बुधवार, 18 अप्रैल 2012

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य - सवाल सास्‍ंकृतिक नीति का

इधर एक शुद्ध ताजी हवा के झोंके की तरह सांस्‍कृतिक नीति की खुशबू हवा में तैरी है। मगर अफसोस संस्‍कृति के लिए सरकार के पास समय कहां है। बनी थी एक हकसर समिति और कई छुटपुट समितियां सब की सब सरकारी लाल कपड़ो में बन्‍द हो कर धूल खा रही है। जब संस्‍कृति, कला, साहित्‍य, लोक संस्‍कृति सब कुछ प्रदूषित हो रही है तो सांस्‍कृतिक नीति कैसे शुद्ध खालिस बनेगी, अब तो अकादमियों के अध्‍यक्ष पदो पर भी चुनाव होने लगे है, या मनोनयन विचारों के आधार पर नहीं मुखौटों के आधार पर होने लगे है। संस्‍कृति के लिए नीति होनी चाहिये या सरकार की रीति-नीति के अनुसार साहित्‍य संस्‍कृति को चलना चाहिये। सोचे जनाब। इसी प्रश्‍न में जवाब भी छुपा है।

इसी प्रकार रायल्‍टी के मामले पर भी बड़ी चौड़ी बहस हुई थी और मानव संसाधन मंत्रालय की हवा में अभी भी ये बहसें तैर रही हैं और परिणाम ढाक के तीन पात। लेखक, कलाकार, संगीतकार, या उनके लिए नीति की चिन्‍ता सरकारें कभी नहीं करती क्‍योंकि इस चिन्‍ता से ज्‍यादा जरुरी है सड़क, पुल, मेटो, आदि का निर्माण या खानों का आवंटन क्‍योंकि उसमें ज्‍यादा धन मिलता है। जब संस्‍कृति ही नहीं होगी तो नीति का क्‍या अचार डालेंगे। देश में पैसा संस्‍कृति में नहीं घपलो, घोटालो, भ्रष्टाचारों में है सर। कोयले की खानें खा जाते हैं। पृथ्‍वी की आंतों को निकाल कर भून कर खा जाते हैं। ये वे लोग है जो झील से और हवा से पानी आक्‍सीजन और ये लोग कोख से बच्‍ची की खुशबू उड़ा लेते हैं। और कहीं कोई रपट नहीं लिखी जाती। इन लोगों को संस्‍कृति से क्‍या लेना देना है। मंत्री कुलपति को बुला कर धमकाता है और कुलपति माफी मांग कर जान बचाता है।

पाठकों। संस्‍कृति के लिए नीति नहीं प्रतिभा चाहिये। सूर-मीरा, तुलसी, प्रेमचन्‍द, रविशंकर, भीमसेन जोशी, बिस्‍मिला खाँ, फिदा हुसैन, सूजा, ने कभी किसी सांस्‍कृतिक नीति की मांग नहीं की वे तो बस अपना काम ईमानदारी से करते रहे। देश में मौलिकता, विचार, सम्‍पदा और भापा, कला, संस्‍कृति, साहित्‍य का कोई मोल है ही नहीं। फिर संस्‍कृति नीति का राग अलापना एक बौद्धिक-शगल नहीं तो और क्‍या है ?

यशवन्‍त कोठारी, 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर जयपुर - 2, फोन - 2670596

ykkothari3@gmail.com

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