शनिवार, 7 अप्रैल 2012

एस. के. पाण्डेय की लघुकथा - भाग्य

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भाग्य

शांती रंजन बाबू के घर गई थी। वहाँ उसने देखा कि उनका बेटा पिल्ले को साबुन से नहला रहा है। वह खड़ी होकर देखती रही। साबुन की महक उसके नाक से टकरा रही थी। नहलाने के बाद उसने एक अच्छी रूमाल से पिल्ले का शरीर पोछकर सुखाया। फिर महकता हुआ कोई तेल लेकर आया और मालिश करने लगा। मालिश करने के बाद दूध लाया और पिल्ला पूँछ हिला-हिलाकर दूध पीने लगा।

यह सब देखकर वह रुआँसी सी हो गई। और वहाँ से भागकर अपने घर पहुँची और अपने सोते हुए बेटे को, जिसे चावल का धोवन पिलाकर घर से निकली थी, देखकर फूट-फूट कर रोने लगी। वह सोचती रही कि सुख-दुःख पूर्व जन्मों के कर्म यानी भाग्य से ही मिलता है। भाग्य से ही तो नीच योनि में जनमकर भी एक कुत्ता दूध पीकर जीता है और राजसी सुख भोगता है। और मनुष्य जैसे उच्च योनि में जनमकर भी मेरे बेटे को दुःख ही दुःख है तथा दूध तो दूर चावल का मांड भी मुश्किल से नसीब होता है।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.)।

URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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(चित्र - मीतूवर्मा की कलाकृति)

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