शनिवार, 7 अप्रैल 2012

रोहित रूसिया की 5 कविताएँ

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१.    मंजिल ...
बदहवास सी
भागती जा रही है
भीड़ ...
आगे-पीछे
दांयें –बाएं
आजू – बाजू
पूरब –पश्चिम
उत्तर-दक्षिण
भागती जा रही
है
बस ..

ठहरती है
एक पल को
लाल बत्ती के साथ
देखती है
संवेदनाशून्य
नज़रों से
अपने आसपास
कि
शामिल है
कौन-कौन
उसके साथ
इस अंधी दौड़ में

दूसरे ही पल
फिर
दौड़ने लगती है
हरी बत्ती
के
इशारे पर..
इसी तरह
बस
भागते देख रहा हूँ
मैं
भीड़ को...
मैंने
अबतक
किसी को
कहीं भी
पहुँचते हुए
नहीं देखा |

 


२.    प्रेम कविता
जब मिले
हम दोनों
में से
किसी ने
कुछ भी नहीं कहा

तुम आई
बहने लगा झरना
तुम मुस्कुराईं
खिल गए
सारे फूल...
मैं
चुपचाप .....
महसूस
करता रहा
बसंत...
अपने भीतर

 


३.    ‘’ तुम्हारी एक ना ‘’
तुम्हारी
एक ‘’ना’’
के पीछे
निकालने बैठ जाता हूँ
सभी
अच्छे – बुरे कारण
जबकि
जानता भी नहीं
सही –सही वजह
इस ‘’ ना ‘’ के
पीछे की ...
पर इतना तो सच है
कि
तुम्हारी एक ‘’ ना ‘’
दे जाती है मुझे
एक पुख्ता कारण
हमारे बीच गुज़रे
सभी
अच्छे-बुरे क्षणों को
स्मृतियों के
रुपहले आकाश
पर दोहराने का |

 


४. चलो
चलो
चलकर बैठे हैं
इत्मीनान से
कहीं
करते हैं बातें
दुनिया – जहान की
इन
फुर्सत के क्षणों में..

चलो
आज के लिए ही सही
उडा देते हैं
अपने-अपने
अहं के
परिंदों को
इन
खुले
आसमानों के
बीच |

 

 

५  यादें
सहेज लेना
चाहता हूँ
अपने पिता की
तस्वीर
के साथ – साथ
थोडा सा धन
और
कुछ गेहूं की बालियाँ
कि
भरपूर 
हाईब्रीड के ज़माने
में भी
मेरी आने वाली पीढियां
महसूस कर सकें
अपनी
जड़ों
की 
महक |

 

रोहित रूसिया
५८८,
पंचशील नगर
छिन्दवाड़ा  [ म. प्र   ]
४८०००१

6 blogger-facebook:

  1. बहुत सुन्दर .....
    दूसरी कविता बहुत अच्छी लगी

    उत्तर देंहटाएं
  2. Bahut achha prayas .
    Kuch purani yaden taja ho gayi.
    Likht likhte aur painapan aa jaega.
    Goodluck.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. गोवर्धन यादव11:47 am

      रचनाओं ने काफ़ी प्रभावित किया.रचनाएं ठीक ऐसी ही होनी भी चाहिए जो सीधे दिल में उतरते हुए अपना मंतव्य कह जाएं,बधाई.

      हटाएं
  3. गोवर्धन यदव.8:18 pm

    रचनाएं पढ कर आनन्द आ गया. इतनी सरल भाषा मे रची गई रचनाएं जो सीधे दिल में उतर जाती है. अच्छी रचनाओं के लिए बधाइयां

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुवर्णा8:36 pm

    बहुत सुन्दर रचनाएँ. बधाई. दूसरी एवम अंतिम रचना बहुत ही सुन्दर है. पहली यथार्थ परक और सोचने पर मजबूर करती है कि आपाधापी के इस युग मे हम आखिर पहुँचना कहाँ चाहते हैं.

    उत्तर देंहटाएं

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