादन भी तारिक़ क़मर ने किया। बहुत से अदबी संस्थानों ने तारिक़ साहब को एज़ाज़ से नवाज़ा है। डॉ. तारिक़ क़मर फिलहाल ई.टी .वी उर्दू , लखनऊ में सीनियर एडिटर हैं।

आज के दौर में रिश्तों में जो गिरावट आई है उसे तारिक़ क़मर ने शाइरी में यूँ बांधा है :---

रिश्तों की तहज़ीब निभाते रहते हैं

दोनों रस्मन आते-जाते रहते हैं

तेज़ हवा चुप- चाप गुज़रती रहती है

सूखे पत्ते शोर मचाते रहते हैं

मेरी ख़ुशनसीबी है कि तारिक़ मेरे दोस्त है और मैंने उन्हें रु-ब-रु सुना है , आजकल मुशायरे में लोग तालियों और वाह-वाह के लिए सामईन से गिड़-गिड़ाते रहते हैं वहीँ तारिक़ बड़ी मासूमीयत के साथ अपना क़लाम पढ़ कर सामईन के ज़हन -ओ-दिल में अपना घर बना लेते हैं। उनके ये अशआर उनसे अक्सर फरमाइश कर सुने जाते हैं :---

काग़ज़ की एक नाव अगर पार हो गई

इसमे समन्दरों की कहाँ हार हो गई

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नज़र नज़र से मिलाकर सलाम करआया

ग़ुलाम, शाह की नींदें हराम कर आया

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मैं कभी तुझसे बे-ख़बर हुआ

कोई आंसू इधर उधर हुआ

*****

ये जो हर मोड़ पे शतरंज बिछी है इसको

पहले इन जितने वालों की सियासत से निकाल

याद इतना तो रहे दोस्त के हम दोस्त भी थे

अपना खंजर मेरे सीने से मुहब्बत से निकाल

तारिक़ नए दौर के शाइर है मगर उनके अन्दर का शाइर,आधुनिकता की चका-चौंध ,इस आलमे हवस और जिस्मों की भीड़ के बावजूद भी सीलन भरी दीवार की पपड़ी की तरह उतरती हमारी तहज़ीब की परतों की मुरम्मत करने में लगा है। अपनी जवान फ़िक्र को तारिक़ क़मर ने भटकने नहीं दिया है उनके ये मिसरे इसी बात का सुबूत है :---

गिरती हुई हवेली से बाहर हो सकी

तहज़ीब घर उजड़ के भी बे-घर हो सकी

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राह में अपनी सात समन्दर आए है

लेकिन घर तक प्यास बचा कर आए है

एक मुलाज़िम के हालात् और उसके अन्दर की खीज को भी तारिक़ ने ख़ूबसूरती के साथ शे'र में ढ़ाला है :--

घर आकर अब डांट रहे हैं बच्चों को

हम साहब की गाली खाकर आए है

इस छोटी सी उम्र और छोटे से अदबी सफ़र में तारिक़ ने अदब की दुनिया में अपनी हाज़िरी का एहसास करवाया है। दुनिया में जहाँ भी उर्दू बोली और समझी जाती है,जहाँ भी मुशायरे होते हैं तारिक़ उसमे नस्ले-नौ की नुमाइंदगी करते हैं। मुशायरे की शुहरत शाइर को ऐसा लिखने केलिए मजबूर करती है जिससे कि सिर्फ़ तालियाँ बटोरी जा सके पर तारिक़ ने अपनी क़लम को ये मर्ज़ नहीं लगने दिया है । उनका कहन अपना अलग अंदाज़े - बयाँ रखता है। ज़रा येअशआर देखें :---

