अर्जुन राठौर की कविता - पहाड़

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पहाड़

हाड़ सदियों से खड़े हैं 

अपनी जगह एक जैसे 

पहाड़ कभी भी रातों रात 

खड़े नहीं होते / पहाड़ों के पहाड़ 

बनने के पीछे एक लम्बा सिलसिला होता है 

जिस तरह से पहाड़ एकाएक नहीं बनते / ठीक 

डसी तरह पहाड़ों से लगी खाई भी एकाएक 

खाई नहीं बनती / पहाड़ और खाई एक दूसरे के

पूरक होते हैं / खाई के बिना किसी पहाड़ के बारे 

में सोचा भी नहीं जा सकता 

पहाड़ अपनी उंचाई पर गर्व करते हैं 

पहाड़ों का यह गर्व / पीढ़ी दर पीढ़ी 

कायम रहता है / पहाड़ अपनी ओर से 

कुछ नहीं बोलते / कुछ नहीं करते 

वे तो बस खड़े रहते हैं 

अविचल/अपनी जगह/ एक जैसे 

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