सोमवार, 30 अप्रैल 2012

मोहसिन खान की 2 लघुकथाएं

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लघुकथा

नींव

जब खेत से मक्का और ज्वार की फसल की कटाई हो गई तो रघु ने शहर की राह ली, यह सोचकर कि खेत तो खाली हैं, शहर में चलकर मज़दूरी करके कुछ रुपये ही कमा लिए जाएँ । शाम को ही वह गाँव से शहर की ओर चल दिया ताकि सुबह से ही वह काम पर लग जाए । हर साल की तरह रात उसने प्लेटफ़ार्म पर ही कट ली सुबह ही वह शहर में बाज़ार के उस चौक पर पहुँच गया, जहाँ से मज़दूरों को मज़दूरी के लिए सौदा करके ले जाया जाता है ।

रघु को एक ठेकेदार नए मकान की नींव खोदने के लिए ले गया । उसके साथ और भी मज़दूर गए, रघु ने देखा कि एक साँवली सी लड़की भी है । जगह पर पहुँचकर नींव खोदने का काम प्रारम्भ हुआ, धीरे-धीरे सभी मज़दूरों में पहचान बनती गयी । शाम होते-होते तो सभी घुल–मिल गए । दिनभर में रघु की उस साँवली सी लड़की से कई बार आँखें दो-चार हुईं, रघु को उसकी दिल्लगी की मौन स्वीकृति का एहसास हो गया था ।

अगले दिन सुबह फिर सभी मज़दूर नींव खोदने उसी जगह पर एकत्रित हुए । रघु की आँखों में आज नई चमक थी और शरीर में इतना जोश कि लगता था कि वह आज नींव खोदते-खोदते धरती में आर-पार छेद बना देगा । सुबह से ही वह लोकगीत गाते हुए गर्मजोशी से काम करता जा रहा था और उस साँवली सी लड़की से कई बार आँखें दो-चार करता रहा । साँवली सी लड़की भी उसे अपनी सहमति देती रही, इसी सहमति से रघु ने उसके हाथों को तगारी देते हुए छुआ भी था और साँवली सी लड़की ने कई बार शरमा भी दिया था । शाम होते तो एकांत देखकर रघु ने उसका हाथ भी पकड़ लिया, साँवली सी लड़की कुछ न बोली थी ।

अगले दिन दोनों में कुछ और नज़दीकियाँ तथा छेड़खानियाँ बढ़ गईं और जोश भी । जब शाम हुई और मज़दूर अपने काम से छूटे तो साँवली सी लड़की अपने परिवार के साथ चल दी । रघु भी अपने ठिकाने चल दिया । अगले दिन सुबह रघु उसी जोश और ऊर्जा से कार्य करने लगा, लेकिन उस साँवली सी लड़की ने आज उसके प्रति उदासीनता दिखाई । कई बार रघु ने उसे छेड़ा भी, उसने कोई प्रत्युत्तर न दिया, हाथ भी पकड़ा तो उसने झटक दिया । रघु बुझे दिल से काम कने लगा उसे दिन अब बहुत भारी पड़ने लगा । वह कारण खोजने लगा आखिर क्यूँ वह ऐसा कर रही है ? शाम हुई मज़दूरों ने अपनी राह ली तो रघु साँवली सी लड़की को ही जाते देख रहा था, साँवली सी लड़की ने भी जाते-जाते रघु को देखा । रघु नाह-धोकर साँवली सी लड़की के ठिकाने की ओर गया तो उसने देखा, वह साँवली सी लड़की ठेकेदार से हँस-हँस कर बात कर रही है । रघु से बर्दाश्त न हुआ, वह वहाँ से चलने लगा तो रास्ते में बोर्ड लगा था ‘देसी दारू की दुकान’ वह वहीं रुक गया ।

लघुकथा

आज चौथा दिन है !

कई वर्षों की कठोर तपस्या करने के बाद छोटे से कस्बे का एक सामान्य सा विद्यार्थी दिनेश तिवारी का डिप्टी कलेक्टर का स्वप्न पूरा हुआ । जब जॉइनिंग के तीन दिन पूरे हुए और सारी प्रक्रिया पूरी हुई तो अपनी उत्सुकता पूर्ण करने के लिए अपनी सबसे प्रिय अध्यापिका को उसने हर बार की तरह एस.एम.एस. किया कि “मैं अब डिप्टी कलेक्टर बन गया हूँ, आज चार दिन हो गए हैं - आपका दिनेश ।” दिनेश ने सोचा था कि मैडम खुशी के मारे से तुरंत कॉल करेंगीं, परंतु बहुत देर प्रतीक्षा करने के बाद भी मैडम का कोई फोन नहीं आया तो स्वयं दिनेश ने फोन लगाया “हेलो, मैडम”, “हाँ दिनेश मैं कविता बोल रही हूँ ।” “दीदी नमस्ते ! आप कब आईं ।”, “अभी दो-तीन दिन पहले, और तुम कैसे हो ?” “जी अच्छा हूँ । मैडम को एक ख़ुशख़बरी देना है, मैडम को फोन दीजिये न ।” “दिनेश मैडम तो अब नहीं रहीं उनका देहांत अभी तीन दिन पहले हो गया । आज चौथा दिन है । मुझे याद ही नहीं आया कि मैं तुम्हें बताऊँ, यह सबकुछ अचानक ही हो गया ।”

डॉ. मोहसिन ख़ान

(वरिष्ठ प्राध्यापक-हिन्दी)

जे. एस. एम. महाविद्यालय,

अलीबाग – जिला-रायगड़

(महाराष्ट्र) पिन – 402201

मोबाइल – 09860657970

1 blogger-facebook:

  1. बेनामी11:39 pm

    zindgi ko bahut nazdeek se dekhti, ya yun kahe pathko ko zindgi k ek kadwe pahlu(jo isi zindgi ka hissa hai) se rubaru karwati dono kathaye, kathakaar ki zindgi par pakad ko rekhankit karti hai....sundar rachna,dard ka maarmik chitran...bahut khoob, mohsin !

    उत्तर देंहटाएं

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