सोमवार, 9 अप्रैल 2012

शशांक मिश्र भारती की दो लघुकथाएँ

सबसे सुन्‍दर दृश्‍य

बहुत दिनों से फोटो ग्राफर के मन में बस एक ही धुन सवार थी। वह अपने कैमरे में सबसे सुन्‍दर दृश्‍य उतारना चाहता था। यूं तो उसने कई रमणीय दृश्‍यों को अपने कैमरे में बन्‍द कर रखा था। फिर भी उसका मन और सुन्‍दर दृश्‍य की खोज में व्‍याकुल था। अपी इस खोज के लिए इस बार उसने बनारस के एक प्रसिद्ध मन्‍दिर को चुना। सुबह होते ही सीढ़ियों पर जाकर खड़ा हो गया॥ दर्शनों के लिए भक्‍तगण आते रहे और उसकी निगाहें प्रत्‍येक को तोलती रहीं।

पर ज्‍यों-ज्‍यों समय बीतता जा रहा था वह निराश होता जा रहा था। तभी वहां एक अधेड़ उम्र के सज्‍जन सफेद कुर्ता और धोती पहने हुए कार से उतरे। चेहरे से सौम्‍यता झलक रही थी। साफ-सुथरे कपड़ों को देखकर फोटोग्राफर ने उनकी सादगी और सज्‍जनता का अनुमान लगाया। उनके पीछे एक बूढ़ा प्रसाद की थाली संभाले चल रहा था। देखने में वह उनका नौकर लग रहा था।

करीब पांच-छः मिनट वह देवप्रतिमा के सामने स्‍तुति करते रहे। फिर एक-एक कर प्रसाद बांटने लगे। सहसा उनकी दृष्‍टि एक मैले-कुचैले कपड़ों में लिपटे एक भिखारी पर पड़ी; जो याचना भरी दृष्‍टि से हाथ उनकी ओर बढ़ाये हुए था।

उसे देखते ही उनका हाथ ऊपर ही रुक गया और घृणा भरी दृष्‍टि से उसको देखते हुए प्रसाद उसके हाथ में डाल दिया तथा स्‍वयं राम-राम करते हुए अपनी कार की ओर बढ़ गये।

एक बार फिर फोटोग्राफर का मन निराशा से घिर गया। तभी उसे सड़क पर भीड़ दिखायी दी। वह तुरन्‍त वहां जा पहुंचा। उसने देखा कि एक आठ-दस बरस के बच्‍चे का एक्‍सीडेण्‍ट उन्‍हीं सज्‍जन की कार से हो गया है। बच्‍चे के दोनों पैर कुचल गए हैं। वह सड़क के बीचोबीच पड़ा है। कोई उसे उठाने वाला नहीं है; बल्‍कि सभी तमाशा देख रहे हैं।

तभी भीड़ को चीरता हुआ वही भिखारी आया और उस बच्‍चे को उठाकर सभी तमाशा देखने वालों से कहा-

‘शर्म की बात है तुम लोगों के लिए जो खड़े-खड़े तमाशा देख रहे हो? बच्‍चे के मरने-जीने की कोई परवाह नहीं। तुम लोगों में दया नाम की कोई चीज है। जो मनुष्‍य होकर भी मनुष्‍य की सेवा करना नहीं जानते?

तुम इसके कौन हो? जो इसकी मदद कर बेवजह संकट में पड़ना चाहते हो, भीड़ में एक सज्‍जन ने कहा।

भिखारी बोल- मैं एक इन्‍सान हूं और यह भी एक इन्‍सान है। मनुष्‍य की सेवा करना ही मनुष्‍य का धर्म एवं मानवता है।

तभी फाटोग्राफर ने मन में विचार किया कि इससे सुन्‍दर और रमणीय दृश्‍य कौन होगा और उसने अपने कैमरे को ठीक कर उस दृश्‍य को सदैव के लिए अपने कैमरे में बन्‍द कर लिया।

(लोकबोध पाक्षिक वाराणसी-01 से 15 मार्च 1992 पृ,05 एवं शब्‍दसामयिकी त्रैमासिक मार्च 2012 पृ..8 पर पूर्व प्रकाशित)

--

असली चोर

 

शेखर घर लौटा तो देखा कि उसका बेटा रोनी सूरत बनाये एक कोने में बैठा है।

शेखर ने उसकी मां से पूछा-क्‍या बात है?

‘‘आज इसने स्‍कूल में चोरी की है। इसलिए खाना-खेलना बन्‍द, रात तक ऐसे ही बैठेगा।‘‘ मां ने बताया।

‘‘ठीक है ये पैकेट अन्‍दर ले जाकर रख दो।'' आफिस से लाये हुए कार्बन और कागज के पैकेट देते हुए शेखर ने कहा।

यह सब देखकर उसका बेटा सोच रहा था कि असली चोर तो............।

-‘‘उपरोक्‍त लघुकथा मेरी अपनी नितान्‍त मौलिक, स्‍वरचित व शुभतारिका मासिक अप्रैल 2010 पृ.21 पर प्रकाशित है।''

सम्‍पर्कः-हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर-242401 0प्र0 9410985048

shashank.misra73@rediffmail.com

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------