मंज़र में दुश्मन का हमला होता है

पसमंज़र में कोई अपना होता है

कुछ तो बच्चे सख्ती से पेश आते हैं

कुछ तितली का रंग भी कच्चा होता है

कोई प्यासा लौट गया तो दरिया क्या

दरिया प्यास बुझाकर दरिया होता है

हर झोंके में उसकी ख़ुशबू आती है

हर आहट पे उसका धोखा होता है

छोटी बहर में भी तारिक़ साहब की गज़लें फिज़ां में अपनी ख़ुश्बू कुछ यूँ फैलाती है :---

हैरत है नादानी पर

रेत का घरऔर पानी पर

दिल ने अपना काम किया

अक्ल रही निगरानी पर

दिल ने सदमे झेले हैं

आँखों की नादानी पर

डॉ . तारिक़ क़मर को अभी अदब के रास्ते पे बहुत लंबा सफ़र करना है ,अदब को उनसे उम्मीदें भी बहुत है। इतनी कम उम्र में शे'र कहने का ये शऊर यूँ ही नहीं आता इसके लिए बुज़ुर्गों का आशीर्वाद और ख़ुद को बहुत मशक्कत करनी पड़ती है। ग़ज़ल अपने आने वाले कल का चेहरा तारिक़ क़मर में बड़े एतबार के साथ देख सकती है। तारिक़ अपनी उम्र से आगे की शाइरी करते हैं। इस बात को पुख्ता बात में तब्दील किये देता हूँ उनके ये मिसरे देखें ज़रा :--

जिसके साये में किया करते थे पहरों बाते

अब उसी पेड़ के साये में बदन जलता है

जितने दरिया हैं समन्दर में चले जाते हैं

ये बताओ के समन्दर भी कहीं जाता है

******

या तो मिट्टी के घर बनाओ मत

या घटाओं से खौफ़ खाओ मत

*****

यहाँ मेरा कोई अपना नहीं है

चलो अच्छा है कुछ ख़तरा नहीं है

******

मेरे तो दर्द भी औरों के काम आते हैं

मैं रो पडूं तो कई लोग मुस्कुराते हैं

उम्मीद है डॉ. तारिक़ क़मर से मुख़ातिब होना आपको अच्छा लगेगा और शाइर के एक नए ज़ाविये का आपको एहसास होगा। तारिक़ क़मर के इसी शे'र से अपने इस आलेख को विराम देता हूँ ,अगले हफ्ते मिलते हैं एक और शख्सियत के साथ ....

तुम मेरे प्यार का अफ़साना किताबों में लिखो

आने वाली कई नस्लों को नसीहत होगी

विजेंद्र शर्मा

vijendra.vijen@gmail.com

ताहिर फ़राज़

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मैंने तो एक लाश की, दी थी ख़बर "फ़राज़"

उलटा मुझी पे क़त्ल का इल्ज़ाम आ गया

एक शख्सियत…....ताहिर फ़राज़

ग़ज़ल के तीन सो साला माज़ी पे नज़र डालें तो ये बात शीशे की तरह साफ़ है कि ग़ज़ल के चहरे पे ताज़गी हमेशा नज़र आती है चाहे वो सालों पुरानी हो या आज की। किसी ख़बर और शाइरी में सबसे बड़ा यही बुनियादी फ़र्क है कि ख़बर चंद लम्हात तक ताज़ा रहती है फिर बांसी हो जाती है। रफ़्ता- रफ़्ता उसकी साँसे उखड़ने लगती है , एक - दो रोज़ बाद अख़बार की रद्दी के साथ दफ़न हो जाती है मगर शाइरी सदियों का सफ़र दो मिसरों में तय करती है और सालों बाद भी ज़िन्दा रहती है, ताज़ा रहती है। इसकी अहम् वजह ये है कि एक तो ग़ज़ल ख़ुद भी बहुत ख़ूबसूरत है दूसरा हमारे अहद के कुछ सुख़नवर इसकी तामीर ये सोच कर करते जैसे कोई ताजमहल बना रहें हो।

