रविवार, 22 अप्रैल 2012

सुरेश कुमार 'सौरभ' की कविताएं


रचना-1
-- मेरी भावनाएँ --
.
हृदय में संवेदनाएँ, संवेदनाओं में भावनाएँ,
भावनाओं में कुछ बन्द है।
बता दूँ? (सुनोगे?)
इसमें कुछ कविता, कुछ गीत, कुछ ग़ज़ल
कुछ प्यारा-प्यारा छन्द है।
.
भावनाएँ रहती संग-संग, संग जगती-संग सोती हैं/
जब मस्तिष्क में कुछ विशेष बातें चल रही होती हैं/
तो कलम की नीली-काली स्याही में भरकर,
उतर आती हैं पृष्ठों पर,
क्योंकि लिखना मुझे पसन्द है।
.
थक जाता हूँ सम्पूर्ण मांसिक श्रम लगाकर भी/
कभी बनती, तो कभी बनती नहीं कविता बनाकर भी/
मन की कोई भावना जब देखती है,
कशमकश मेरी तो,
मुस्कराती मन्द-मन्द है।
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पीड़ितों की व्यथा देखकर दु:खद अनुभूति होती है/
दलितों, पिछड़ों, शोषितों के प्रति गहरी सहानुभूति होती है/
कलम को परवाह नहीं मेरे यदि मेरी,
कही यह बात,
शोषकों को नापसन्द है।
.
हृदय के कानों में चुपके से कहती है भावना/
सत्य को सत्य, असत्य को असत्य ही मानना/
पक्ष नहीं लेता मैं भी किसी पक्ष का,
निष्पक्ष हूँ मैं,
मेरी विचारधारा भी स्वच्छन्द है।
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------- रचना-2 ------
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मानवता मर रही, संवेदन निष्प्राण हो रहा है।
आदमी का हृदय अब पाषाण हो रहा है।।
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कान तरस गये हैं शीतल बोली सुनने को,
लोगों का वचन अब अग्निबाण हो रहा है।
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वातावरण में बारूदी गन्ध फैल गयी है,
शुद्ध वायु के लिए व्यथित घ्राण हो रहा है।
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भगवान नहीं, अब तो प्रलय मानव ही करेंगे,
हर राष्ट्र में परमाणु बम निर्माण हो रहा है।
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भुजा-बल से अब अधिकार ही छीना जाता है,
कहाँ इनसे कमज़ोरों का कल्याण हो रहा है।
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तुम्हारा उपदेश व्यर्थ गया, ऐ बुद्ध! ऐ गाँधी!
नित्य रक्तपात, तन से अलग प्राण हो रहा है।
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सुविचारों का लगातार गला घोंटा जाने लगा,
बहुत लज्जित कुरान, वेद-पुराण हो रहा है।
.
कलम से मानवता की ज्योति जला 'सौरभ',
वो फेंक दें, जिनके हाथों में कृपाण हो रहा है।
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-- रचना-3--
गगन को भी अपने उस पंछी पर नाज़ होता है।
जिसका ऊँचा, विस्तृत, अथक परवाज
होता है।।
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उसको हाथ फैलाना चाहिए जिसके हाथ नहीं,
वही कुछ माँगें जो नसीब का मोहताज
होता है।
.
संघर्षरहित जीवन जीने में क्या आनन्द
है जी,
जो हार-जीत भूलकर लड़े वही जांबाज़ होता है।
.
जो सफर पर निकल पड़ते हैं बीते हुए
कल में,
उन्हीं की एक मंजिल, एक मुकाम आज होता है।
.
ताज सम्भालने योग्य जिसका सिर हो जाता है,
उसी के सिर पर महानता का ताज होता है।
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एक सफल व्यक्ति से जाकर पूछना
बताएगा,
कठिन परिश्रम ही सफलता का राज़ होता है।
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कोई भी काम छोटा अथवा बड़ा कभी नहीं होता,
वो पछताता है काम करने में जिसे लाज होता है।
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क्यों काम करने से जी चुराता फिरे है 'सौरभ',
क्यों खुद को छलकर छलिया धोखेबाज़ होता है।
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रचना-4
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---- इतना भी आधुनिक न बनो कि ---
.
इतना भी आधुनिक न बनो कि-
तज दो स्वपरम्परा संस्कृति को ही
बिगाड़ दो नैतिक मूल्याकृति को ही
वसुधैव कुटुम्बकम जैसी मानवतावादी,
सदियों से चली आ रही नीति को ही
.
इतना भी आधुनिक न बनो कि-
लज्जा आये चरण स्पर्श सलाम में
'श्री' अथवा 'जी' को लगाना नाम में
न देखो अपनों के आगे दूसरों को,
ऐसे लगे रहो अपने किसी काम में
.
इतना भी आधुनिक न बनो कि-
तुम रहो पुष्प शैय्या पर पड़े-पड़े
वृद्ध दादा रह जायँ निकट खड़े-खड़े
हुक़्म दो दादी को- ये लाओ वो लाओ,
तुम चारपाई पर बैठे बनकर रहो बड़े
.
इतना भी आधुनिक न बनो कि-
अपने बाप के भी बाप बन जाओ
पुत्र के नाम पर अभिशाप बन जाओ
आदर छोड़कर अपने से बड़ों का,
निर्लज्ज बेहया अपने आप बन जाओ
.
इतना भी आधुनिक न बनो कि-
तुम्हारी बीमार माँ चिल्लाती रहे
असहाय अवस्था में उसके अश्रु बहे,
कहती रहे- बेटा दवा ला दो मेरी,
समय नहीं है, तुम्हारी घड़ी कहे
.
इतना भी आधुनिक न बनो कि
भूमि पर गिरे व्यक्ति के समीप जाने में
धूल लग जाएगा तुम्हें उसे उठाने में
कहो कि धूल झाड़ने से हाथ गंदे होंगे,
मैले हो जाएंगे उसको गले लगाने में
.
इतना भी आधुनिक न बनो कि-
एक दलित से प्रेमपूर्वक बात करने में
उसके हाथ पर अपना हाथ धरने में
तुम्हें शर्म महसूस होवे और झिझको,
छोटा समझकर उसे अंक में भरने में
.
इतना भी आधुनिक न बनो कि-
किसी के घावों को हाथों से धुलाने में
उसके फोड़े पर मरहम लगाने में
तुम्हें इंफेक्शन हो जाएगा कोई,
क्षणभर उस रोगी संग बिताने में
.
इतना भी आधुनिक न बनो कि-
वेद-पुराण, कुरान को भूल जाओ
और भूल अपने सारे उसूल जाओ
मातृभूमि, मातृभाषा से न जुड़ो,
पढ़ने जब 'इंगलिश-स्कूल' जाओ
.
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रचना-5
--------लाचार पत्ता --------
.
बाग़ में,
एक पेड़ की छाया में,
मैं बैठा था!
पंछी चहचहा रहे थे,
पत्ते झूम-झूमकर गा रहे थे,
तभी!
एक मुरझाया हुआ पत्ता मेरे सामने
आकर गिरा,
कटी पतंग की तरह,
तड़फड़ाता रहा जैसे परकटा
कोई पंछी हो,
मैंने पूछा-
कहो! कैसे गिर पड़े?
पैर तो नहीं न फिसले तुम्हारे?
वो बोला-
हरे-भरे पत्तों ने,
हवा से मिलकर,
योजनाबद्ध ढंग से,
मुझे नीचे ढकेल दिया,
क्योंकि मैं सूखा था
कुछ नहीं कर सकता था
पेड़ के लिए!
मैंने कहा-
हाँ भाई!
आज बेबसों, लाचारों,
किस्मत के मारों को,
कौन पूछता है,
सिवाय यमराज के!
तभी हवा का एक प्रचण्ड झोंका
लहराता हुआ आया
उड़ाकर ले गया पत्ते को
एक तालाब में,
अभी जान बाक़ी थी उसकी
किन्तु, हवा ने पत्ते का
जीते-जी अन्तिम संस्कार
कर डाला
मैंने देखा!
--

