सोमवार, 9 अप्रैल 2012

निरुपमा कपूर की 3 कविताएँ

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1-आतंक

हर तरफ फैले पड़े हैं

जज्बात और हैवानियत

क्यों इस तरह बरपा है क़हर

हर इसान बदहवास- सा है

शहर का हर रास्ता बंद है लाशों से

मंदिर की घंटियाँ दब गई, चीखों में

मस्जिद की अजाने थम गईं, आँसुओं में

जहाँ कल खड़ी थी ज़िन्दगी

आज पडी थी मौत

क्यों कुछ इंसान तब्दील हो जाते हैं

हैवानों में

-0-

 

2-जख्म

आपने देखा है किसी हिरनी को

बाघ के मुँह में तड़पते हुए, सिसकते हुए

उसके घावों को आँसुओं को

तन पर पड़ी खरोंचों को

पहली बार नहीं है ये

उससे पहले कोई और थी

बाघ के मुँह मे

सदियों से चला आ रहा है

यातना का यह क्रम

काश, उसके पास भी होते नुकीले

दाँत और नाखून

देती जबाव उसको,

घायल होता वो तो पता लगता -

किस कदर चुमते हैं

नुकीले दाँत और नाखून

-0-

 

3-बेबसी-

हर पल समझौते ही लिखे हैं जीवन में शायद

कभी भी अपना फैसला नहीं ले पाती

चाहे मै कविता हूँ या राधा हूँ

पर उनकी आज्ञा बिना हिल भी नहीं पाती

जीवन अपना ,पर फैसले दूसरो के हर पल

रुलाती है मुझको मेरी बेबसी, हर पल

क्यों नही मुझको भी मिला मुट्ठी भर आसमान

उड़ने से पहले ही कतर दिये मेरे पंख

तुम्हारी चालबाजियाँ भी न देख पाई मैं नादान

उसने तो बराबर दिया था पर तुमने ही

छीन लिया मेरा आसमान

--

(निरुपमा कपूर)

nrpmkapoor325@gmail.com

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