मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

विनायक पाण्डेय की कविता - उलझी जिन्दगी

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उलझी उलझी सी जिन्दगी के

सारे बंधन खोल दो

रोको न बस आज दिल को

सारी बात बोल दो


छोड़ कर वो राहें पुरानी

आज एक नई राह चुनो

भूल कर दुनिया को सारी

आज बस दिल की सुनो


है ये मौका देर न कर

टूटे सारे ख्वाब बुन

जिन्दगी के साज छेड़कर

फिर बना एक नई धुन


न रहे कोई शिकवा गिला

खुल के तू अपने से मिल

भर दे रंग सरे जहाँ में

जब मिले इस दिल से दिल


खूबसूरत है कि नहीं

छोड़ के बस जिन्दगी जी

रख हमेशा एक वो उम्मीद

जो आज भी है और कल भी थी

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(चित्र - अमृतलाल वेगड़ का कोलाज)

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