बुधवार, 18 अप्रैल 2012

एस. के. पाण्डेय की लघुकथा - तमन्ना

तमन्ना

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एक शहर में एक टीवी चैनेल के कुछ लोग आने वाले थे। लोगों में काफी उत्साह था। सोहनी सुबह से ही सज-धज रही थी। उसकी मम्मी ने कहा कि तुम्हें वहाँ नहीं जाना है। वह बोली कि मम्मी मैं जरूर जाऊँगी। हमारी कई सहेलियाँ भी तो जा रही हैं। सोमी, सोनी आदि कई बार फोन भी कर चुकी हैं। उसकी मम्मी ने कहा ठीक है। चली जाना। लेकिन बाबू जी के घर लौटने के पहले वापस आ जाना।

चैनल वाले आ गए। लोगों से उनकी समस्याएँ पूछ कर रिकार्ड करने लगे। वह सोच रही थी कि कैमरा मैन मेरे पास कब आएगा। कहीं ऐसा न हो कि वह यहाँ आये ही न। और हमें मौका ही न मिले। यह सोचते ही वह भीड़ की ओर बढ़ने लगी। किसी की एक न सुनी। और भीड़ में कैमरा मैन के पास पहुँचकर उसने अपना घाघरा ऊपर उठा दिया। कुछ लोग तो भौचक रह गए। महिलाएँ कहने लगीं कि यह पागल हो गई है। इसने अपने घर-खानदान की नाक कटा दी। इज्जत गवां दी।

सोहनी ने वहीं भीड़ में ही चिल्लाकर कहा कि कोई किसी हीरोइन को कुछ नहीं कहता। न उसके घर वाले और न यह समाज। हीरोइन की इज्जत नहीं जाती। उन्हें तो पुरस्कार दिया जाता है। मैं बहुत खुश हूँ। क्योंकि हीरोइन बनने की हमारी भी बहुत बड़ी तम्मना थी। आज वह भी पूरी हो गई।

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.)।

URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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