रचना-6
-------- संकल्प ----------
.
संकल्प कर लें आज ही, जीवन के अन्तिम वर्ष से।
जब तक रहेगी ज़िन्दगी, जीयेंगे हम संघर्ष से।।
.
दु:ख आयेगा तो आये न, स्वागत करेंगे प्यार से
हों न सफल तो न सही, कुछ सीख लेंगे
हार से
बाज़ी लड़ेंगे फिर से हम, निश्चिन्त होकर हर्ष से।
जब तक रहेगी ज़िन्दगी, जीयेंगे हम संघर्ष से।।
.
कठिनाई से टकराना ही, अपना बना लें अब धरम
जिस कार्य में लग जायेंगे, पूरा ही करके लेंगे दम
पाये बिना हटना नहीं, पीछे हमें निष्कर्ष से।
जब तक रहेगी ज़िन्दगी, जीयेंगे हम संघर्ष से।।
.
पर्वत हो पथ में सोचेंगे, न ये कोई अवरोध है
बादल भी हम बन सकते हैं, अच्छी तरह से बोध है
चढ़ जायेंगे नहिं उतरेंगे, नीचे कभी उत्कर्ष से।
जब तक रहेगी ज़िन्दगी, जीयेंगे हम संघर्ष से।।
.
हाथों की रेखा देख मत, कर कर्म ईश्वर साथ हैं
तुझको नहीं ये ज्ञात कि, पारस ये तेरे
हाथ हैं
लोहा को कर सकता है तू, सोना बस इक स्पर्श से।
जब तक रहेगी ज़िन्दगी, जीयेंगे हम संघर्ष से।।
.
रूकना नहीं रोके कोई, देखो समय बतला रहा
रवि-चन्द्र-सरि-बहता पवन, चलने को कहता जा रहा
प्राकृति के हर तत्व ही, 'सौरभ' लगें आदर्श से।
जब तक रहेगी ज़िन्दगी, जीयेंगे हम संघर्ष से।।
संकल्प कर लें आज ही, जीवन के अन्तिम वर्ष से।
जब तक रहेगी ज़िन्दगी, जीयेंगे हम संघर्ष से।।
.
.
रचना-7
जब सोचा तेरी सुन्दरता के बारे में
फ़ीका लगा चाँद मुझे सितारे में
.
शीतलता बर्फ जैसा रखता है तेरा मन
यौवन में जल-जलके निखरा है ऐसे तन
सोना तपा हो जैसे कि अँगारे में
.
तुम जैसा रूप रंगत सोचा है कहीं है?
तुम जितनी ख़ूबसूरत धरती पर नहीं है
कोइ स्वर्ग-परी दिखती है तुम्हारे में
.
बस मेरे सामने बैठी ही तुम रहो
मैं भी न कुछ कहूँ, तुम भी न कुछ कहो
चुप-चाप दिल की बात हो इशारे में
.
खोला है दिल-झरोखा बस तुम्हारे लिए
बन जाओं एक झोंका तुम हमारे लिए
'सौरभ' के मन के आओ चौबारे में
 .
रचना-8
-------- रोना अच्छा लग रहा --------
.
बीती हुई यादों में अब खोना अच्छा लग रहा।
मौका निकाल कर मुझे रोना अच्छा लग रहा।।
.
मेरे आँसू बहते हैं तो आती है उनको हँसी
उनको हँसता देखकर मुझको होती है खुशी
इसीलिए अश्क़ों से चेहरा धोना अच्छा लग रहा।
मौका निकाल कर मुझे रोना अच्छा लग रहा।।
.
मेरे उपर हर घड़ी बस उनका ये सितम रहे
मेरे संग-संग सिर्फ मेरे टूटे दिल का ग़म रहे
जो भी पाया था उसे अब खोना अच्छा लग रहा।
 
