सोमवार, 30 अप्रैल 2012

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य - कस्‍बे की अखबारी दुनिया

कस्‍बे की अखबारी दुनिया

यशवन्‍त कोठारी

कभी आपने सोचा है कि छोटे शहरों या कस्‍बों से निकलने अखबारों की असली समस्‍या क्‍या होती है मैंने इस सम्‍बन्‍ध में अपने कवि मित्र के साथ मिलकर अत्‍यन्‍त मौलिक चिन्‍तन किया है जिसे श्रीमान्‌ की सेवा में सादर प्रस्‍तुत करता हूं। कवि मित्र ने बताया कस्‍बे के अखबार में आप प्रधानमंत्री के खिलाफ लिख सकते है मगर इलाके थानेदार या एस․डी․ओ․ के खिलाफ नहीं लिख सकते। इसी प्रकार आप स्‍थानीय नेताओं, भू माफियाओं के खिलाफ भी नहीं लिख सकते। मैंने एक स्‍थानीय पत्र के सम्‍पादक से पूछा फिर आप क्‍या लिखते हैं, वे बोले हम अन्‍तरराष्ट्रीय समस्‍याओं पर राष्ट्रीय नीतियों पर लिखते रहते हैं। और जरुरत पडने पर कुछ पीले हो जाते हैं। वैसे पीत पत्रकारिता में भी दम है। पेडन्‍यूज, एडवेटोरियल, रिटर्न गिफट, इम्‍पेक्‍ट फीचर आदि से भी पेट भर जाता है। एक ही स्‍थान पर कई मास्‍ट हेड से अखबार छप जाते हैं।

विज्ञापनों के सहारे ये सब चलता रहता है। ये छोटे कस्‍बों के बड़े अखबार कभी कभी बड़े आतंक कायम कर देते हैं और ये आंतकी खबरे कस्‍बों-गांवो और आस पास के क्षेत्रों में बम बारी करती रहती हैं। अखबार निकलता रहता है सम्‍पादक ने मुझे समझाया जिला कलक्‍टर के खिलाफ लिखने की हिम्‍मत कोई सम्‍पादक नहीं कर सकता क्‍योंकि अखबार का पंजीकरण कभी भी निलम्‍बित हो सकता है। जन सम्‍पर्क अधिकारी की बिटिया की शादी में लिफाफा देने से विज्ञापन बिल समय पर पास होते रहते हैं।

कस्‍बे का पत्रकार जानता है कि खुद को और अखबार को जीवित रखना कितना मुश्‍किल काम है। कभी भी अफसर, माफिया, छुटभैये नेता, युवा कार्यकर्ता, प्रेस-अखबार और मालिक सभी को सूली पर टांग देते हैं। कस्‍बे का निर्भीक पत्रकार जान हथेली पर रखकर रिपोर्टिंग करते करते मर जाता है मगर किसी के कान पर जूं नहीं रेंगती। हाँ ये भी सच है कि कस्‍बे का पत्रकार पीली नीली और लाल पत्रकारिता के सहारे रोटी खाता है या अपने स्‍टाफ के बच्‍चों का पेट पालते पालते कभी भी मौत का शिकार हो जाता है।

पत्रकारों की मजबूरियों-समझोतो पर किताबे लिखी जा सकती है और लिखी गई है। पत्रकार कस्‍बा स्‍तरीय व्‍यावसायिकता के सहारे कस्‍बे में पत्रकारिता करता है और जीवन भर खुद भी शापित होता है और दूसरों का भी शोपण करता है। फिर भी अपनी रीफिल-कागज-प्रेस लेकर प्रजातन्‍त्र के लिए लड़ता है। और हो जाता है- एक बीमार, उदास, अप्रकाशित अलिखित समाचार की तरह। वो दुनिया और व्‍यवस्‍था बदलने का सपना देखते देखते खुद बदल जाता है। व्‍यावहारिक हो जाता है और धीरे धीरे अपने बच्‍चे-पालने में व्‍यस्‍त हो जाता है। बेचारा छोटे कस्‍बे का बड़ा पत्रकार। करे तो क्‍या करे।

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यशवन्‍त कोठारी, 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर जयपुर - 2, फोन - 2670596

e-mail ID - ykkothari3@gmail़com

m--09414461207

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