हिन्दुस्तान में ग़ज़ल अगर दिल्ली में फ़क़ीरों की ख़ानकाहों में पैदा हुई तो उसने यौवन की दहलीज़ पे क़दम लखनऊ में रखा जहाँ तहज़ीब के ख़ानदान में उसकी परवरीश हुई। जब कभी ग़ज़ल दिल्ली से मायूस हो जाती और जब - जब लखनऊ का तकल्लुफ़ उसे अखरने लगता तो वो दोनों तारीख़ी शहरों के दरम्यान बसे रामपुर में सुकून के लिए क़याम करने चली आती। रामपुर के नवाबों ने भी ग़ज़ल की ख़िदमत में कभी कोई कमी नहीं छोड़ी ,ग़ज़ल को रामपुर की फ़जां बड़ी रास आई। यहाँ की ख़ूबसूरत आबो-हवा की वजह से ही ग़ालिब ,दाग़ और अमीर मिनाई भी यहाँ सुकून फरमाने आये थे। तब से लेकर आज तक रामपुर अदब का मरकज़ बना हुआ है। कहने को तो रामपुर अपने चाकुओं के लिए मशहूर है मगर जब शाइरी का ज़िक्र आता है तो ग़ज़ल का ताजमहल बनानेवाले एक मंझे हुए कारीगर का भी ज़िक्र होता है, जिसे शाइरी की दुनिया में ताहिर फ़राज़ के नाम से जाना जाता है।

ग़ज़ल की न जाने कितनी ख़ूबसूरत इमारतें इस कारीगर ने बनायी है। आप ताहिर फ़राज़ की इस कारीगिरी से मुख़ातिब उनकी एक ग़ज़ल के इन शे'रों के हवाले से हो सकते हैं :-

डाल देगा हलाकत में इक दिन तुझे

परिंदे तेरा ,शाख़ पर बोलना

पहले कुछ दूर तक साथ चलके परख

फिर मुझे हमसफ़र ,हमसफ़र बोलना

उम्रभर को मुझे बेसदा कर गया

तेरा एक बार मुँह फेरकर बोलना

ताहिर फ़राज़ यानी इन्तख़ाब हुसैन का जन्म शाइर शाकिर फ़राज़ साहब के यहाँ शकील बदायूनी के शहर बदायूं में 29 जून 1953 में हुआ । अपनी शुरूआती तालीम इन्होने बदायूं से ही पूरी की। 7 -8 बरस की उम्र से ही ताहिर फ़राज़ अपने वालिद के साथ नशिस्तों में जाने लगे वहाँ वे अपने वालिद की ग़ज़लों को तरन्नुम में पढ़ते थे और यहीं से उनके कान बहर नाम की शय से वाकिफ़ हो गये। जब ताहिर साहब 14 बरस के थे तो उन्होंने मुकमल ग़ज़ल कह दी , उनकी पहली ग़ज़ल के मतले और शे'र से आप उनके शाइरी के इब्तिदाई तेवर का अन्दाज़ा लगा सकते हैं :--

थे जो अपने हुए वो पराये

रंग किस्मत ने ऐसे दिखाये

हम जो मोती किसी हार के थे

ऐसे बिखरे के फिर जुड़ पाये

ताहिर साहब का ननिहाल रामपुर था सो इंटर करने के बाद ये रामपुर आ गये और जिस तरह ग़ज़ल का दिल रामपुर में लगता है उसी तरह ताहिर साहब भी रामपुर के ही हो कर रह गये। रामपुर में इन्हें डॉ.शौक़ "असरी" रामपुरी और दिवाकर राही साहब की सोहबत नसीब हुई और वक़्त के साथ -साथ ताहिर फ़राज़ ग़ज़ल के तमाम पेचो-ख़म से वाकिफ़ हो गये। आज के दौर में उस्ताद - शागिर्द की रिवायत का चराग भी तक़रीबन बुझ सा गया है मगर ताहिर फ़राज़ इस मामले में नसीब वाले रहे कि उन्हें डॉ. शौक़ असरी जैसे काबिल उस्ताद मिले। सत्तर के दशक के आख़िर तक आते - आते ताहिर फ़राज़ शाइरी की दुनिया के एक मोतबर नाम हो गये। शाइरी के साथ - साथ उन्होंने अपनी आगे की तालीम भी जारी रखी और रूहेलखंड यूनिवर्सिटी ,बरेली से एम्.ए उर्दू में किया।

