मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

मालिनी गौतम की कविता - उजाले की तलाश में

उजाले की तलाश में

वे सदियों बैठे रहे

अँधेरी गुफाओं में

अपने आदर्शों और आस्थाओं का

सिंहासन जमाये

सूरज रोज दस्तक देता रहा

उनके दरवाजे पर

फिर निराश हो कर चल दिया

किसी और गुफा की तलाश में

कभी-कभी छोटे-छोटे बच्चे

हाथों में भर-भर कर

लाते रहे उजाले को

पर अन्धेरे ने पोत दी कालिख

उनके नन्हें हाथों पर

उजाला करवट लेता रहा

अँधेरे में दफन सुबह की कोख में

पर हर बार कत्ल हो गया

जनम लेने से पहले

सर्द हवाएँ चीखती रहीं रात भर

अँधेरा नाचता रहा

सुबह की कब्र पर

कुछ पल के लिये ही सही

चाँद भी जला न सका दीया

मज़ारों पर

तब उस गुफा की औरतें उठीं

जिस्म की मिट्टी को गला कर

दीये बनाये,

अपने दर्द को निचोड़कर

तेल भरने लगीं,

बाती बनकर खुद ही जलने लगीं

अब अँधेरा दम तोड़ रहा है

आदर्श और आस्थाओं के

सिंहासन पर !

--

डॉ मालिनी गौतम

गुजरात

3 blogger-facebook:

  1. उजाले का जन्म होता ही है, अंधेरे की कोख से। सुंदर कविता

    उत्तर देंहटाएं
  2. khud ko jalaakar roshan karti hain mahfilon ko
    ....bahut sundar bhaav umda rachna.badhaai aapko.

    उत्तर देंहटाएं
  3. धन्यवाद दीपिका रानी जी एवं राजेश कुमारी जी .

    उत्तर देंहटाएं

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