बुधवार, 4 अप्रैल 2012

अतुल कुमार रस्तोगी की 8 कविताएँ

अतुल कुमार रस्तोगी

1. सुप्त अँधेरे के आँगन में

अँधियारी तन्हाई ओढ़े कहाँ चली तू बोझिल रात
मैं भी इस पथ तन्हा हूँ आ बैठ करें कुछ मन की बात
दिन भर तो मैं रहा खोजता एक अदद साथी का साथ
थककर हारा सब उजियारा चूर-चूर जो था निष्णात।

नहीं जानता कैसे बीता भोरकाल का बचपन कल
फुदक-फुदक कर जैसे चिड़ियाँ चीं-चीं करती चिहुँक चुहल
किलकारी, पिचकारी, झूले, हँसी, खिलौने, खेल सरल
पंख लगाकर दूर उड़ गए छुई-मुई से कोमल पल।

दोपहरी की आग हरी थी मदमाई ज्वाला हर-हर
नींद भरी थी, सपने उज्ज्वल, मन-सागर उत्ताल लहर
इद्रधनुष था रंगबिरंगा यौवन का प्रसाद मधुकर
शिखर बिखर कर बीता वह मृदु सीकर पीकर जी भर कर।

सुस्त साँझ में स्वप्न शून्य थे, चिंतन के आगार विकट
हाथों से फिसले उजियारा अँधियारे ने दी आहट
इसका उसका तेरा मेरा सबके जी की घबराहट
थका चुका तिनका हर बुनता चुनता पल-पल साँस सिमट।

दीप जलाकर बैठा हूँ इस सुप्त अँधेरे के आँगन में
ढूँढ रहा धड़कन की आहट भागम-भागी जगमग जग में
जग का जगमग प्यारा है पर साथ नहीं साथी जग मग में
चलाचली की बेला है मधु प्रियतम है बैठा दूर गगन में।


2. फूल

तन सुन्दर मन सुन्दर मन में परसुख की अभिलाषा,
पल-पल में खिल-खिल कर बोए नव जीवन की आशा,
जब-जब हवा थपेड़े मारे उसमें भरे पराग,
मंदिर में श्रद्धा बन जाए पुष्प चिता की आग,
खुशी जन्म की, पूजा-अक्षत और प्यार की सेज,
आदर, अलंकरण, अभिनन्दन, अंतरंग रंगरेज,
चार दिनों में चार पंख की उड़ जाएगी काया,
मधु वसंत का इक क्षण जीकर मोक्ष माँगने आया ।

3. सर्प

कैसे सर्प हो ?
सर्प होकर भी
आश्रित हो
चूहों के बिल पर;
तुम्हारे पास तो
विष है,
चाहे किसी को डस सकते हो
किसी के भी गले में
मृत्यु का फंदा कस सकते हो
फिर क्यूँकर हो रेंगते ?


4 एक सुबह

सविता की कविता मुस्काई सु-मन सुमन नव एक सुबह।
सूरज की रज आँगन में सज जगमग-जगमग एक सुबह।
पलकों में सपनों की ऊर्जा देह नेह के मेह भरे
सारा जग आकाश हो गया छू उजास की एक सुबह।
चहल-पहल, कलरव खग करते जीवन का आभास जगा
हलचल मग में, जीवन जग में भर कर लाई एक सुबह।
शिविर तिमिर का त्याग सृष्टि की दृष्टि कुलाँचें भरती है
सबसे मिलती, सब पर खिलती निश्छल उज्ज्वल एक सुबह।
धड़कन-धड़कन धूप धवल कल, छूती जाती घर आँगन
सुख मुख पर मल, जल-सी निर्मल कल-कल करती एक सुबह।

5. माँ-1
ममता के कोष-सी माँ
स्नेह के उद्घोष-सी माँ।

ताप में, धूप में,
जीवन विद्रूप में
निर्मल शीतल ओस-सी माँ।

दूरियों में, निर्जनों में
रिक्त पथ में, दुर्वनों में
निश्छल मृदु आगोश-सी माँ।

जलधि-सी जलद-सी,
उर्मि-सी, मृदु-सी,
रुद्र कभी, कभी आशुतोष-सी माँ।

गंगा-सी पुण्यमयी, कल-कल
गोमुखी मंदाकिनी-सी निश्छल
दयामयी, सुखदायिनी मोक्ष-सी माँ।

हरी-भरी हरियाली-सी
अन्नपूर्ण खुशहाली-सी
तृष्णा में, क्षुधा में तोष-सी माँ।

अश्रु पी, पर कष्ट जी
प्रीत-पगी सृष्टि-सी
मधुर-मधुर, जीवन के घोष-सी माँ।


6. माँ-2
मंदिर के दीपक-सी
जलती और पिघलती
आशीषी ऊर्जा के सत् मस्तक पर धरती
तन-मन में जीवन में
केवल स्नेह सँजोए
तप-तपकर दिनकर-प्रकाश से पावन करती।

प्रीत-पुण्य-पय पिला
प्राण में भर स्पंदन
कर जीवन प्रभात प्रभात जीवन में भरती
स्नेह-सिक्त स्पर्श
सूर्य-सी ऊर्जा भरते
मन में, हृद में, श्वास-श्वास में संस्कृति भरती।


7. विभक्ति

एक थे हम
अक्षर-से
बने हम संधि
फिर कैसे बने समास
विग्रह-प्रणीत
निर्दयी निखिल ने
उसका भी विग्रह कर डाला
कर्ता एवं कर्म रूप में
तुमको...., मैने........!
को...., ने....., को....., ने.......,
पिला दिया
पिघले सीसे-सा
और हमारा मिलन
नियति का दास हो गया ।
दूरी इतनी बढ़ी कि
हमारे बीच से
शनैः - शनैः
लोप हो गईं
क्रियाएँ, विशेषण
और विभक्तियाँ तक ।


8. दीपक गीत

दीपक की लौ का ललित लास ।

चपला की चंचल अगन भरा,
शिर पर उजास का कुंभ धरा,
मद-मंद-कंप, रति-राग-रंग,
पद-थाप-मौन, रस-अधर-सुरा,
पथ-भ्रमित भ्रमर भूला निवास ।

तनुजा के तन की तान सरल,
आभा का तान वितान विरल,
मोहक थी भाव भंगिमा वर
हृत्पिण्ड लुट गया सजल सरल,
नर्तन-नितम्ब लख नयन-हास ।

स्वर-नूपुर मूक-मृदंग बजे,
वल्कल का स्वर्णिम रंग सजे,
मन-मोहक-मंथर-नृत्य-ताल
अंतर का अनल-अनंग जगे,
तप-तप निखरा कुन्तल प्रकाश ।

रचनाकार - अतुल कुमार रस्तोगी


मोबाईल : 09920565635
ई-मेल : atulkumarrastogi@yahoo.in
akrastogi@sidbi.in

4 blogger-facebook:

  1. अति सुन्दर............सारी कविताएं......

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. All poem are good thanks for sharing with us

      http://www.bigindianwedding.com/

      हटाएं
  2. umabhatt gadhwali12:07 pm

    ati sundarrrrrrrrrrrrrrrrrr

    उत्तर देंहटाएं
  3. umabhatt gadhwali12:08 pm

    ati sundarrrrrrrrrrrr

    उत्तर देंहटाएं

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