ग़ालिब और मीर शाइरी के वो बरगद है जहाँ से हर शाइर अपना सफ़र शुरू करता है और जब ख़ुद को थका महसूस करता है तो चैन और राहत के लिए फिर से इन्ही के साये में कयाम करने आ जाता है। ताहिर फ़राज़ ने भी इन दोनों सायादार और समरदार दरख्तों के साये में बैठकर अपनी शाइरी की फ़िक्र को

गहराई से मिलवाया इसके अलावा इन्हें शुजा ख़ावर और बशीर बद्र की शाइरी ने भी मुतास्सिर किया। रवायत की माने तो औरत से और औरत के बारे में गुफ़्तगू करना ग़ज़ल है , फिर तो ताहिर फ़राज़ इस रिवायत को क्या ख़ूब निभाते हैं उनकी एक बड़ी मकबूल ग़ज़ल है उसके ये अशआर ज़रा गौर फरमाएं :-

जब भी वो पाकीज़ा दामन जाएगा हाथ मेरे

आँखों का ये मैला पानी गंगाजल हो जाएगा

जिस दिन उसकी जुल्फें उसके शानों पर खुल जाएगी

उस दिन शर्म से पानी -पानी ख़ुद बादल हो जाएगा

मिसरा ए उला और मिसरा ए सानी (किसी शे'र की पहली पंक्ति और दूसरी पंक्ति) में राब्ता कैसे कायम किया जाता है ,पहले मिसरे में दावा फिर दूसरे में किस तरह दलील दी जाती है और ना-उम्मीद को उम्मीद का दीदार इस तरह भी करवाया जा सकता है , इसी ग़ज़ल के इस शे'र में शाइर के इसी फ़न से आप रु-ब-रु हो सकते हैं :--

मत घबरा प्यासे दरिया सूरज आने वाला है

बर्फ़ पहाड़ों से पिघलेगी, जल ही जल हो जाएगा

ताहिर फ़राज़ की शाइरी जितनी काग़ज़ की ज़मीन में गहरी गड़ी हुई है उतनी ही मुशायरे के आसमान पे भी हमेशा बलंदियों पे नज़र आती है। किसी मुशायरे की कामयाबी का एक मूल मन्त्र ताहिर फ़राज़ भी है तरन्नुम में उन्हें सुनकर मुद्दतों की थकान तक मिटाई जा सकती है मुशायरे में ताहिर साहब तहत में ग़ज़ल पढ़ने लगते हैं तो सामईन उनसे तरन्नुम की फरमाईश करते हैं उनकी ये ग़ज़ल भी मक़बूलियत की तमाम हदें तोड़ चुकी है :--

हाथों में कशकोल ज़बां पे ताला है

अपने जीने का अंदाज़ निराला है

आहट सी महसूस हुई है आँखों को

शायद कोई आंसू आने वाला है

चाँद को जब से उलझाया है शाख़ों ने

पेड़ के नीचे बे-तरतीब उजाला है

साँसों की रफ़्तार बताती है "ताहिर "

