मोतीलाल की कविता

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बहुत क्षण ऐसे आए 
जब आसमान मेँ तने
ऐन सूरज के नीचे
गुम हो गयी सारी पंक्तियाँ
और तन गयी
कोलतार सी नंगी देह
ठीक जावाकुसुम की तरह

विस्फारित खुली आँखोँ मेँ
अंदर की आवरगी
नहीँ छूटी थी
और लाख चाहने पर भी
लालटेन जला ही नहीँ था
दोपहर की शाखोँ से टकराते
नंगे पैर
धूप से जलते रहे
और फागुन के गीत
उन होँठोँ मेँ
आया ही नहीँ
जहाँ देह के पसीने
हथेली मेँ बंद हो गये थे

अपनी जगह के लिए
कभी-कभी तो
न चाहते हुए भी
चप्पे-चप्पे धूप खिल जाते हैँ
और राहत कार्योँ की गिट्टियाँ
रोटी के मूक प्रश्न मेँ
हथेली मेँ आ जाते हैँ ।

* मोतीलाल/राउरकेला

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1 टिप्पणी "मोतीलाल की कविता"

  1. खुबसूरत अल्फाजों में पिरोये जज़्बात....शानदार |

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