शनिवार, 14 अप्रैल 2012

सुरेश रघुनाथ पित्रे की कविता - प्रकृति देती है एक ही धचका


|| प्रकृती देती है एक ही धचका ||


कुदरत जभी तक उदार है |
मानव को सृष्टि का आधार है |
मानव तू कितना लूटेगा |
कितने पेड़ तू काटेगा ? ||१||

साँस तुमही तो लेता है |
पेड़ हमें प्राणवायु देता है |
क्या तुम पेड़ को तोड़ोगे ?
क्या खुदही को मारोगे ? ||२||

सीमेंट का जंगल बहुत है |
ज़हरीला धुआ प्रभूत है |
पेड़ तोडने का भूत सवार है |
धरती का पूत मानव गँवार है ||३||

प्रदूषण चारों और फैला है |
धरती का आँचल मैला है |
मदमस्त विकास हो रहा है |
अलमस्त मानव जी रहा है ||४||

सुनामी का एक ही झटका |
भूकंप का एक ही धक्का |
आँधी का एक ही हचका |
प्रकृति देती ही एक ही धचका ||५||

कवि - © सुरेश रघुनाथ पित्रे.
पता - " वैद्य सदन ", राघोबा शंकर रोड,
चेंदणी, ठाणे (पश्चिम), पिन कोड -४००६०१
Email ID - enquiryhindi@gmail.com

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