जाने वाला लम्हा आनेवाला है

मुशायरों की निज़ामत का दूसरा नाम और शाइर जनाबे मंसूर उस्मानी की नज़र में ताहिर फ़राज़ की ग़ज़ल वहीं करीब से होकर गुज़रती है जहाँ से दिल में मुहब्बत के जज़बात फूटते हैं। ताहिर फ़राज़ की एक नज़्म "बहुत खूबसूरत हो तुम "के बारे में मंसूर साहब कहते हैं कि बहुत से मुहब्बत - नामे जो कि शब्द न मिलने के कारण अधूरे थे लोगों ने इस नज़्म का सहारा लेकर मुकमल कर लिए हैं। ताहिर फ़राज़ जब अपने कहन की डोर में लफ़्ज़ों के फूल पिरोते हैं तो ऐसी माला बनती है जिसे अपने गेसुओं में गजरा बनाके लगाने के लिए ग़ज़ल लालाइत हो उठती है। उनके ये अशआर ऐसे ही गजरे की मिसाल है :-

ग़म इसका कुछ नहीं है के मैं काम गया

ग़म ये है क़ातिलों में तेरा नाम गया

कुछ दोस्तों ने पूछा बताओ ग़ज़ल हैं क्या ?

बे-साख्ता लबों पे तेरा नाम गया

***

अपनी आँखों में जो वो बरको- शरर रखते हैं

हम भी सूरज को बुझाने का हुनर रखते हैं

***

जो शजर बेलिबास रहते हैं

उनके साये उदास रहते हैं

चंद लम्हात की ख़ुशी केलिए

लोग बरसों उदास रहते हैं

इतिफाक़न जो हँस लिए थे कभी

इन्तिकामन उदास रहते हैं

जिस तरह ताहिर फ़राज़ की नज़्म का सहारा लेकर बहुत से लोगों ने मुहब्बत के बैंक में अपना खाता खुलवाया है उसी तरह एक - तरफ़ा प्यार के जाल में उलझे दीवानों ने जब भी ताहिर फ़राज़ के इस क़ते को अपना गुज़ारिश - नामा बनाया उन्हें कामयाबी मिली और उनका महबूब भी फिर उसी जाल में उलझ गया। ये बात और है कि ताहिर फ़राज़ को इसका इस्तेमाल ख़ुद के लिए कभी नहीं करना पड़ा। ये गुज़ारिश नामा बतौर तोहफा मुलाहिज़ा हो :---

बाँध रखा है ज़हन में जो ख़याल ,

उसमे तरमीम क्यूँ नहीं करते

बे-सबब उलझनों में रहते हो,

मुझको तसलीम क्यूँ नहीं करते

( तरमीम -बदलाव )

एक ही पगडण्डी पे चलते -चलते कभी -कभी ग़ज़ल भी चाहती है कि मुझे कहने वाला कोई दूसरा रास्ता भी तो कभी अख्तियार करे , ग़ज़ल की इसी चाह को पूरा करने के लिए कुछ तो उसे ऐसी राह पे ले जाते हैं जहाँ जा कर ग़ज़ल को ख़ुद बड़ी शर्मिंदगी होती है मगर ताहिर फ़राज़ ग़ज़ल के इस सफ़र को रिवायत की हदों में रह कर इतना ख़ुशनुमा बना देते हैं कि ग़ज़ल ताहिर फ़राज़ की एहसानमंद हो जाती है। ग़ज़ल में उनके किये गये प्रयोग ये मशविरा भी देते हैं कि रिवायत को बस तरो-ताज़ा किया जाये यहाँ तक तो ठीक है बदलना कतई ग़ज़ल के हक़ में नहीं है।

नर्म बिस्तर की जगह ख़ुद को बिछा लेते हैं लोग

बाज़ुओं को मोड़कर तकिया बना लेते हैं लोग

ख़ुश -लिबासी के लिए सामान घर का बेचकर

हो कोई त्योहार तो इज़्ज़त बचा लेते हैं लोग

ठीक इसी राह पे छोटी बहर में ताहिर फ़राज़ की ये ग़ज़ल भी अपना सफ़र हिन्दुस्तान तो क्या उस से बाहर भी मुसलसल करती जा रही है :---

