बुधवार, 11 अप्रैल 2012

मीनाक्षी भालेराव के गीत

 
 
वादा
हम यूं ही वादा कर लेते हैं,
वो संजीदगी समझ लेते हैं !
ये उन की नादानगी नहीं तो क्या,
हुस्न पर यकीन कर लेते हैं !
पाकीजगी फनाह हो जाती हम जो,
मुहब्बत का इजहार कर बैठते !
हम जो जिगर पर चोट खाए हैं,
फिर कैसे औरो पर वार कर दें !
सुनाते हैं जो अपना गम औरों को ,
वो खुद को क्यों सरे आम करते हैं !
रहने दो पर्दा-नशीं पर्दा-दारों को,
दीदार करके क्यों बीमार होते हो !
जानशीन कहते है बस जुबानी,
जा पर कहाँ निसार करते हैं !
पलक झपकते ही हमें रुसवा कर,
गैरों से दिल लगा लेते हैं !

मशहूर
परवाना जल-जल कर भी शमा पर मरता है,
यही जज्बा शायद शमा को जलाये रखता है ! 
उस के हुस्न की तपिश का दीवाना जो है ,
जले बिना इश्क भी कहाँ  मशहूर होता है !
रात क्यों रात भर सिसकती है दीवानगी से,
चाँद कहाँ फिर भी उस के पहलू में रहता है ! 
कब्र पर यूँ तो हर कोई आंसू बहाता है,
पर हर कोई कहाँ जाँ निसार करता है !
आज जो तेरे काँधे पर सर रख कर रोया है,
रुसवाइयों से कल तुझे रूबरू वही कर देगा ! 
संभल जा के अभी भी तेरे पास मौका है,
कल हाथ मलमल कर रह जायेगा तू यहाँ !
 
तकदीर
  
क्यों बुलंद ना हो मेरी तकदीर की रेखाएं,
खुद मैंने मुफलिसी से लड़-लड़ के बनाई !
रंजो-गम की शाही से लिखी थी मेरी दास्ताँ,
खुदा से मैं छीन लाई कुछ पल ख़ुशी के !
मुस्कराहट से मत समझो के दिल घायल नहीं है ,
मैं सी लेती हूँ जो जख्म मुझे मिलते है अपनों से !
बहता है तो बहता रहे  लहू मेरे दर्दे जिगर से,
इस्तेमाल कर के शाही सा नई इबारत लिख दूंगी !
मेरी मुस्कराहट पर जमाना रश्क करता है,
फिर आंसू बहाकर क्यों मैं गुलजार गंवा दूं 1
 
 
मेरा आईना
मेरा  आइना मुझ से सवाल करता है,
मुझे पहचानने की बात करता है !
खुद आईने के न जाने कितने चेहरे हैं,
फिर क्यों हर चेहरे पर सवाल करता है,
मलाल उस को अपने वजूद का है,
वो दूसरों का वजूद पर सवाल करता है !
जिसकी नहीं है खुद की कोई पहचान,
वो दूसरों को पहचान पर सवाल  करता है !
हर कोई झांक लेता है आईने में जब-तब,
वो मुझसे मिलने वालों की बात करता है !
खुद तलाश  ले पहले खुद ही को तो अच्छा है,
मुझे को तलाशने की क्यों तू बात करता है !
 
रंजसार 
मैं रंजसार हूँ के छीन गया,
मुझ से मेरा चमन !
बन्दों से क्या मैं शिकवा करूं ,
ये रब का काम है !  
मैं----------------------------
पत्ती-पत्ती नोच डाली,
डाल-डाल से !
काँटों से क्या शिकवा करूं,
ये गुल का काम है !
मैं-------------------------
उजड़ी-उजड़ी सी ये जो,
दरो-दीवार !
आशिकों से क्या शिकवा करूं,
ये हमसफर का काम है !
मैं---------------------------
किश्ती जो डूबी किनारे पे आकर,
मंझदार से क्या शिकवा करूं !
ये साहिल का काम है,
मैं-------------------------------------

 
गुजारिश
गुजारिश है  के यूँ छुड़ा कर हाथ ना जाओ,
रुक जाओ के बस, बात ये एक रात की है !
जब बरसती है शबनम,
मखमली बाहें तरसती है !
ये तन्हाईयाँ हमें डसती है
है-----------------------------
शब रहने तक ठहर जाओ,
सुनी-सुनी सी ये चादर !
सलवटों को तरसती है
है----------------------------
सुर्ख होठों पर मचलती शोखियाँ
लबों-से लबों को,
मिलाने को तरसती है !
है-----------------------------
यूँ ही गुजर जाये ना उम्र
मुहब्बत में बदनाम होकर
मरने को तरसती है
है-----------------------------
इल्म
इल्म गर मुझको जरा भी होता,
मुहब्बत में फंसाने जरूरी है !
मरते दम तक मै,
इजहारे मुहब्बत ना करती !
जागे हुये भी ख्वाबों की,
खलिस सी रहती है !
मैं अपनी नींदों का,
सौदा ना करती !
इल्म--------------------------------
हर सहर मुझ से मेरे,
होने का जिक्र करती है !
मैं हर बार उन का,
होने का दम भरती हूँ !
इल्म----------------------------------
दिन मुरादों की और,
रातें सुकूं भरी होती ! 
मैं यूँ गर तन्हाइयों से,
सिसकने का वादा ना करती !
इल्म------------------------------------
 
रूह
जिस्म का लिबास बदल कर,
क्यों फिरता है बशर तू !
है हकीकत में जो खुदा का बन्दा तू,
रूह का लिबास बदल कर देख जरा !  
कर भला औरों का कुछ अपना भी
है गर बेशकीमती खजाना जो पास तेरे
क्यों लुटाता फिरता है रकीबों में
जो जिस्म और मन से अपाहिज है
उन को कुछ नजराना दे दे
फिर देख तेरी रूह को सकूं
खुदा, खुद-ब-खुद बक्शेगा
 
रुखसत
यूँ ही रुखसत हो जाने में क्या मजा है
कर  कुछ ऐसा नाज तुझ पर जमाना करे
सुन अपनी रूह की जमाने की
सुनने में क्या मजा है
नाम तेरा सब की जुबान पर रहे
बेनाम मर जाने में क्या मजा है
मुफ़लिसों से रिश्ता निभाना  हमेशा
दौलतमंदों  से रिश्ता निभाने में क्या मजा है
जुबान से कर मर्ज दूर मरीजों का
नब्ज देख कर दवा देने में क्या मजा है
हम बंदे है बंदे  बने रहें खुदा के
शैतान की औलाद बनने में क्या मजा है

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