सोमवार, 30 अप्रैल 2012

प्रमोद भार्गव का आलेख - मई दिवस के अवसर पर : मजदूरों के एकीकरण से विस्‍थापन तक

जो मई दिवस दुनिया के मजदूरों के एक हो जाने के पर्याय से जुड़ा था, भूमण्‍डलीकरण और आर्थिक उदारवादी नीतियों के लागू होने के बाद वह किसान और म...

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य - मध्‍यावधि चुनावी बाजा और ढपली

आज कल हर कोई मध्‍यावधि चुनावों का बाजा बजा रहा है। हर हारा हुआ दल या नेता मध्‍यावधि चुनावों का बाजा आम चुनाव के तुरन्‍त बाद बजाने लग जाता ह...

मोहसिन खान की 2 लघुकथाएं

लघुकथा नींव जब खेत से मक्का और ज्वार की फसल की कटाई हो गई तो रघु ने शहर की राह ली, यह सोचकर कि खेत तो खाली हैं, शहर में चलकर मज़दूरी करके ...

हिमकर श्याम का व्यंग्य आलेख - शब्द ही सबकुछ है

शब्द ही सबकुछ है हिमकर श्याम शब्द क्या नहीं है? शब्द ही ब्रह्मा है, शब्द ही विष्णु है, शब्द ही शिव है, शब्द ही साक्षात् बह्म है, शब्द के ...

हिन्दी का गौरवशाली अध्यायः हिन्दी-विश्व गौरव-ग्रन्थ - कृष्ण कुमार यादव

हिन्दी का गौरवशाली अध्यायः हिन्दी-विश्व गौरव-ग्रन्थ - कृष्ण कुमार यादव डा0 राजेन्द्र नाथ मेहरोत्रा द्वारा संपादित हिन्दी-विश्व गौरव-ग्रन्थ (...

मोतीलाल की कविता

बहुत क्षण ऐसे आए जब आसमान मेँ तने ऐन सूरज के नीचे गुम हो गयी सारी पंक्तियाँ और तन गयी कोलतार सी नंगी देह ठीक जावाकुसुम की तरह विस्फा...

अखतर अली की दो लघुकथाएं

प्रेम कथा लड़के का नाम -  चुप लड़की का नाम - ख़ामोशी गाँव का मुखिया -शोर अंत                 - पारंपरिक   सत्य कथा एक आदमी के दो बेटे थे ,दो...

सुरेश कुमार 'सौरभ' के 21 हास्य दोहे

***************************** 1- खर्चा यदि बचाने की, तुझे लगी है चाह। करके नैना चार तू , करले प्रेम विवाह।। ***************************** 2-...

विश्वजीत सपन की ग़ज़ल - सुन हमारी कहानी ज़माना उफ़क़ पे खूँ लगा जा रहा था

एक ग़ज़ल ====== आज दिल जो जला जा रहा था आग उसमें उठा जा रहा था जिसने देखा तमाशा अजल का, ख़ाक में वो मिला जा रहा था फूल सब जल चुके थे ख़िज़ाँ ...

एस. के. पाण्डेय की लघुकथा - किस्मत

किस्मत रानू पार्क में बैठा हुआ एक बूढ़े से बात कर रहा था। वह इतनी ऊँची आवाज में बोल रहा था कि पार्क में आये हुए अन्य लोग उसे देखने व सुनने...

अतुल कुमार रस्तोगी की कविताएँ

1. क्या करें, इस फ़िक्र में भगवान बैठे हैं क्या करें, इस फ़िक्र में भगवान बैठे हैं। क्या बनाया, क्या बने इंसान बैठे हैं।   राम को करते भ्र...

प्रियंका सिंह का आलेख - किशोरावस्था में विकास एवँ शिक्षा का महत्व

प्रियंका सिंह (शोधकर्ती) गृहविज्ञान संकाय , वनस्थली विद्यापीठ,टोंक (राजस्थान) बालक राष्ट्र कि धरोहर होते हैं। सुविख्यात अंग्रेजी कव...

धनंजय कुमार उपाध्याय “कर्णप्रिय” का व्यंग्य - मां की ममता लाजवाब

माँ की ममता लाजबाब (व्यंग्य) अपने सभी भाई-बहनों में मेरी नाक थोड़ी ज्यादा ही मोटी है. हंसने पर नाक के फुफकारने की सी फूल जाती है. मगर माँ की...

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य - कस्‍बे की अखबारी दुनिया

कस्‍बे की अखबारी दुनिया यशवन्‍त कोठारी कभी आपने सोचा है कि छोटे शहरों या कस्‍बों से निकलने अखबारों की असली समस्‍या क्‍या होती है मैंने इस स...

शशांक मिश्र भारती की कविता - अवरोध

अवरोध शशांक मिश्र भारती मैं- निरन्‍तर परिस्‍थितियों से लड़कर भी खड़ा हूं अपनी- मंजिल की तलाश में, सोचता हूं तोड़ दूं अपने- पथ के सभी अवर...

सरिता गर्ग की लघुकथा - सुबह का भूला

दोनों बस की सीट पर एकदम खामोश बैठे हुए थे। रमेश खुश था बहुत खुश। ऑटो मैं बैठकर चौपाटी जाकर आये थे वे लोग। भेलपुरी खायी थी बांहों मैं बाहें ...

विनायक पाण्डेय की कविता - मैं चला

                          मैं चला यूँ ही होता रहा दर से बदर मैं हर बार एक नया ठिकाना मिल गया गम तो बहुत दिए जिन्दगी ने लेकिन हमेशा हंसन...

अनुराग तिवारी की रचना - आओ मिल बैठ कर कुछ जि़न्‍दगी की बात करें। क्‍यूँ न हम आज इक नयी शुरुआत करें।

आओ मिल बैठ कर कुछ जि़न्‍दगी की बात करें। क्‍यूँ न हम आज इक नयी शुरुआत करें।   लड़ रहे हैं मुद्‌दत से मगर हुआ न कुछ हासिल, भुला कर गिले ...

शनिवार, 28 अप्रैल 2012

एक शख्सियत….... प्रो. वसीम बरेलवी : विजेंद्र शर्मा का आलेख

प्रो . वसीम बरेलवी उसूलों पर जहां आँच आये ,  टकराना ज़रूरी है जो ज़िन्दा हो, तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है एक शख्सियत …. ... प्रो ....

एक शख्सियत….....डॉ.तारिक़ क़मर : विजेंद्र शर्मा का आलेख

डॉ. तारिक़ क़मर सच बोलें तो घर में पत्थर आते हैं झूठ कहें तो ख़ुद पत्थर हो जाते हैं एक शख्सियत …. ....डॉ.तारिक़ क़मर शाइरी में सबसे मक...

एक शख्सियत…....ताहिर फ़राज़ : विजेंद्र शर्मा का आलेख

ताहिर फ़राज़ मैंने तो एक लाश की, दी थी ख़बर "फ़राज़" उलटा मुझी पे क़त्ल का इल्ज़ाम आ गया एक शख्सियत ….... ताहिर फ़राज़ ग़ज़...

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