मौका निकाल कर मुझे रोना अच्छा लग रहा।।
.
ज़िदगी में मेरे बनके आयी थी वो गुलिस्ताँ
वो न आती ज़िन्दगी मेरी न झेलती ख़िज़ाँ
काँटों की माला मुझे पिरोना अच्छा लग रहा।
 
मौका निकाल कर मुझे रोना अच्छा लग रहा।।
.
मुझको अब तो फूलों से नफरत-सी होने है लगी
मुझको शायद काँटों से उल्फ़त-सी होने है लगी
काँटों से यह प्यार का अब होना अच्छा लग रहा।
 
मौका निकाल कर मुझे रोना अच्छा लग रहा।।
बीती हुई यादों में अब खोना अच्छा लग रहा।
मौका निकाल कर मुझे रोना अच्छा लग रहा।।
.
 
रचनाकार :- सुरेश कुमार 'सौरभ'
पता :- जमानिया कस्बा, मोहल्ला- बुद्धिपुर/पठान टोली, वार्ड नं.- 24,
जिला गाजीपुर, उत्तर प्रदेश
ई-मेल :- sureshkumarsaurabh@gmail.com

2 blogger-facebook:

  1. बेनामी6:50 am

    ये आपका तमीजदार काव्य है.......


    आचारी

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेनामी1:35 pm

    आचार्य जी सही कह रहे हैं।
    i am.....
    rndom

    उत्तर देंहटाएं

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