आप हमारे साथ नहीं

चलिए कोई बात नहीं

आप किसी के हो जांए

आप के बस की बात नहीं

हमको मिटाना मुश्किल है

सदियाँ है लम्हात नहीं

हिन्दुस्तान के नक़्शे में

शहर तो है देहात नहीं

किताब की शक्ल में ताहिर फ़राज़ का ग़ज़ल संग्रह "कशकोल " मंज़रे -आम पर 2004 में आया देव -नागरी पढ़ने वालों के लिए भी उनका एक मज़्मुआ -ए -क़लाम बहुत जल्द आने वाला है। जहाँ तक शाइरी की ख़िदमत की एवज़ में मिलने वाले इनामात का सवाल है ताहिर फ़राज़ ने अपने अंदाज़ में यूँ कहा है :--

जिनके काँधों पर होता है बोझ ज़मानों का

उनके पैरों में अक्सर ज़ंजीरें आती है

सारे मन्सब, सारे तमगे उनके हिस्से में

अपनी झोली में खाली तक़रीरें आती है

मगर ताहिर साहब की झोली में तक़रीरों के अलावा भी ख़ुदा ने बहुत कुछ दिया है। जिस रांझे को उसकी रूठी हुई हीर ताहिर साहब के शे'र या नज़्म का सहारा ले के मिल गई हो तो इससे बड़ा इन-आम ताहिर फ़राज़ के लिए क्या हो सकता है ,फिर भी ताहिर फ़राज़ को बहुत सी साहित्यिक संस्थाओं ने सम्मानित किया है ,जिसमे मीर अवार्ड , फिराक़ अवार्ड ,नज़ीर बनारसी अवार्ड , अमेरिका और बरतानिया की भी बहुत सी अदबी तंजीमों ने शाइरी की ख़िदमत के लिए इन्हें नवाज़ा है। ताहिर फ़राज़ की ग़ज़लों को हरिहरन, राजकुमार रिज़वी , असलम साबरी और इनके अलावा भी कई प्रतिष्ठित गायकों ने अपनी आवाज़ दी है। ताहिर फ़राज़ मानते हैं कि मुशायरे के मंच का वक़ार बना रहना चाहिए इसके लिए ज़िम्मेदारी शाइरों की भी है। वो सामईन को अच्छी शाइरी से रु-ब-रु करवाएं , सामईन की भी ये ज़िम्मेदारी है कि वो अपनी समाहतों के इम्तेहान में हमेशा अव्वल आये,उस शाइरी को नवाज़ें जो दाद की सही मायने में हक़दार हो और मुशायरे के आयोजकों का भी फ़र्ज़ है कि वे अदब नवाज़ लोगों के लिए ऐसा दस्तरखान बिछाएं कि फिर मेयारी शाइरी की शक्ल में सुनने वालों को लज़ीज़ और आला दर्जे के पकवान मिले। ताहिर फ़राज़ साहब के शाइरी की शक्ल में बनाए हुए कुछ लज़ीज़ पकवान आपकी नज़र :---

किसी का मशविरा उसकी समझ में क्या आये

जिसे पसंद हो नाग अपनी आस्तीनों के

दुखी छतों को संभाले हुए ज़ईफ़ मकान

है इंतज़ार में रूठे हुए मकीनों के

***********

अब इससे बढ़के सज़ा और क्या हमारी है

तेरे बगैर जो ये ज़िन्दगी गुज़ारी है

वैसे तो तनक़ीद (आलोचना/समीक्षा )ने भी इन दिनों अपना मेयार खो दिया है मगर ताहिर साहब का ये शे'र फिर से ये हिम्मत दिलाता है कि अगर आईने की माफ़िक तनक़ीद की जाय तो शाइरी का भी भला है ,शाइर का भी और तनक़ीद का भी :--

नज़र बचाके गुज़रते हो तो गुज़र जाओ

मैं आईना हूँ मेरी अपनी ज़िम्मेदारी है

शाइर जब मुसव्विर (चित्रकार) की तरह ग़ज़ल की तस्वीर बनाता है तो उसे अपने ख़याल के कैनवस पे लफ़्ज़ों के रंग उकेरने पड़ते हैं। ग़ज़ल की इस तस्वीर को दूसरी तस्वीरों से हटके बनाने के लिए उसे मुख्तलिफ़- मुख्तलिफ़ काफ़ियों के रंग भी ख़ुद ही इज़ाद करने पड़ते हैं। इस हुनर से ताहिर फ़राज़ को ख़ुदा ने क्या ख़ूब नवाज़ा है। उनकी बनाई एक ग़ज़ल की तस्वीर दिखाता हूँ :--

नज़र आऊं तो ढूंढें उचक - उचक के मुझे

हो सामना तो वो देखें झिझक -झिझक के मुझे

किसी भी वक़्त चमक सकता हूँ मैं एक पल को

कहीं गंवा नहीं देना पलक झपक के मुझे

मैं भागती हुई दुनिया की ज़द में जाऊँ

तेरा ख़याल खींचे अगर लपक के मुझे

मुशायरे की ये शौहरत भी ख़ूब होती है

पसंद करने लगे लोग अब सड़क के मुझे

यूँ तो बहर अपने आप में ग़ज़ल की लय होती है मगर ताहिर फ़राज़ चाहें किसी भी बहर में शे'र कहें उनके बरते हुए लफ़्ज़ अपने आप ऐसी ध्वनि निकालते हैं जैसे किसी मंझे हुए मोसिकार ने संतूर के तार छेड़ दिये हों। उनके ये अशआर देखें और महसूस करें वही ध्वनि :--

ज़िन्दगी तेरे तआकुब में हम

इतना चलते हैं की मर जाते हैं

याद करते नहीं जिस दिन तुझे हम

अपनी नज़रों से उतर जाते हैं

(तआकुब-पीछा )

***

वो सर भी काट देता तो होता ना कुछ मलाल

अफ़सोस ये है उसने मेरी बात काट दी

हालांकि हम मिले थे बड़ी मुद्दतों के बाद

औक़ात की कमी ने मुलाक़ात काट दी

ताहिर फ़राज़ हमारी रवायती शाइरी और जदीद शाइरी को बाँधने वाली एक रेशम की डोर का नाम है। ताहिर फ़राज़ जैसा लहजा मुद्दतों बाद किसी के हिस्से में आता है और जब ग़ज़ल इस लहजे के आग़ोश में आती है तो वो शरमा कर पर्दादारी की रस्म यूँ निभाती है कि आँखों से छिपकर सीधा दिल में आके बैठ जाती है। जब मुहब्बत में बेक़रारी का आलम हो और दिन के साथ - साथ रात भी भारी लगने लगे तो ताहिर फ़राज़ के क़लाम से गारंटी के साथ क़रार हासिल किया जा सकता है। कारी (पाठक) के ज़हन- ओ- दिल पे ताहिर फ़राज़ की ग़ज़ल की ज़रा सी दस्तक ख़ुशबू की बाद्क़श का एहसास करवाती है। ताहिर फ़राज़ साहब की शख्सीयत पे ये मज़मून पढ़ने के बाद आप इस बात से तो इतेफाक़ रखेंगे कि ताहिर फ़राज़ मोज़ू- ए- ज़िन्दगी पे एक मुकमल किताब है। आख़िर में इसी दुआ के साथ कि ताहिर फ़राज़ शाइरी को यूँ ही ओढ़ते / बिछाते रहें और अपने सुख़न की खुश्बू से फ़िज़ां को महकाते रहें।

मौत सच है ये बात अपनी जगह,

ज़िन्दगी का सिंगार करते रहो

नफ़ा - नुक्सान होता रहता है,

प्यार का कारोबार करते रहो

विजेंद्र शर्मा

vijendra.vijen@gmail.com

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